भारतीय संस्कृति और विज्ञान का प्रादुर्भाव हजारों वर्ष पहले पर्वतमालाओं के वन प्रांतों, हरित घाटियों और नदियों के स्वच्छ किनारों और विशाल सागर तटों पर हुआ। वैदिक काल में ऋषि-मुनि जनकल्याण की कामना को लेकर सुदूर प्रकृति की गोद में गहन तप और शोध करते थे। ऐसी तपस्या का परिणाम आयुर्वेद संभवत: विश्व का सर्वाधिक समृद्ध और प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है, लेकिन आज आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर बाजार में जो कुछ बेचा जा रहा है, उसके कुप्रभाव अंग्रेजी दवाओं से भी अधिक घातक हैं। पिछले दिनों अमेरिका के हॉर्वर्ड मेडिकल कॉलेज ने अमेरिका में बिक रही कोई 70 भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं का अध्ययन किया तो उनमें सीसा, पारा, संखिया आदि की मात्रा जानलेवा स्तर तक मिलीं। इनमें से अधिकांश दवाएं भारत की नामी-गिरामी दवा कंपनियों की थीं। बढ़ता औद्योगिकीकरण और उससे उपजे प्रदूषण की देन घातक बीमारियां हैं। इन बीमारियों से निबटने के लिए आई अंग्रेजी दवाओं की बाढ़ किसी नई बीमारी का बीज होती है। सुरक्षित दवाओं के लिए लोग एक बार फिर अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की ओर लौट रहे हैं। जब आम लोग तत्काल रोगमुक्ति के लालच में सस्ती अंग्रेजी दवाओं की ओर दौड़ रहे थे तब भारत के अभिजात्य वर्ग और पश्चिमी देशों ने इस चिकित्सा पद्धति के कुप्रभावों को ताड़ लिया और उन्होंने हर्बल दवाओं के रूप में जड़ी-बूटियों को अपनाया। विदेशी दवा कंपनियों ने जब देखा कि भारत की बहुसंख्यक आबादी उनकी जहरीली दवाओं की आदी हो गई है तो उन्होंने धीरे-धीरे दाम बढ़ाने शुरू किए। आम लोगों को जब इस विदेशी कुचक्र की सुध लगी, तब तक काफी देर हो चुकी थी। तपस्या से तैयार जड़ी-बूटियों की दवाओं का व्यवसायीकरण हो चुका था। आज बाजार आयुर्वेद दवाओं से पटा पड़ा है, लेकिन उनमें मुनियों की जनकल्याण भावना का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है। अधिकांश आयुर्वेदिक दवाएं जिनके नाम के साथ रस शब्द जुड़ा होता है में पारे की बहुत अधिक मात्रा होती है। बावजूद इसके ऐसी दवाओं के कुप्रभावों को जांचने के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। कुछ साल पहले जाने-माने आयुर्वेद डॉक्टरों प्रो. बीएन मिश्रा और डा. बीके मोहंती ने ऐसी दवाओं के परीक्षण चूहों पर किए तो पाया कि उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली पर खतरनाक असर दिखा। इन दोनों डॉक्टरों की किताब हेजार्ड ऑफ मरकरी इन आयुर्वेदिक ड्ग्स में दावा किया गया है कि ये दवाएं चूहों की तरह ही मानव शरीर पर भी विपरीत प्रभावकारी हैं। भारत सरकार ने इन रपटों को कतई गंभीरता से नहीं लिया। जब लगभग यही बात हार्वर्ड मेडिकल कॉलेज ने कही तो सरकार में बैठे लोगों को देश की छवि का ध्यान आया। कतिपय आयुर्वेदाचार्य दावा करते हैं कि उनकी दवाइयों में प्रयुक्त पारा पहले परिष्कृत किया जाता है जिससे उसका नुकसानदायक तत्व समाप्त हो जाता है, लेकिन परीक्षणों से साबित होता है कि यह दावा गलत है, क्योंकि दवाओं में मौजूद पारे के कारण चूहों पर हानिकारक असर पड़ा। कजली एक आधारभूत दवा है और यह अधिकांश आयुर्वेदिक दवाओं का मुख्य हिस्सा होता है। इसका उपयोग त्वचा और यौन रोग आदि में मलहम के रूप में भी होता है। कोई 200 दवाएं होंगी, जिनमें कजली प्रमुख घटक है। शोध के दौरान जिन चूहों को कजली दी गई थी उनके शरीर में कई परिवर्तन देखे गए। इसमें मौजूद पारे के कारण चूहों की भूख, रक्त, सक्रियता और वजन घट गया। उनके मस्तिष्क, गुर्दे और यकृत में पाई गई पारे की उच्च मात्रा दर्शाती है कि यह धातु शरीर की