Monday, April 30, 2012

मत करो आयुर्वेद को बदनाम


भारतीय संस्कृति और विज्ञान का प्रादुर्भाव हजारों वर्ष पहले पर्वतमालाओं के वन प्रांतों, हरित घाटियों और नदियों के स्वच्छ किनारों और विशाल सागर तटों पर हुआ। वैदिक काल में ऋषि-मुनि जनकल्याण की कामना को लेकर सुदूर प्रकृति की गोद में गहन तप और शोध करते थे। ऐसी तपस्या का परिणाम आयुर्वेद संभवत: विश्व का सर्वाधिक समृद्ध और प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है, लेकिन आज आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर बाजार में जो कुछ बेचा जा रहा है, उसके कुप्रभाव अंग्रेजी दवाओं से भी अधिक घातक हैं। पिछले दिनों अमेरिका के हॉर्वर्ड मेडिकल कॉलेज ने अमेरिका में बिक रही कोई 70 भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं का अध्ययन किया तो उनमें सीसा, पारा, संखिया आदि की मात्रा जानलेवा स्तर तक मिलीं। इनमें से अधिकांश दवाएं भारत की नामी-गिरामी दवा कंपनियों की थीं। बढ़ता औद्योगिकीकरण और उससे उपजे प्रदूषण की देन घातक बीमारियां हैं। इन बीमारियों से निबटने के लिए आई अंग्रेजी दवाओं की बाढ़ किसी नई बीमारी का बीज होती है। सुरक्षित दवाओं के लिए लोग एक बार फिर अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की ओर लौट रहे हैं। जब आम लोग तत्काल रोगमुक्ति के लालच में सस्ती अंग्रेजी दवाओं की ओर दौड़ रहे थे तब भारत के अभिजात्य वर्ग और पश्चिमी देशों ने इस चिकित्सा पद्धति के कुप्रभावों को ताड़ लिया और उन्होंने हर्बल दवाओं के रूप में जड़ी-बूटियों को अपनाया। विदेशी दवा कंपनियों ने जब देखा कि भारत की बहुसंख्यक आबादी उनकी जहरीली दवाओं की आदी हो गई है तो उन्होंने धीरे-धीरे दाम बढ़ाने शुरू किए। आम लोगों को जब इस विदेशी कुचक्र की सुध लगी, तब तक काफी देर हो चुकी थी। तपस्या से तैयार जड़ी-बूटियों की दवाओं का व्यवसायीकरण हो चुका था। आज बाजार आयुर्वेद दवाओं से पटा पड़ा है, लेकिन उनमें मुनियों की जनकल्याण भावना का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है। अधिकांश आयुर्वेदिक दवाएं जिनके नाम के साथ रस शब्द जुड़ा होता है में पारे की बहुत अधिक मात्रा होती है। बावजूद इसके ऐसी दवाओं के कुप्रभावों को जांचने के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। कुछ साल पहले जाने-माने आयुर्वेद डॉक्टरों प्रो. बीएन मिश्रा और डा. बीके मोहंती ने ऐसी दवाओं के परीक्षण चूहों पर किए तो पाया कि उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली पर खतरनाक असर दिखा। इन दोनों डॉक्टरों की किताब हेजार्ड ऑफ मरकरी इन आयुर्वेदिक ड्ग्स में दावा किया गया है कि ये दवाएं चूहों की तरह ही मानव शरीर पर भी विपरीत प्रभावकारी हैं। भारत सरकार ने इन रपटों को कतई गंभीरता से नहीं लिया। जब लगभग यही बात हार्वर्ड मेडिकल कॉलेज ने कही तो सरकार में बैठे लोगों को देश की छवि का ध्यान आया। कतिपय आयुर्वेदाचार्य दावा करते हैं कि उनकी दवाइयों में प्रयुक्त पारा पहले परिष्कृत किया जाता है जिससे उसका नुकसानदायक तत्व समाप्त हो जाता है, लेकिन परीक्षणों से साबित होता है कि यह दावा गलत है, क्योंकि दवाओं में मौजूद पारे के कारण चूहों पर हानिकारक असर पड़ा। कजली एक आधारभूत दवा है और यह अधिकांश आयुर्वेदिक दवाओं का मुख्य हिस्सा होता है। इसका उपयोग त्वचा और यौन रोग आदि में मलहम के रूप में भी होता है। कोई 200 दवाएं होंगी, जिनमें कजली प्रमुख घटक है। शोध के दौरान जिन चूहों को कजली दी गई थी उनके शरीर में कई परिवर्तन देखे गए। इसमें मौजूद पारे के कारण चूहों की भूख, रक्त, सक्रियता और वजन घट गया। उनके मस्तिष्क, गुर्दे और यकृत में पाई गई