Monday, December 3, 2012

बच्चों में टीबी की पहचान होगी आसान

बच्चों में टीबी की पहचान होगी आसान
ठ्ठ मुकेश केजरीवाल, चेन्नई टीबी के शिकार बच्चों को अब इसकी पहचान के अभाव में इलाज से वंचित नहीं रहना पड़ेगा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने बच्चों में जीन एक्सपर्ट तकनीक की उपयोगिता का अध्ययन शुरू कर दिया है। यह तकनीक कामयाब रही तो बलगम की सूक्ष्मदर्शी जांच पर पिछले सौ सालों से चली आ रही निर्भरता दूर हो सकेगी। आइसीएमआर के राष्ट्रीय क्षयरोग शोध संस्थान ने इसकी उपयोगिता आंकने के लिए 15 साल से कम उम्र के टीबी के दो हजार मरीजों के बीच अध्ययन शुरू कर दिया है। बाल क्षयरोग की शीर्ष विशेषज्ञ और इस संस्थान की निदेशक सौम्या स्वामीनाथन ने बताया कि वर्ष 2014 तक अध्ययन पूरा हो जाएगा। ऐसे मरीजों के नमूनों की न सिर्फ जीन एक्सपर्ट तकनीक से जांच की जाएगी, बल्कि कल्चर जांच भी की जाएगी। चेन्नई का बाल अस्पताल और स्टैनली अस्पताल के अलावा क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लूर भी इस अध्ययन में शामिल है। जीन एक्सपर्ट को विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे मंजूरी दे चुका है। बच्चों के लिए अलग से इसके प्रभाव का अध्ययन जरूरी है ताकि बच्चों में नए मामलों की भी सीधे इसी तरीके से जांच शुरू की जा सके। अभी बच्चों में नए मामलों की जांच के लिए बलगम की सूक्ष्मदर्शी जांच, फेफड़े के एक्सरे या ट्यूबरक्यूलिन स्किन टेस्ट का इस्तेमाल हो रहा है। खून के नमूने से होने वाली जांच तो इतनी भ्रामक है कि सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। नई तकनीक से यह दो घंटे में मुमकिन है। पहली बार में ही दवा प्रतिरोध का भी पता चल जाता है। संशोधित राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम में पायलट योजना के तहत 28 जगहों पर नई तकनीक से जांच करने वाली मशीन का इस्तेमाल हो रहा है। इन जगहों पर वयस्क मरीज ज्यादा आते हैं। मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि जल्द ही सभी जिलों और सरकारी मेडिकल कालेजों में लगाने के लिए दस लाख रुपये की कीमत वाली ऐसी 950 मशीनें खरीदी जा सकती हैं।
1.       Dainik Jagran National Edition 3-12-2012 Page-3 (LokLF;)

एड्स के लिहाज से बेहद संवेदनशील बांदा



पिछले पांच साल के दौरान मंडल में एड्स से 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 84 लोग तो सिर्फ बांदा के ही हैं
बांदा (एजेंसी)। उत्तर प्रदेश का बांदा जिला एचआईवी (एड्स) के लिहाज से काफी संवेदनशील है। आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। जिला एड्स कार्यक्र म के प्रबंधक बृजेश कुमार ने आज यहां बताया कि चित्रकूटधाम मण्डल के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच साल के दौरान मण्डल में एड्स से 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 84 लोग तो सिर्फ बांदा के ही हैं। उन्होंने बताया कि चित्रकूटधाम मण्डल में एड्स के सबसे ज्यादा 391 रोगी बांदा में हैं जिनमें 239 पुरुष तथा 152 महिलाएं हैं। इसके अलावा जिले में पिछले पांच साल के दौरान इस रोग से 65 पुरुषों, 13 महिलाओं और छह बच्चों की मौत हो चुकी है। कुमार ने बताया कि मण्डल के चित्रकूट जिले में पिछले पांच वर्षो में एड्स से 12 लोगों की मृत्यु हुई है और इस अवधि में जनपद में 145 लोग एचआईवी (एड्स) से ग्रस्त हैं। इसके अलावा हमीरपुर में पिछले एक साल में इस रोग से तीन लोगों की मौत हुई है और मौजूदा वक्त में 24 लोग इस लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं। कुमार ने बताया कि महोबा जिले में पिछले एक वर्ष के दौरान 5364 लोगों की जांच हुई जिनमें से चार को एचआईवी पाजिटिव पाया गया है।
1.                      Rashtirya sahara National Edition 3-12-2012 Page 13 (LokLF;)

