नई दिल्ली जल्द ही गली के नुक्कड़ पर हड्डी जोड़ने का दावा करने वाला पहलवान, या गांव में सांप काटे का जहर उतारने वाले भी खुद को सरकार के चिकित्सा तंत्र का हिस्सा बताकर हैरान कर सकते हैं। कोशिश है कि साल के अंत तक ऐसे परंपरागत चिकित्सकों की दक्षता प्रमाणित हो सके। इससे पढ़े-लिखे लोग इनके पास जाएंगे, दूसरी तरफ समाज में इन चिकित्सकों पर भरोसा बढ़ेगा और इनकी इज्जत भी होगी। उद्देश्य है कि देसी परंपरागत चिकित्सा के सही जानकारों की सेवा का समाज को फायदा मिले और फर्जी चिकित्सकों को किनारे किया जा सके। इन परंपरागत चिकित्सकों को उनकी दक्षता का प्रमाणपत्र देने का एक कार्यक्रम इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) ने शुरू किया है। शुरुआती तौर पर इस कार्यक्रम में परंपरागत तरीके से इलाज की जा सकने वाली पांच बीमारियों को चुना गया है। इनमें पीलिया, प्रसव कराने वाली दाई, हड्डी जोड़ने वाले, चर्म रोगों को इलाज करने वाले और सांप काटे का इलाज करने वालों की दक्षता प्रामाणिक की जाएगी। तय मानकों के आधार पर प्रमाणपत्र हासिल कर इलाज करने वालों को ग्राम वैद्य का नाम देने पर भी विचार हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय का आयुष विभाग योजना आयोग की मंजूरी से इस कार्यक्रम का वित्त पोषण कर रहा है। इग्नू के इस कार्यक्रम में दो संस्थाएं भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआइ) और फाउंडेशन ऑफ रिवाइटलाइजेशन ऑफ लोकल हेल्थ ट्रेडिशन (एफआरएलएचटी) भागीदारी कर रही हैं। एफआरएलएचटी इन लोगों के लिए मानक तैयार कर रहा है जबकि क्यूसीआइ इन्हें मान्यता देने के मानक तैयार कर रहा है। इस योजना के तहत सबसे पहले ऐसे पारंपरिक चिकित्सकों की पहचान की जा रही है। फिर विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक टीम इनके इलाज के तरीकों का अध्ययन कर सभी पांच तरह के इलाज के मानक तैयार कर रही है। इस कार्यक्रम का मकसद ऐसे लोगों को चिकित्सा तंत्र का हिस्सा बनाना है जो बिना औपचारिक शिक्षा पाए वर्षो से कुछ विशेष बीमारियों का इलाज करते आए हैं। उन्हें मान्यता देने का काम पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर किया जा रहा है जिसके तहत मान्यता देने से पहले उनकी दक्षता की पुष्टि की जाएगी। शुरुआती तौर पर इस कार्यक्रम को पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर आठ राज्यों राजस्थान, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, उड़ीसा और तमिलनाडु में चलाया जाएगा। क्यूसीआइ की नेशनल एक्रिडिएशन बोर्ड के निदेशक डॉ. अनिल जौहरी ने बताया कि इसका लाभ यह होगा कि उन क्षेत्रों में भी प्रामाणिक चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराई जा सकेगी जहां अभी कोई सुविधा नहीं मिलती। अगर यह कार्यक्रम सफल होता है तो सरकार के पास इन ग्राम वैद्यों का इस्तेमाल राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में करने का विकल्प भी होगा। ऐसे चिकित्सकों के लिए सरकार से यह मान्यता लेना स्वैच्छिक होगा। सरकार उन पर इस कार्यक्रम में शामिल होने का दबाव नहीं बनाने जा रही है।
Monday, July 25, 2011
Tuesday, July 12, 2011
विटामिन ए से अग्नाशय कैंसर को मात
भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. हेमंत कोचर के नेतृत्व में किए गए एक शोध में पता चला है कि अग्नाशय कैंसर के इलाज में विटामिन ए कारगर साबित हो सकता है। इस कैंसर में रोगियों के जीवित रहने का दर अन्य कैंसर की तुलना में बहुत कम होती है और इसकी पहचान होने के बाद ज्यादातर रोगी एक साल से अधिक जीवित नहीं रह पाते। लंदन के बार्ट्स कैंसर संस्थान के डॉ. हेमंत कोचर, कैंब्रिज विश्वविद्यालय एवं हब रेचट संस्थान (नीदरलैंड्स) के उनके सहयोगियों ने दावा किया कि कैंसर रोगियों की स्वास्थ्य कोशिकाओं के आसपास विटामिन-ए का स्तर बढ़ाने से कैंसर विकास को रोकने में मदद मिल सकती है। यह शोध अग्नाशय कैंसर की विभिन्न उपचार विधियों व रोगियों को ज्यादा दिन तक जीवित रखने में कारगर होगा। लंदन में हर साल 7,500 लोग अग्नाशय कैंसर से मरते हैं। कोचर ने बताया शोध मूल रूप से 1889 में प्रस्तावित सिद्धांत पर आधारित है। अग्नाशय कैंसर रोगियों में प्राय: विटामिन-ए की मात्रा कम होती है। अब इसका क्लिनिकल परीक्षण बार्ट्स कैंसर संस्थान में होगा। बच्चे भी करें व्यायाम लंदन : अगर आप अपने बच्चे का खास ख्याल रखते हैं और उसे मोटापे से दूर रखना चाहते हैं तो अपने च्च्चे को रोजाना थोड़ा सा पसीना बहाने के लिए तैयार कीजिए। कहने का मतलब यह है कि अपने बच्चे से रोजाना कम से कम तीन घंटे का व्यायाम करवाइए। यह कहना है बाल्यावस्था के मोटापे पर लगाम कसने के लिए ब्रिटिश सरकार की तरफ से तैयार की गई एक रिपोर्ट का। यह रिपोर्ट कहती है कि बच्चों को जन्म के समय से ही फुर्तीला होना चाहिए और अभिभावकों को चाहिए कि वह उन्हें घुटनों के बल चलने, तैराकी का अभ्यास करने और प्रतिदिन कम से कम पंद्रह मिनट की चहलकदमी करने के लिए प्रेरित करें। यह रिपोर्ट इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स व उत्तरी आयरलैंड के प्रमुख चिकित्सा अधिकारियों द्वारा तैयार की गई है। डेली एक्सप्रेस ने इंग्लैंड के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डेम सैली डेविस के हवाले से कहा जो बच्चे पैरों के बल चलने लायक नहीं हो पाए हैं उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात के सबूत हैं कि उन्हें घुटनों के बल चलने देना व जमीन पर खेलने देना या सरकने देना काफी प्रभावकारी होता है। नमक की जगह समुद्री शैवाल लंदन : अगर आपको नमक का सेवन कम करना है तो आप उसकी जगह समुद्री शैवाल का इस्तेमाल कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री शैवाल का इस्तेमाल ज्यादा नमक खाने से होने वाली परेशानियों को दूर कर सकता है। ब्रिटेन के शेफील्ड हलैम विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि समुद्री शैवाल से खाने में च्च्छा स्वाद आता है मगर उसमें नमक की मात्रा कम होती है। उनका दावा है कि बे्रड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में नमक की जगह इसका इस्तेमाल करने से च्च्च रक्तचाप, हृदयाघात और मृत्यु के खतरे से बचा जा सकता है। डेली मेल की खबर के मुताबिक, इसमें (समुद्री शैवाल में) बड़ी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जिससे पेट भरा हुआ महसूस होता है। इसलिए यह मोटापा घटाने में भी सहायक है।
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