दुनिया में हर 20 सेकेंड में एक बच्चे की मौत निमोनिया से होती है। देश में निमोनिया बच्चों के लिए सबसे घातक बीमारियों में से एक है। इससे हर साल पांच साल की उम्र से कम 3.70 लाख से अधिक बच्चों की मौत होती है। दिल्ली हार्ट एंड लंग संस्थान कार्डियोलॉजी सेंटर के निदेशक डॉ. अनिल ढल ने कहा कि देश में निमोनिया के हमले से हर साल 60 लाख से अधिक बच्चे प्रभावित होते हैं। उन्हें सेहत संबंधी कई तरह की दीर्घकालीन परेशानियां हो जाती हैं। बच्चों में निमोनिया एवं रोकथाम विषयक गोष्ठी में डॉ. ढल ने कहा कि वैिक स्तर पर हर 20 सेकेंड में एक बच्चे की मौत निमोनिया से होती है। हर साल करीब 14 लाख बच्चों की मौत इस बीमारी से होती है। वल्लभ भाई पटेल चेस्ट संस्थान में सन एवं फेफड़ा संबंधी संक्रमण विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार ने बच्चों में बढ़ती निमोनिया के मामलों के लिए प्रसूति केंद्रों में हॉस्पिटल संक्रमण एवं वहां स्थापित फोटो थेरेपी नर्सरी में स्वच्छंदता का संतोषजनक इंतजाम नहीं होना बताया। उन्होंने सभी अस्पताल प्रमुखों को सुझाव दिया कि वे अपने यहां पीडियाट्रिक नर्सरी में हॉस्पिटल इंफेक्शन मुक्त करने पर विशेष एहतियात बरतें। ऐसा करने से कम से कम 10 फीसद बच्चों के जीवन को निमोनिया समेत अन्य कई जन्म के बाद होने वाले रोगों की गिरफ्त में आने से बचाया जा सकता है।
Wednesday, May 23, 2012
Saturday, May 19, 2012
हर 20 सेकेंड पर एक बच्चे की होती है निमोनिया से मौत
दुनिया में हर 20 सेकेंड में एक बच्चे की मौत निमोनिया से होती है। देश में निमोनिया बच्चों के लिए सबसे घातक बीमारियों में से एक है। इससे हर साल पांच साल की उम्र से कम 3.70 लाख से अधिक बच्चों की मौत होती है। दिल्ली हार्ट एंड लंग संस्थान कार्डियोलॉजी सेंटर के निदेशक डॉ. अनिल ढल ने कहा कि देश में निमोनिया के हमले से हर साल 60 लाख से अधिक बच्चे प्रभावित होते हैं। उन्हें सेहत संबंधी कई तरह की दीर्घकालीन परेशानियां हो जाती हैं। बच्चों में निमोनिया एवं रोकथाम विषयक गोष्ठी में डॉ. ढल ने कहा कि वैिक स्तर पर हर 20 सेकेंड में एक बच्चे की मौत निमोनिया से होती है। हर साल करीब 14 लाख बच्चों की मौत इस बीमारी से होती है। वल्लभ भाई पटेल चेस्ट संस्थान में सन एवं फेफड़ा संबंधी संक्रमण विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार ने बच्चों में बढ़ती निमोनिया के मामलों के लिए प्रसूति केंद्रों में हॉस्पिटल संक्रमण एवं वहां स्थापित फोटो थेरेपी नर्सरी में स्वच्छंदता का संतोषजनक इंतजाम नहीं होना बताया। उन्होंने सभी अस्पताल प्रमुखों को सुझाव दिया कि वे अपने यहां पीडियाट्रिक नर्सरी में हॉस्पिटल इंफेक्शन मुक्त करने पर विशेष एहतियात बरतें। ऐसा करने से कम से कम 10 फीसद बच्चों के जीवन को निमोनिया समेत अन्य कई जन्म के बाद होने वाले रोगों की गिरफ्त में आने से बचाया जा सकता है। कनाडा, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया सहित कई अन्य देशों में या तो बेचा ही नहीं जाता है, या फिर वापस ले लिया गया है। समिति ने उन दवा उद्योगों और मेडिकल विशेषज्ञों के बीच साठगांठ की ओर इशारा किया है जो कि ‘व्यक्तिगत सोच’ के आधार पर ‘असुरक्षित’ दवाओं के उपयोग पर जोर देते हैं। समिति ने दवा क्षेत्र में चल रही साठगांठ पर गहरी चिंता और अप्रसन्नता व्यक्त की है। समिति ने कहा है कि मंत्रालय को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि केन्द्रीय दवा मानक नियंतण्रसंगठन के कर्मचारी नई दवाओं को मंजूरी देने में किसी तरह की अनियमितताओं में लिप्त नहीं हों।
भारत में बिकती हैं विकसित देशों में प्रतिबंधित दवाएं
दवा कंपनियों, दवा नियंत्रक संगठन तथा मेडिकल विशेषज्ञों के बीच नई दवाओं को मंजूरी के लिए ‘साठगांठ’ की तरफ इशारा करते हुए एक संसदीय समिति ने कहा है कि विकसित देशों में प्रतिबंधित दवाएं भारत में बेची जाती हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर संसद की स्थायी समिति ने नई दवाओं को मंजूरी में गंभीर खामियों और अनियमितताओं की तरफ भी इशारा किया है। समिति ने कहा है कि 33 ऐसी दवाओं को भारतीय मरीजों पर क्लिनिकल परीक्षण के बिना मंजूरी दे दी गई। समिति ने केंद्रीय दवा मानक नियंत्रक संगठन (सीडीएससीओ) द्वारा मंजूर नई दवाओं के भारतीय मरीजों द्वारा इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए कहा है कि इस मामले की समीक्षा की जानी चाहिए जिससे मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और इस क्षेत्र में पारदर्शिता, ईमानदारी और उत्तरदायित्व आए। समिति ने कहा है कि 42 दवाओं की छानबीन में यह तथ्य सामने आया है कि इन्हें नियामक प्रक्रि याओं और नियमों का उल्लंघन करते हुए अनुमति दी गई। तीन विवादास्पद दवाओं पीफ्लोक्सिन, लोमफ्लोक्सिन तथा स्पारफ्लोक्सिन की फाइलें गायब थीं। इन दवाओं को अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया सहित कई अन्य देशों में या तो बेचा ही नहीं जाता है, या फिर वापस ले लिया गया है। समिति ने उन दवा उद्योगों और मेडिकल विशेषज्ञों के बीच साठगांठ की ओर इशारा किया है जो कि ‘व्यक्तिगत सोच’ के आधार पर ‘असुरक्षित’ दवाओं के उपयोग पर जोर देते हैं। समिति ने दवा क्षेत्र में चल रही साठगांठ पर गहरी चिंता और अप्रसन्नता व्यक्त की है। समिति ने कहा है कि मंत्रालय को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि केन्द्रीय दवा मानक नियंतण्रसंगठन के कर्मचारी नई दवाओं को मंजूरी देने में किसी तरह की अनियमितताओं में लिप्त नहीं हों।
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