पारे की उच्च मात्रा दर्शाती है कि यह धातु शरीर की कोशिकाओं द्वारा आसानी से अवशोषित की जा रही है। कजली देना रोकने के कुछ दिनों बाद चूहों का फिर से परीक्षण किया गया तो मालूम चला कि उनके गुर्दे और यकृत की कार्यप्रणाली न सुधरने की हद तक बिगड़ चुकी थी। कजली में 49 प्रतिशत पारा और 40 फीसदी गंधक होता है। प्रो. मिश्र और डा. मोहंती चेताते हैं कि कजली स्तनधारी जीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है अत: इसके प्रयोग से हरसंभव रूप में बचना चाहिए। ध्यान रहे कि कजली आमतौर पर प्रतिदिन 1000 मिग्रा की मात्रा में दी जाती है। इसी तरह कफ के लिए प्रयुक्त दवा बिसेस्वर रस में कजली के साथ लोहा और जड़ी बूटियां होती हैं। मृतसंजीवनी रस और रस सिंदूर स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक के तौर पर बेची जाती है। इन दोनों दवाओं में कुछ जड़ी-बूटियों के अलावा मुख्य घटक कजली ही होता है। फाइलेरिया, तपेदिक बुखार में प्रयुक्त नित्यानंद रस हो या फिर हृदय रोग की दवा पंचानन रस या फिर मधुमेह का निदान प्रमेह सेतु इन सभी में पारे की उंची मात्रा वाली कजली मौजूद होती है। व्यावयासिक आयुर्वेदिक दवाओं में समस्या केवल पारे की मौजूदगी ही नहीं है। कुछ समय पहले मुंबई के भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने कुछ आयुर्वेद दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई थी। इन दवाओं को ले रहे मरीजों के खून में यह जहर बुरी तरह घुल गया था। बार्क के वैज्ञानिकों ने ऐसे चार मरीजों का गहन परीक्षण किया जो अर्थराइटिस या मधुमेह के कारण आयुर्वेद दवाएं खा रहे थे। इन दवाओं में सीसे की मात्रा लगभग आठ मिलीग्राम थी जो रोजाना खाने या हवा के जरिए शरीर में पहुंच रहे सीसे की मात्रा से 80 गुना अधिक है। बार्क की टीम ने एक अन्य विषैली धातु कैडमियम को भी ऐसी दवाओं में पाया। चार साल पहले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अक्युपेशनल हेल्थ, अमदाबाद ने भी कुछ पारंपरिक दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा पाई थी। इस संस्था के शोधकर्ताओं ने एक दवा में 27,500 पीपीएम और दूसरी में 9700 पीपीएम सीसे की मात्रा पाई। भारत में कोई चार लाख वैद्य पारपंरिक जड़ी-बूटियों से इलाज करते हैं। इनमें से अधिकांश खुद ही दवा तैयार करते हैं इसलिए दवाओं के मानक के कायदे कानूनों का पालन संभव नहीं होता। कई नामी-गिरामी उत्पादकों की आयुर्वेद दवाएं भी जहर से कम नहीं हैं। एक स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनी का उत्पाद इसेंसल लीवर या यकृत की बीमारियों की कारगर दवा के नाम पर बेची जाती है। एक स्वतंत्र संस्था फाउंडेशन ऑफ हेल्थ एक्शन के मुताबिक इस दवा में ऐसी कोई क्षमता ही नहीं हैं। दो राज्यों महाराष्ट्र और गुजरात में इस उत्पाद का लाइसेंस तक निरस्त हो चुका है। कर्पूरआसव में मौजूद अल्कोहल की अधिक मात्रा के कारण इसका सेवन शराबी लोग खुल कर करते है। नवंबर 1991 में इसी दवा यानी शराब को पीने कारण दिल्ली में 200 मौतें हुई थीं। जो बच गए वे अंधे हो गए थे। आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर शराब बेचना आम बात होती जा रही है। ऐसे सैकड़ों टॉनिक और कफ सिरप देश के छोटे-छोटे कस्बों तक में सहजता से खरीरे जा सकते हैं। आयुर्वेद की मान्यता आज के विकसित तकनीकी युग में भी पूर्णरूपेण खरी उतर सकती है, बशर्ते सुरक्षित और प्रभावी आयुर्वेद दवाओं के उत्पादन और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के सही उपयोग की पद्धति को बरकरार रखा जाए। इसके लिए सरकार को कारगर कदम उठाना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

