Thursday, July 12, 2012

जिंदगियों के बजाय नाक बचाने में लगा केंद्र


मंत्रालय की दिलचस्पी गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर घटाने से ज्यादा नाक बचाने में है। तीन साल बाद सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (एमडीजी) की समय सीमा पूरी हो रही है और भारत लक्ष्य से बेहद पीछे है। ऐसे में लक्ष्य पूरा करने की बजाय लक्ष्य को ही बदल दिया है। यहां तक कि अपनी नाकामी सामने न आ जाए, इसलिए यह भारत सरकार के आंकड़ों को ही अविश्वसनीय बता रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव मनोज झलानी ने दावा किया कि एमडीजी के मुताबिक वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु दर को प्रति लाख प्रसव पर 150 तक लाना है। मौजूदा रफ्तार से अतिरिक्त प्रयास किए बिना ही हम समय रहते इसे 143 तक पहुंचा देंगे। झलानी स्वास्थ्य मंत्रालय से संबद्ध जनसंख्या स्थिरता कोष के कार्यकारी निदेशक भी हैं। कोष के आंकड़ों में भी माना गया है कि एमडीजी के तहत वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु दर को घटाकर 100 तक करने का लक्ष्य रखा गया है। भारत के महापंजीयक का कार्यालय भी 100-109 के आंकड़े को सही मानता है। झलानी का कहना है कि विकास दर के लक्ष्य को संशोधित कर इसे 150 कर दिया गया है। उनके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था कि आधिकारिक तौर पर यह फैसला कब लिया गया और क्या भविष्य में सरकार इसी आंकड़े को सही मानेगी। उन्होंने कहा कि एमडीजी तो संयुक्त राष्ट्र तय करता है और उसी ने यह बदलाव किया है। संयुक्त राष्ट्र की इंटर एजेंसी अनुमान के मुताबिक 1990 में प्रत्येक लाख प्रसव पर 600 माताओं की मौत होती थी। एमडीजी सिर्फ इतना कहता है कि वर्ष 2015 तक इसे तीन चौथाई घटा लेना है। इसलिए अब यह लक्ष्य 150 ही माना जाएगा। सच्चाई यह है कि भारत सरकार अब तक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे पर ही यकीन करती है। यह बताता है कि 1992-93 में यह 437 था, इसलिए वर्ष 2015 के लिए मातृत्व मृत्यु दर का लक्ष्य 109 ही माना जाएगा। आश्चर्य की बात है कि जब लक्ष्य को आगे बढ़ाना है, तो स्वास्थ्य मंत्रालय और इसके अधिकारी बजाय सरकारी आंकड़ों के अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के आंकड़ों को सही मान रहे हैं।

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