Monday, July 23, 2012

क्या हमें ठीक से जांचा जा रहा है


भारत की शीर्ष अदालत ने बड़े पैमाने पर और कभी-कभी तो गैरकानूनी ढंग से किए जा रहे दवाओं के नैदानिक परीक्षणों में जीवन न बचाए जाने पर हाल ही में केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार की भ‌र्त्सना की है। एक आरटीआइ के जवाब में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) द्वारा बताए गए आंकड़े स्तब्ध कर देने वाले हैं। इनके मुताबिक, वर्ष 2008 से 2010 तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाओं के नैदानिक परीक्षण से 1,600 लोगों की मौत हो गई। जनवरी और जून 2010 के बीच वैश्विक कंपनियों ने 117 और भारतीय कंपनियों ने 134 परीक्षण कराए। 2009 में यह संख्या 258 और 195 तथा 2007 में 246 और 275 थी। 2008 से 2011 के बीच 2,031 मौतों ने हमारी सरकार के सामने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे मजबूर होकर उसे दवाओं के नैदिक परीक्षण की अनुमति देने की प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए निरीक्षण समिति बनानी पड़ी। याचिकाकर्ता गैरसरकारी संगठन स्वास्थ्य अधिकार मंच के वकील संजय पारिख मध्य प्रदेश सरकार पर आरोप लगाते हैं कि उसने अधिकतर महिलाओं, बच्चों और मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों पर परीक्षण करने वाली कंपनी पर महज 500 रुपये का जुर्माना लगाकर उसे आसानी से जाने दिया। सरकार पर दबाव है, क्योंकि हर तरफ से सवाल उठ रहे हैं और चूंकि लगातार मौतें हो रही हैं, इसलिए नियामक तंत्र पूरी तरह बेअसर होने की बात पुख्ता होती जा रही है। मौतों का आंकड़ा 2007 में 132, 2008 में 288, 2009 में 637 और अंतत: 2010 में बढ़कर 668 तक पहुंच गया और भी ज्यादा परेशान कर देने वाली बात यह है कि दवा निर्माता कंपनियां मृतकों के परिवारों को वाजिब मुआवजा देने में भी उदासीनता बरत रही हैं, जिससे इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का उचित निस्तारण हो सके। 2010 में हुई कुल 668 मौतों के मामले में सरकार के कई बार कहने के बावजूद दवा कंपनियों ने केवल 22 परिवारों को मुआवजा दिया है। वह भी बहुत मामूली। दवाओं के नैदानिक परीक्षण करने के लिए ड्रग कंट्रोलर से स्वीकृति लेना अनिवार्य है, जिसके बारे में बहुत सारे लोगों का मानना है कि वह लापरवाही और भ्रष्टाचार से भरा पड़ा है। मैं शर्त लगा सकता हूं कि हम में से 80 फीसदी लोगों को इसका कोई अंदाजा तक नहीं होगा कि अस्पतालों में हमें गिनी पिग की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। सभी शिकायतों पर ध्यान दिए जाने के लिए जरूरी है कि एक केंद्रीय पोर्टल बनाया जाए। संडे इंडियन ब्लॉग में प्रसून एस मजूमदार

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