कोशिकाओं द्वारा आसानी से अवशोषित की जा रही है। कजली देना रोकने के कुछ दिनों बाद चूहों का फिर से परीक्षण किया गया तो मालूम चला कि उनके गुर्दे और यकृत की कार्यप्रणाली न सुधरने की हद तक बिगड़ चुकी थी। कजली में 49 प्रतिशत पारा और 40 फीसदी गंधक होता है। प्रो. मिश्र और डा. मोहंती चेताते हैं कि कजली स्तनधारी जीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है अत: इसके प्रयोग से हरसंभव रूप में बचना चाहिए। ध्यान रहे कि कजली आमतौर पर प्रतिदिन 1000 मिग्रा की मात्रा में दी जाती है। इसी तरह कफ के लिए प्रयुक्त दवा बिसेस्वर रस में कजली के साथ लोहा और जड़ी बूटियां होती हैं। मृतसंजीवनी रस और रस सिंदूर स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक के तौर पर बेची जाती है। इन दोनों दवाओं में कुछ जड़ी-बूटियों के अलावा मुख्य घटक कजली ही होता है। फाइलेरिया, तपेदिक बुखार में प्रयुक्त नित्यानंद रस हो या फिर हृदय रोग की दवा पंचानन रस या फिर मधुमेह का निदान प्रमेह सेतु इन सभी में पारे की उंची मात्रा वाली कजली मौजूद होती है। व्यावयासिक आयुर्वेदिक दवाओं में समस्या केवल पारे की मौजूदगी ही नहीं है। कुछ समय पहले मुंबई के भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने कुछ आयुर्वेद दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई थी। इन दवाओं को ले रहे मरीजों के खून में यह जहर बुरी तरह घुल गया था। बार्क के वैज्ञानिकों ने ऐसे चार मरीजों का गहन परीक्षण किया जो अर्थराइटिस या मधुमेह के कारण आयुर्वेद दवाएं खा रहे थे। इन दवाओं में सीसे की मात्रा लगभग आठ मिलीग्राम थी जो रोजाना खाने या हवा के जरिए शरीर में पहुंच रहे सीसे की मात्रा से 80 गुना अधिक है। बार्क की टीम ने एक अन्य विषैली धातु कैडमियम को भी ऐसी दवाओं में पाया। चार साल पहले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अक्युपेशनल हेल्थ, अमदाबाद ने भी कुछ पारंपरिक दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा पाई थी। इस संस्था के शोधकर्ताओं ने एक दवा में 27,500 पीपीएम और दूसरी में 9700 पीपीएम सीसे की मात्रा पाई। भारत में कोई चार लाख वैद्य पारपंरिक जड़ी-बूटियों से इलाज करते हैं। इनमें से अधिकांश खुद ही दवा तैयार करते हैं इसलिए दवाओं के मानक के कायदे कानूनों का पालन संभव नहीं होता। कई नामी-गिरामी उत्पादकों की आयुर्वेद दवाएं भी जहर से कम नहीं हैं। एक स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनी का उत्पाद इसेंसल लीवर या यकृत की बीमारियों की कारगर दवा के नाम पर बेची जाती है। एक स्वतंत्र संस्था फाउंडेशन ऑफ हेल्थ एक्शन के मुताबिक इस दवा में ऐसी कोई क्षमता ही नहीं हैं। दो राज्यों महाराष्ट्र और गुजरात में इस उत्पाद का लाइसेंस तक निरस्त हो चुका है। कर्पूरआसव में मौजूद अल्कोहल की अधिक मात्रा के कारण इसका सेवन शराबी लोग खुल कर करते है। नवंबर 1991 में इसी दवा यानी शराब को पीने कारण दिल्ली में 200 मौतें हुई थीं। जो बच गए वे अंधे हो गए थे। आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर शराब बेचना आम बात होती जा रही है। ऐसे सैकड़ों टॉनिक और कफ सिरप देश के छोटे-छोटे कस्बों तक में सहजता से खरीरे जा सकते हैं। आयुर्वेद की मान्यता आज के विकसित तकनीकी युग में भी पूर्णरूपेण खरी उतर सकती है, बशर्ते सुरक्षित और प्रभावी आयुर्वेद दवाओं के उत्पादन और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के सही उपयोग की पद्धति को बरकरार रखा जाए। इसके लिए सरकार को कारगर कदम उठाना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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