यूपी में एम्स बना तो बचेंगी हजारों जानें


यूपी एम्स हर साल लगभग तीन से पांच हजार लोगों को सीधे मौत के मुंह से निकाल सकेगा। इसके अलावा कम से कम एक लाख मरीज ऐसे होंगे, जो सही समय पर इलाज मुहैया होने से बिस्तर पकड़े रहने को मजबूर नहीं होंगे। इसी तरह कुल तीन लाख मरीजों को यह महंगे प्राइवेट इलाज की मार से बचा सकेगा। नए एम्स में प्रस्तावित सुविधाओं, विशेषज्ञताओं और उपकरणों और उत्तर प्रदेश में बीमारियों की मौजूदगी को देखते हुए यह आकलन है पटना में स्थापित हो रहे एम्स के निदेशक जीके सिंह का। व्यवहारिक परिस्थितियों को देख माना जा रहा है कि लगभग तीन लाख मरीजों का सालाना यहां इलाज हो सकेगा। इनमें से औसतन 30 हजार मरीज भर्ती किए जा सकेंगे। उपलब्ध सुविधाओं के मुताबिक इलाज के बावजूद दाखिल किए जाने वाले मरीजों में मृत्यु दर लगभग 10 से 15 फीसदी हो सकती है। जबकि ऐसी चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने पर यह मृत्यु दर 20 से 25 फीसदी होने का खतरा है। इस तरह इनमें से 10 से 15 फीसदी जिंदगियां सीधे बचाई जा सकेंगी। टूट रहा आठ सौ करोड़ का गरीबों का सपना 42 स्पेशलिटी और सुपर स्पेशलिटी विभागों वाला यह अस्पताल इस इलाके में अपनी तरह का अकेला अस्पताल होगा, जहां लगभग सभी बीमारियों का इलाज हो सकेगा। 823 करोड़ की लागत से बनने वाले एम्स के तहत मरीजों को भर्ती करने के लिए 960 बिस्तरों की क्षमता होगी। इसमें 500 बिस्तर सामान्य बीमारियों के मरीजों के लिए होंगे। 300 बिस्तर स्पेशलिटी और सुपर स्पेशलिटी विभाग में होंगे। सौ बिस्तर अति सघन चिकित्सा (आइसीयू) और किसी हादसे आदि का शिकार हुए मरीजों के लिए होंगे। 30 बिस्तर फिजिकल मेडिसिन और 30 आयुर्वेदिक आदि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के इलाज के लिए होंगे।

