तंबाकू, असंयमित खानपान और शारीरिक श्रम का अभाव कॉर्डियोवस्कुलर बीमारियों का मुख्य कारण हैं। ज्यादातर लोग यह जानने के बाद भी सतर्क नहीं होते और मौत के मुंह में चले जाते हैं। जबकि ऐसे अधिकतर मामलों को थोड़ी सावधानी से रोका जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2008 में कॉर्डियो वस्कुलर बीमारियों से 1.73 करोड़ लोगों की मौत हुई। इनमें से 80 फीसदी से अधिक लोग निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों के थे। अगर समय रहते सचेत न हुए तो वर्ष 2030 तक कार्डियोवस्कुलर बीमारियों से मरने वालों की संख्या 2.36 करोड़ तक पहुंच सकती है। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ सचित मोतीरमानी ने बताया कि समय रहते सावधानी बरतना जरूरी है। दिल की सेहत ठीक तो जीवन ठीक है। दैनिक दिनचर्या के दौरान कई ऐसे संकेत मिल जाते हैं जो बता सकते हैं कि आने वाले समय में कोई समस्या हो सकती है। समय रहते इससे बचाव के उपाय करना चाहिए। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ उपेंद्र कौल कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि दिल के दौरे और आघात के 80 फीसदी मामले रोके जा सकते हैं। हर दिन कम से कम आधे घंटे का व्यायाम हृदयाघात को रोकने के लिए जरूरी है। तंबाकू से जितना हो सके, बचना चाहिए। असंयमित खान-पान भी दिल की सेहत के लिए खतरनाक होता है। बचाव के लिए खाने में हरी सब्जियों और फलों का होना बहुत जरूरी है। नमक का सेवन भी कम करना चाहिए। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ एसके सिंह कहते हैं कि तंबाकू से बचें। सिगरेट, सिगार, पाइप, बीड़ी, तंबाकू चबाना सभी खतरनाक है। अब 26 और बीमारियों के लिए भी कैंसर जैसा कार्यक्रम नई दिल्ली : अस्थमा, अंधेपन, बहरेपन और बुढ़ापे से जुड़ी दूसरी बीमारियों को लेकर भी स्वास्थ्य मंत्रालय सक्रिय हो गया है। अब इन 26 बीमारियों से लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विशेष प्रयास शुरू होंगे। इस समय चल रहे कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और दिल के दौरे से बचाव और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम में इन बीमारियों को भी शामिल किया जाएगा। हाल ही में कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और दिल के दौरे जैसी बेहद गंभीर बीमारियों से बचाव और उपचार के लिए एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया गया है। लेकिन गैर संचारी रोगों के इस कार्यक्रम में अब अस्थमा, अंधापन, बहरापन, आघात, घुटने और जोड़ों की समस्या जैसी बीमारियों के अलावा वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियां, मानसिक स्वास्थ्य, दुर्घटना और जलने के मामलों आदि को भी शामिल किया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय की योजना है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत हर वर्ष सौ जिलों को इस कार्यक्रम में शामिल किया जाए। ताकि अगले छह वर्ष के दौरान देश के सभी जिले शामिल हो सकें। शुरुआत सबसे ज्यादा पिछड़े जिलों से की जाएगी। बड़े शहरों को सबसे बाद में शामिल किया जाएगा।
Friday, September 30, 2011
Wednesday, September 28, 2011
शहरों की फिजा बिगड़ी
भारत में वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या के चलते यहां के शहरों में लोगों को सांस से संबंधित बीमारियां हो रही हैं। वातावरण में कार्बन उत्सर्जन व धुएं के चलते लोग फेफड़े के कैंसर से जूझ रहे हैं। भारत के समृद्ध पड़ोसी चीन का हाल भी कुछ ऐसा ही है। डब्लूएचओ का अनुमान है कि वर्ष 2008 में श्वसन संबंधी बीमारियों और कैंसर से हुई लगभग 13 लाख 40 हजार लोगों की समय से पहले हुई मौत की वजह प्रदूषित हवा है। डब्लूएचओ में लोक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की निदेशक मारिया नीरा ने कहा, अगर डब्लूएचओ के दिशानिर्देशों का वैश्विक स्तर पर पालन किया गया होता, तो वर्ष 2008 में लगभग 10 लाख नौ हजार लोगों की मौत को टाला जा सकता था। संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था का कहना है कि भारतीय शहरों में मध्यमवर्ग के लोगों में प्रतिष्ठा का प्रतीक बन रहे नए-नए एसयूवी वाहन, कारें और दोपहिया वाहन लोगों के लिए प्राणघातक साबित हो रहे हैं। संस्था के अनुसार भारत और चीन के अलावा अन्य विकासशील देशों में शहरों का तेज औद्योगीकरण फेफड़े की बीमारियों की वजह है। अपनी हालिया रिपोर्ट में संस्था ने 91 देशों के 1100 शहरों से हवा की गुणवत्ता संबंधी आंकड़े इक्कठा किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेजी से विकास और औद्योगिकरण वाले देशों विशेष तौर पर चीन और भारत में प्रदूषित हवा के कारण सबसे अधिक स्वास्थ्य की समस्याएं पैदा हो रही हैं। नीरा का कहना है, भारत और चीन के शहर हवा के प्रदूषण को झेल रहे हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो रहा है। इन देशों में साफ हवा के अभाव में सांस से संबंधित तीक्ष्ण और स्थाई समस्याएं बढ़ रही हैं।उन्होंने बताया कि उनकी रिपोर्ट में शामिल अधिकांश शहरों ने हवा की गुणवत्ता से जुड़े डब्लूएचओ के दिशानिर्देशों पीएम 10 का पालन नहीं किया है, जिसके तहत औसत रूप से 20 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर सालाना की अनुमति है। पीएम 10 वैसे कण हैं जिनका आकार 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है और यह फेफड़ों और खून के प्रवाह में दाखिल हो कर हृदय, फेफड़े, सांस से संबंधित बीमारियों का कारण बनते हैं। इस मामले में लोगों में जागरुकता बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि स्वास्थ्य पर्यावरण के उपायों के लिए डब्लूएचओ के समन्वयक कार्लोस डोरा ने कहा कि भारत और चीन में इस समस्या के प्रति जागरुकता बढ़ रही है।
Monday, September 5, 2011
कैंसर सेल को खत्म करेगा बायोकंप्यूटर
: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डीएनए आधारिक तार्किक सर्किट विकसित किया है जो शरीर में कैंसर कोशिकाओं की पहचान करके उन्हें वहीं नष्ट कर देगा। इस प्रक्रिया में स्वस्थ कोशिकाओं को कोई हानि नहीं पहुंचेगी। कोशिका के ही स्तर पर कैंसर के निदान की इस प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने यह कहते हुए विकसित किया है कि ट्यूमर को दवा देकर खत्म करने और कैंसर के इलाज में आवश्यकतानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि उनका बनाया सर्किट एक तार्किक क्षमता वाला सर्किट है। वह बहुआयामी सूचनाओं के आधार पर अपना फैसला लेता है। इस प्रक्रिया में यह सर्किट वास्तव में जीन की जांच करता है और पांच स्तर पर कैंसर के लक्षणों की अणुओं में पहचान करता है। जैसे ही सर्किट को कैंसर प्रभावित कोशिका की पहचान होती है वह उसे समूल नष्ट करता है। बायोकंप्यूटर अपने तार्किक अभियान में एएनडी और एनओटी को इस्तेमाल में लाता है जिससे सटीक नतीजे मिलते हैं
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