Saturday, August 20, 2011

डॉक्टरों को लगी प्राइवेट प्रैक्टिस की लत


ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा की बदतर हालत को स्वीकार करते हुए सरकार ने गुरुवार को बेहद लाचारगी के साथ कहा कि तमाम रियायतों की पेशकश किए जाने के बावजूद डाक्टर गांव में जाने को तैयार नहीं हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने गुरुवार को लोकसभा में भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद संशोधन विधेयक 2011 पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा, दुर्भाग्य से डॉक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस की लत लग गई है। यह एक बीमारी सी हो गई है। डॉक्टर गांवों में जाने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि गांव में पैसा मिलता नहीं है। पैसा शहरों में मिलता है। इन लोगों को कोई भी रियायत दे दीजिए, लेकिन ये (डॉक्टर) गांव में जाने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों को गांवों में चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में प्रेरित करने के लिए कई योजनाएं बनाईं लेकिन उस पर भी कोई गांव जाने को तैयार नहीं है। आजाद ने कहा कि एमबीबीएस करने वाले छात्रों को ग्रामीण क्षेत्र में सेवा करने पर एमडी में दस फीसदी की छूट दिए जाने तक का भी प्रस्ताव रखा लेकिन डेढ़ साल बीत चुका है खुदा का एक भी बंदा इसके लिए तैयार नहीं हुआ। लोग पैसा देकर दाखिला लेने को तैयार हैं लेकिन एक साल गांव में सेवा करके यह लाभ पाने को नहीं। उन्होंने कहा, गांव तो छोडि़ए, केंद्रीय चिकित्सा संस्थानों में पढ़ाई पूरी करने वाले डॉक्टर अपने राज्यों तक में जाने को तैयार नहंी हैं। आजाद ने एमसीआइ के स्थान पर विधेयक के जरिये स्थापित की जाने वाली नई इकाई के पदाधिकारियों के बारे में सवाल उठाए जाने पर भ्रम की स्थिति स्पष्ट करते हुए सभी पदाधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता का ब्योरा दिया और सदस्यों से अपील की बिना तथ्यों की पड़ताल किए आरोप लगाने की प्रवृति से बचा जाना चाहिए। नई इकाई के अधिकतर पदाधिकारी पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसी उपाधियों से सम्मानित हैं। आजाद ने दावा किया कि पिछले 65 साल में हर साल 5-6 मेडिकल कालेज खोलने का चलन रहा है लेकिन पहली बार उन्होंने पिछले तीन साल में 40 नए मेडिकल कालेज खोले। इसी प्रकार पिछले तीन साल में कालेजों में एमडी की सीटों को आठ हजार बढ़ाकर 32 से 41 हजार किया गया। अगले पांच साल में उन्होंने इन सीटों को 15 हजार और बढ़ाने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि मेडिकल कालेजों में फैकल्टी की कमी एक गंभीर समस्या है और उससे निपटने के लिए सेवानिवृत्ति आयु सीमा को 65 वर्ष कर दिया गया है। जिन राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में जहां फैकल्टी की भारी कमी है वहां राज्य सरकारों ने आयु सीमा को नहीं बढ़ाया है।

Friday, August 12, 2011

स्वास्थ्य सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा बदहाल


नई दिल्ली जन्म से एक साल तक के बच्चों की मौत के मामले में देश के 284 सबसे पिछड़े जिलों में उत्तर प्रदेश का श्रावस्ती सबसे ऊपर है। इसी तरह प्रसव के दौरान गर्भवती महिलाओं की होने वाली मौत के मामले में भी यूपी का फैजाबाद मंडल सबसे पिछड़ा साबित हुआ है। यहां तक कि परिवार नियोजन के मामले में भी यहां सबसे कम दिलचस्पी दिखाई गई है, जबकि इसी से अलग हुए उत्तराखंड ने अधिकांश मामलों में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। यही नहीं यूपी में मृत्यु दर, नवजात शिशुओं और बच्चों की मृत्यु दर सबसे ज्यादा है, तथा यहां के 70 में से 34 जिलों में मातृ मृत्यु अनुपात और लिंगानुपात भी बहुत ज्यादा है। देश के नौ सबसे पिछड़े राज्यों में पहली बार जिला स्तर पर हुए स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजे बुधवार को सार्वजनिक किए गए। पैदा होने के बाद से एक साल की उम्र के दौरान मृत्यु का शिकार हो जाने वाले बच्चों (नवजात शिशु मृत्यु दर) के मामले में उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिला प्रति हजार जन्म में 19 मौत के अनुपात के साथ सबसे अच्छी स्थिति में रहा, जबकि इस मामले में श्रावस्ती 103 मौत के साथ सबसे बुरी स्थिति में पाया गया। वर्ष 2015 तक नवजात शिशु मृत्यु दर को राष्ट्रीय स्तर पर 28 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। झारखंड के पूर्वी सिंहभूमि और धनबाद व उत्तराखंड के चमौली, रुद्रप्रयाग, पिथौड़ागढ़ और अल्मौड़ा जिलों ने यह लक्ष्य हासिल कर लिया है। प्रसव के दौरान माताओं की मौत के मामलों में इन राज्यों में जिले की बजाय मंडल स्तर पर अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि उत्तराखंड में जहां प्रति लाख प्रसव में 183 महिलाओं की मौत वहीं यूपी के फैजाबाद मंडल में यह सबसे ज्यादा 451 महिलाओं की मौत होती है। प्रति हजार लड़कों के मुकाबले पैदा होने वाली लड़कियों (जन्म के समय लिंगानुपात) के मामले में यूपी का मुरादाबाद अध्ययन में शामिल पिछड़े जिलों में सबसे बेहतर स्थिति में रहा। यहां प्रत्येक हजार लड़कों के मुकाबले 1030 लड़कियां पैदा हुई जबकि सबसे पीछे उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जिला है, जहां हजार लड़कों के मुकाबले सिर्फ 764 लड़कियां पैदा हुई। इस चरण में शामिल किए गए राज्य हैं बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और असम। इसी तरह परिवार नियोजन के उपायों का सबसे कम असर यूपी में दिखा। झारखंड में प्रति हजार आबादी के अनुपात में सबसे कम जन्म हो रहे हैं। जिलेवार देखा जाए तो उत्तराखंड का बागेश्वर जिला सबसे कम जन्म दर वाला जिला साबित हुआ, जबकि श्रावस्ती 40.9 के साथ सबसे ज्यादा जन्म दर वाला जिला रहा।