Saturday, December 1, 2012

पंजाब, बिहार व यूपी में हाई बीपी का खतरा कम

पंजाब, बिहार व यूपी में हाई बीपी का खतरा कम
ठ्ठ मुकेश केजरीवाल, नई दिल्ली यह इतनी बड़ी चिंता की बात नहीं कि आप पहले ही अपना बीपी यानी रक्तचाप बढ़ा लें। लेकिन आपकी उम्र 30 से ज्यादा हो गई है तो सावधान और सतर्क होने की जरूरत ज्यादा है। देश में इससे ज्यादा उम्र के 1.06 करोड़ लोगों की पहली बार की गई जांच में 6.18 फीसद लोगों का बीपी बढ़ा पाया गया है। हालांकि पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या काफी कम पाई गई। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मदद से हुई इस व्यापक जांच के मुताबिक पंजाब के लोगों में यह खतरा सबसे कम पाया गया है। यहां एक प्रतिशत से भी कम लोग इसकी जद में हैं। राष्ट्रीय कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग तथा लकवा बचाव और नियंत्रण कार्यक्रम के तहत सामने आए आंकड़े इस लिहाज से थोड़ी राहत भी देते हैं, क्योंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसएमआर) के अनुमान से ये काफी कम हैं। इसने भारत की कुल आबादी के 15.94 फीसद लोगों को यह समस्या होने की आशंका जताई थी। मगर 20 राज्यों के सौ जिलों में 1.06 करोड़ लोगों की जांच में कुल 6.18 फीसद ऐसे पाए गए, जिनका रक्तचाप 140-90 से ज्यादा था। उच्च रक्तचाप की समस्या सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में पाई गई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि उच्च रक्तचाप प्रभावित लोग नियमित संतुलित आहार लेने, पर्याप्त पानी पीने, रोजाना व्यायाम करने जैसे कदम उठा कर आसानी से सामान्य जीवन जी सकते हैं। हालांकि ऐसे लोगों को तंबाकू या बीड़ी, सिगरेट आदि की आदत तुरंत छोड़ देनी चाहिए। समय रहते सावधानी नहीं बरतने पर यह आपकी किडनी और हृदय सहित कई महत्वपूर्ण अंगों को यह प्रभावित कर सकता है।
Dainik Jagran National Edition 1-12-2012 Page -14 Health

दिल्ली में हर साल 5000 एचआइवी मरीज


ठ्ठराहुल आनंद, नई दिल्ली 195 एनजीओ का परिश्रम और 10 करोड़ के बजट के बावजूद राजधानी में औसतन हर साल 5 हजार एचआइवी के नए मरीज बढ़ रहे हैं, जो यह साबित करता है कि कहीं न कहीं सरकारी सिस्टम में कोई बड़ी गड़बड़ी है। इतना जरूर है कि सरकार और एनजीओ एचआइवी के मामले को लेकर हल्ला मचाने में कभी पीछे नहीं रहे हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इसे नियंत्रित करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। वर्ष 2007 में दिल्ली में एचआइवी के मरीजों की संख्या 13,494 थी जो वर्ष 2011 तक बढ़ कर 35,036 तक पहुंच गई है। जानकारों का कहना है कि एचआइवी मरीजों की संख्या और अधिक हो सकती है, क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे लोग पंजीकरण नहीं कराते। दिल्ली राज्य एड्स कंट्रोल सोसायटी के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में दिल्ली में एचआइवी के 5,502 नए मरीजों का पंजीकरण किया गया है। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी हैं। एक आरटीआइ से हुए इस खुलासे से दिल्ली सरकार का स्वास्थ्य विभाग भी हैरत में है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. एके वालिया ने एचआइवी के बढ़ते मरीजों की वजह और इस पर किए जा रहे कार्यो की समीक्षा की बात कही है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि इस पर नियंत्रण के लिए सभी जरूरी प्रयास किए जाएंगे। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. हरीश गुप्ता कहते हैं कि इसे नियंत्रित करने में कहीं न कहीं सरकार का प्रयास उस स्तर का नहीं रहा है, जिससे इस पर पूरी तरह से नियंत्रण पाया जा सके। बचाव ही इस बीमारी का एकमात्र तरीका है और डॉक्टरों के साथ-साथ सरकार को भी इस पर ही फोकस करना चाहिए। खास कर, जागरूकता कार्यक्रम में युवाओं को शामिल करने की जरूरत है, जो इस बात को दूसरे तक भी पहुंचाने में मददगार होंगे। आरटीआइ एक्टिविस्ट राजहंस बंसल ने कहा कि आरटीआई के इस खुलासे से साफ होता है कि भले ही हमारे यहां पैसे की कमी नहीं है लेकिन इच्छाशक्ति की कमी की वजह से एचआइवी एड्स मरीजों की संख्या को नियंत्रित करने में सरकार विफल हो रही है।
1.     Dainik Jagran National Edition 1-12-2012 Page -2 LokLF;)