भारत में बढ़ता जा रहा खसरे का खतरा


साल 2010 में वैिक स्तर पर खसरे से हु ई 1.39 लाख मौतों में 47 फीसद भारत में हुई यानी लगभग आधी अफ्रीकी देशों में यह आंकड़ा 36 फीसद रहा भारत में इस रोग का खतरा बढ़ने की वजह बचाव के टीके की पहुं च कम लोगों तक होना बताई गई पेरिस (एजेंसी)। संयुक्त राष्ट्र के वि स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सदस्य देश खसरा से होने वाली मौतों को कम करने के लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहे हैं। इसकी मुख्य वजह भारत में टीकाकरण को लेकर भारी सुस्ती और अफ्रीका में फैली महामारी की स्थिति है। द लैंसेटकी रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2008 में डब्ल्यूएचओ के सभी सदस्य देशों ने खसरा से होने वाली मौतों के औसत को 2000 के मुकाबले 2010 तक 90 फीसद कम करने का लक्ष्य रखा था। वर्ष 2010 में खसरा से वैिक स्तर पर 139,300 मौतें हुई, जो 2000 के मुकाबले 74 फीसद कम थीं। 2000 में खसरा से 5,35,300 लोगों की मौत हुई थी। साल 2010 में वैिक स्तर पर खसरा से हुई मौतों में 47 फीसद भारत में हुई और अफ्रीकी देशों में यह आंकड़ा 36 फीसद रहा। यानी साल 2010 में वि में खसरे से होने वाली मौतों में से लगभग आधी मौतें भारत में हुई थी। इस अध्ययन ने भारत में इस रोग की कम गिरावट के लिए इससे बचाव के टीके के कम लोगों तक पहुंचने को जिम्मेदार ठहराया है।

Monday, April 9, 2012

स्वास्थ्य सेवाओं का सवाल


अब यह तथ्य बहस से परे है कि आर्थिक व सामाजिक विषमताएं पोषण व स्वास्थ्य की असमान उपलब्धियों को जन्म देती हैं। हमारे देश की 70 प्रतिशत संपत्ति व स्रोतों पर दो हजार से भी कम धनकुबेरों का कब्जा है, जिन्होंने लोकतंत्र की नई और विकृत परिभाषा को जन्म दिया है कि पूंजीपतियों की सरकार, पूंजीपतियों के लिए और पूंजीपतियों द्वारा। आज हमारे देश की तकरीबन आधी आबादी 20 से 32 रुपये प्रतिदिन में गुजर-बसर करने को मजबूर है, लेकिन दूसरी ओर कुछ हजार लोग 5 से 6 करोड़ रुपये का पैकेज लेते हैं। असमानता की यह खाई लगातार चौड़ी हो रही है। संविधान में इस बात का वायदा होते हुए भी कि लोगों को स्वास्थ्य व शिक्षा प्रदान कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी, सरकार इसे पूरा करने से लगातार मुकर रही है। स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण किया जा रहा है जिससे आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। भारत जैसा गरीब और विकासशील देश जहां मातृ एवं शिशु मृत्यु दरों का प्रतिशत दुनिया के तमाम छोटे व विकासशील देशों से भी बदतर स्थिति में है, में तकरीबन 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर निजी क्षेत्र का कब्जा है। ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य की बेहतरी का काम वर्ष 2005 में प्रारंभ किया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ने अपने 7 वर्ष का पहला चरण पूरा कर लिया है। इसके अंतर्गत यह वायदा किया गया था था कि सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया जाएगा। प्रथम चरण की समाप्ति पर यह प्रतिशत 1.3 पर ही अटक गया। इस मिशन के अंतर्गत ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य के साथ एक मजाक के सिवाय और कुछ नहीं किया गया। इस मामले में उत्तर प्रदेश का उदाहरण हम सभी के सामने है। आंकड़े बता रहे हैं कि भारतीय ग्रामीणों को कर्ज में कैद रखने का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य की देखभाल पर होने वाला आकस्मिक खर्च है। सार्वजनिक और निजी चिकित्सालयों में भर्ती होने वाले कुल मरीजों में से 40 प्रतिशत कहीं से भी कर्ज लेने या अपने घरों के जरूरी सामानों को बेचने को मजबूर होते हैं ताकि उन्हें सही इलाज मिल सके। तकरीबन 25 प्रतिशत लोग तो पैसा न देने के कारण इलाज कराने की हैसियत के दायरे से ही बाहर रह जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट को मानें तो हमारे देश में 65 प्रतिशत लोगों को नियमित रूप से आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो हासिल करना था वह तो नहीं किया जा सका। अब 12वीं पंचवर्षीय योजना के बजट में वृद्धि करते हुए सरकार ने राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन प्रारंभ करने तथा 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करने का वायदा किया गया है। आम लोग आज जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर हमारा देश मेडिकल टूरिज्म के नाम पर विदेशी अमीरों के स्वास्थ्य की सैरगाह बनता जा रहा है। स्वास्थ्य पर खर्च की तुलना जब हम अन्य देशों से करते हैं तो हमारे देश का स्थान नीचे से छठवां आता है। यानी हमारे देश से ऊपर मलेशिया, श्रीलंका, थाइलैंड व बांग्लादेश हंै, चीन को तो छोड़ ही दिया जाए। इस बार के बजट में यद्यपि स्वास्थ्य हेतु 30,702 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह पिछले बजट से 14 प्रतिशत ज्यादा है, लेकिन यह 11वीं पंचवर्षीय योजना में किए गए सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 से 3 प्रतिशत के वायदे से काफी कम है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का बजट भी पिछली बार से 15 प्रतिशत बढ़ाकर 20,822 करोड़ रुपये कर दिया गया है। सरकार ने चिकित्सा शिक्षा के लिए 4182.38 करोड़ रुपये का प्रशिक्षण व शोध प्रावधान भी इस बजट में किया है। योजना आयोग के अनुसार भारत में अभी छह लाख चिकित्सकों, 10 लाख नर्सो तथा 2 लाख दंत चिकित्सकों की कमी है। इनके साथ-साथ पैरामेडिकल स्टॉफ की भी भारी कमी है। मध्य प्रदेश में चिकित्सा विशेषज्ञों की भारी कमी है। यहां के 1155 प्राथमिक स्वास्थ्य केंदों में से 196 तो बिना चिकित्सकों के ही संचालित हैं। वर्तमान में देश में विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के लगभग 11,25,000 चिकित्सक विभिन्न चिकित्सा परिषदों में पंजीकृत हैं जिनमें से मात्र 1,25,000 ही सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे हैं। अर्थशास्त्र बताता है कि किसी भी सेवा का मूल उद्देश्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। लगातार स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के पीछे सरकार द्वारा अपनाई जा रही वह नीतियां हैं जो आम लोगों से किए वायदों के खिलाफ जाती हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 में कहा गया है कि सार्वजनिक स्रोतों का उपयोग समाज के सभी वर्गो के लिए नहीं, बल्कि कुछ विशेष पात्रता वाले वर्गो के लिए ही किया जाएगा। जो लोग सक्षम हैं, उनसे यह आशा की जाती है कि वे निजी क्षेत्रों से स्वास्थ्य सेवाओं को खरीदें। निजीतंत्र को स्थापित किए जाने हेतु सरकार ने आर्थिक खासकर विदेशी निवेश, बीमा पॉलिसी, कर छूट आदि कई ऐसे प्रावधान किए हैं जो कि स्वास्थ्य सेवाओं को बाजारीकृत करने में मददगार है। इसके अलावा मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा दिए जाने से से भी निजीकरण को मदद मिली है। इनके मद्देनजर तमाम राज्यों की सरकारों ने किस्म-किस्म के विशेष पैकेज बनाए हैं ताकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी तंत्र के निवेश को उभारा जा सके। निजी चिकित्सा और नर्सिग महाविद्यालय, निजी अस्पताल, नर्सिग होम्स, डायग्नोस्टिक केंद्र इत्यादि खोलने वालों के हौसले बढ़ाने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करती है। इसके लिए उन्हें सस्ती जमीनें, स्टांप ड्यूटी में छूट, बिजली के बिलों में छूट आदि दिया जाता है। विकास के दोषपूर्ण मॉडल के क्रियान्वयन से लोगों की जीवन शैली में कई नकारात्मक किस्म के बदलाव आने स्वाभाविक हैं। आज जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां ज्यादा देखने को मिल रही हैं। वर्ष 2009 के अपने दस्तावेज में मध्य प्रदेश सरकार ने पीपीपी यानी निजी सरकारी सहभागिता को और बढ़ाने पर जोर दिया है। पीपीपी मॉडल को आम जन के हित में बताने के लिए इसे निजी निवेश से चलने वाली सार्वजनिक परियोजना का नाम दिया गया है। यह अलग बात है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी का सर्वाधिक खामियाजा आम लोगों को ही उठाना पड़ता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकारों को ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। इस तरह के रास्ते निर्धारित हों जिससे स्वास्थ्य के लिए आवंटित बजट को समुदाय की निगरानी में लाया जाए ताकि लोगों की जेबें न कटें। इस हेतु निजी तंत्र को नियंत्रित रखते हुए व्यावहारिक भागीदारी निभानी होगी। आम जनता के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की देखरेख को सुनिश्चित कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी है। इसके लिए जरूरी है कि सरकारें अपने एजेंडे को न भूलें और आम जनता से किए गए वायदों को पूरा करें। स्वास्थ्य, शिक्षा जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं, जिन्हें पूरा कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, April 3, 2012

दिल की बीमारी से सबसे अधिक मौतें

सरकार ने बताया कि देश में हृदय रोग के कारण सबसे अधिक 18.7 प्रतिशत लोगों की मौत होती है। लोकसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि भारत के महापंजीयक द्वारा देश में मौत के कारणों के एक मूल्यांकन में यह बात सामने आई है कि हृदय से जुड़े रोग के कारण 18.7 प्रतिशत लोगों की मौत होती है, जबकि दमा एवं सन संबंधी बीमारी के कारण 8.7 प्रतिशत, अतिसार रोग के कारण 8.1 प्रतिशत लोग, पैरीनैटन कंडिशन के कारण 6.3 प्रतिशत लोग, क्षय रोग के कारण 6 प्रतिशत लोगों के मौत की बात सामने आई है। यह अनुमान 2001-2003 की अवधि से संबंधित आंकड़ों के आधार पर लगाए गए हैं। मंत्री ने कहा कि इस अनुमान के मुताबिक भारत में प्रति लाख आबादी पर लगभग 105 व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। जरूरत से कम एकत्र हो रहा है खून : सरकार ने बताया कि देश में जरूरत से कम खून एकत्र किया जा रहा है। लोकसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि देश में प्रति वर्ष एक करोड़ इकाई खून की जरूरत है। अप्रैल 2011 से जनवरी 2012 तक 77.14 लाख इकाई खून एकत्र किया गया। उन्होंने कहा कि देश में इस समय 2,517 ब्लड बैंक हैं। लोकसभा में मंत्री ने बताया हृदय रोग के कारण 18.7 प्रतिशत, दमा एवं सन संबंधी बीमारी के कारण 8.7 प्रतिशत, अतिसार के कारण 8.1 प्रतिशत, पैरीनैटन कंडिशन के कारण 6.3 प्रतिशत, क्षय के कारण 6 प्रतिशत लोगों की मौत होती है