Friday, November 30, 2012

सस्ती दवाओं का सब्जबाग

सस्ती दवाओं का सब्जबाग


लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार सरकार ने दवा मूल्य नीति को मंजूरी दे दी। इससे 348 आवश्यक दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में आ जाएंगी, जिससे इनकी कीमतों में कमी होगी। जिस देश में इलाज का 72 फीसद महंगी ब्रांडेड दवाओं को खरीदने में खर्च हो रहा हो, वहां ऐसी मूल्य नीति की दरकार लंबे अरसे से थी। दुर्भाग्यवश सरकार ने यह कदम जन कल्याण से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार और इसके लिए 27 नवंबर की समय-सीमा निर्धारित करने के बाद उठाया है। सुप्रीम कोर्ट इन दिनों ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क और अन्य की ओर से 2003 में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इस याचिका में शिकायत की गई थी कि इस समय करीब 74 दवाएं ही औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश-1995 के तहत हैं और इसके कारण शेष दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। भारत दुनिया के उन देशों में से एक है, जहां दवाएं अत्यंत सस्ती हैं। दरअसल, कुछ साल पहले तक देश में उत्पाद पेटेंट के बजाय प्रक्रिया पेटेंट लागू था। इसके बल पर भारतीय दवा उद्योग ने तीन उपलब्धियां हासिल की। पहली, भारतीय बाजार में उपलब्ध दवाओं के सैकड़ों ब्रांड हो गए। दूसरे, देश में 20 हजार से भी अधिक दवा कंपनियां अस्तित्व में आ गई। तीसरे, भारत ने रसायन फाम्र्यूलेशन में अत्यधिक महारत हासिल कर ली। दुर्भाग्यवश ये उपलब्धियां आम भारतीयों के बहुत काम की नहीं रहीं, क्योंकि दवा कंपनियों और डॉक्टरों के गठजोड़ से दवाएं महंगी बनी हुई हैं। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा दवाओं के संबंध में कराए गए शोध में पाया गया कि देश-विदेश की जानी-मानी दवा कंपनियां भारतीय बाजार में 203 से 1123 फीसद तक मुनाफा कमा रही हैं। जैसे-जैसे निजी दवा कंपनियों का आधिपत्य बढ़ रहा है, दवाओं पर होने वाला खर्च बढ़ता जा रहा है। एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक अस्पतालों में भर्ती मरीजों को जहां 1986 में 31.2 फीसद दवाएं मुफ्त में मिलती थी, वहीं 2004 में यह अनुपात 9 फीसद रह गया। मर्ज बढ़ाती महंगी दवाएं महंगी दवाओं का ही परिणाम है कि करोड़ों परिवार दवाओं का भार उठाने में अपने को असमर्थ पाते हैं। जहां नौ के दशक में इलाज के दौरान संतोषजनक पैमाने पर दवा खरीद सकने वाले परिवारों की संख्या 80 फीसद थी, वहीं 2004 में यह अनुपात 65 फीसद रह गया। इसी को देखते हुए योजना आयोग की एक विशेषज्ञ समिति ने दवा खरीद पर सरकारी बजट बढ़ाने की सिफारिश की थी। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के तहत दवाओं की खरीद पर भारत फिलहाल छह हजार करोड़ रुपये खर्च करता है, जो सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.1 फीसद ही है। समिति ने इसे पांच गुना बढ़ाकर तीस हजार करोड़ रुपये करने का सुझाव दिया है। कमीशन ऑफ माइक्रो इकोनॉमिक्स एंड हेल्थ की गणना के मुताबिक भारत के सभी बाह्य रोगियों को यदि उच्च गुणवत्ता वाली जेनरिक दवाएं मुफ्त दी जाएं तो सालाना खर्च सिर्फ 9 हजार करोड़ रुपये होगा। 2012-13 के बजट में स्वास्थ्य पर लगभग 34,000 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान है। स्पष्ट है कि सरकार चाहे तो सस्ती दवाओं की उपलब्धता संभव है। इस संबंध में सरकारी प्रयास सफल भी रहे हैं। गौरतलब है कि सस्ती जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए 2008 में जन औषधालयों की शुरुआत की गई थी, जहां बाजार से दस गुनी तक कम कीमत पर दवाएं मिल रही हैं। इसी प्रकार तमिलनाडु और राजस्थान में जेनेरिक दवाओं के मुफ्त वितरण की योजना सफल रही है। पेटेंट से बाहर हो चुकी दवाएं बनाने में बहुत कम खर्च आता है। ऐसी दवाओं को जेनेरिक दवाएं कहते हैं। गुणवत्ता में ये मूल दवाओं जैसी ही होती हैं। इनके फा‌र्म्यूलेशन पर पेटेंट हो सकता है, लेकिन उसके सक्रिय घटक पर नहीं। सामान्यत: ये दवाएं उत्पादक से सीधे विक्रेता तक पहुंचती हैं। यहां एक और उल्लेखनीय बात है कि एक ही कंपनी की स्टैंडर्ड और जेनेरिक दवाओं के मूल्य में काफी अंतर होता है। चूंकि जेनेरिक दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकारी अंकुश होता है, इसलिए भी वे सस्ती होती हैं, जबकि स्टैंडर्ड दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय कर कती हैं। फिर ब्रांडेड दवाओं के प्रचार-प्रसार के लिए कंपनियां बड़ी-बड़ी पार्टियां भी आयोजित करती हैं, जिससे कंपनियों से लेकर बिचौलिए-डॉक्टर तक मुनाफा कमाते हैं, जबकि आम आदमी का दिवाला निकल जाता है। दवाओं की कीमत कम रखने पहला प्रयास 1975 में जयसुख लाल हाथी समिति की स्थापना के साथ हुआ। समिति ने जरूरी दवाओं के दाम कम रखने, सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद बढ़ाने और दवा वितरण तंत्र मजबूत करने जैसे कई सुझाव दिए थे, लेकिन समिति की सिफारिशें आंशिक रूप में ही अमल में लाई गई। फिर भी इससे कई आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रण में लाने में सहायता मिली, लेकिन 1987 और 1995 में सरकार ने इसमें कई संशोधन किए गए, जिससे 74 दवाओं को छोड़कर बाकी को बाजार के हवाले छोड़ दिया। भले ही सरकार दावा करे कि 74 दवाओं और उनके फाम्र्यूलेशन को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा गया है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस मामले में नाम बड़ा और दर्शन थोड़ा वाली कहावत चरितार्थ होती है, क्योंकि इनमें से कई ऐसी दवाएं हैं, जिनका उत्पादन कंपनियां लंबे समय से बंद कर चुकी हैं। फिर एड्स, कैंसर, हाइपरटेंशन, धमनी संबंधी बीमारियां, टीबी, डाइबिटीज, एनीमिया, टिटेनस, फाइलेरिया, हेपेटाइटिस-बी, रेबीज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हैं। अधिकतर निर्माता मुनाफे को देखते हुए कीमत तय करते हैं, जिससे विभिन्न कंपनियों की एक ही दवा की कीमतों में 10 से 40 गुना अंतर पाया जाता है। एनपीपीपी 2011 12वीं योजना में सभी को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने सस्ती दवाओं को मुहैया कराने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 2009 में मंत्रियों के समूह (जीओएम) का गठन किया गया था। दवाओं के मूल्य को लेकर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करने के मुद्दे पर विभिन्न हितधारकों, उद्योग जगत और सिविल सोसाइटी से विचार-विमर्श करने के बाद राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति (नेशनल फार्मास्यूसटिकल प्राइसिंग पॉलिसी यानी एनपीपीपी)- 2011 का ड्राफ्ट तैयार किया गया। इस ड्राफ्ट में 348 अनिवार्य दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण का सुझाव दिया गया है। इससे लगभग 60 फीसद फाम्र्यूलेशन मूल्य नियंत्रण के दायरे में आ जाएंगे। इस समय सिर्फ 20 फीसद फाम्र्यूलेशन ही मूल्य नियंत्रण के तहत है। ऊपर से देखने पर तो यह बड़ा कदम लगता है, लेकिन इनमें बड़ी संख्या उन दवाओं की है, जिनका उत्पादन कंपनियों ने बहुत पहले से बंद कर रखा है या फिर वे भारत में अप्रासंगिक हैं। इसके बावजूद सरकार के प्रस्ताव का विरोध हो रहा है। दवा निर्माताओं का कहना है कि यदि नई मूल्य नियंत्रण व्यवस्था को लागू किया गया तो दवा कंपनियों को घाटा होगा। इससे भारत को दवाओं तक आम लोगों की पहुंच सुलभ कराने में देरी होगी। साथ ही दवा क्षेत्र में इनोवेशन को झटका लगेगा। दवाओं पर गठित मंत्रियों के समूह ने आवश्यक दवाओं की कीमतें तय करने के लिए बाजार आधारित फार्मूले की सिफारिश की है। इसके तहत बाजार में एक फीसद से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाली सभी दवाओं की औसत कीमत के आधार पर दवाओं की कीमतें तय की जाएंगी। जानकारों का मानना है कि मूल्य नियंत्रण से बचने के लिए दवा कंपनियां आवश्यक दवाओं के उत्पादन में इस्तेमाल किए जाने वाले फाम्र्यूलेशन के स्थान पर वैकल्पिक फाम्र्यूलेशन का इस्तेमाल कर सकती हैं। ऐसे में कीमतें नियंत्रित करने के लिए सरकार की कोशिश बेकार साबित होगी। इसी के मद्देनजर विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और स्वास्थ्य मंत्रालय ने जरूरी दवाओं की कीमतें तय करने के लिए लागत आधारित फार्मूले का समर्थन किया था। समग्रत: महंगी दवाओं के अंतहीन जाल में नई दवा मूल्य नीति निश्चित रूप से उम्मीद की किरण है, लेकिन सस्ती दवाओं की राह में बाधाएं भी कम नहीं हैं। जिस देश में चारों ओर कालाबाजारियों की फौज तैनात हो और राशन के अनाज से भरी मालगाड़ी सीधे पड़ोसी देश में पहुंच जाए, वहां सस्ती दवाओं की गरीबों तक पहुंच आसान नहीं होगी। ऐसे में सरकार को इसके कार्यान्वयन पर निगरानी रखने के लिए कारगर प्रबंध करने होंगे। अन्यथा, यह योजना भी निजी अस्पतालों और दवा विक्रेताओं की लूट का जरिया बन जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Dainik Jagran National Edition 30-11-2012 Page-9 LokLF;)

देश में मधुमेह न बन जाए महामारी

देश में मधुमेह न बन जाए महामारी
ठ्ठ मुकेश केजरीवाल, नई दिल्ली देश में पहली बार एक करोड़ से ज्यादा लोगों की डायबिटीज जांच पूरी हो चुकी है। इसके नतीजों को देखते हुए तुरंत सावधान हो जाने की जरूरत है। 30 साल से ज्यादा उम्र के 1.06 करोड़ लोगों की इस जांच में 7.59 लाख को मधुमेह का शिकार पाया गया है। यानी इस उम्र में 7.15 फीसद लोगों को जीवन भर इस समस्या से जूझने को तैयार रहना होगा। हालांकि असम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और हरियाणा में इस उम्र के पांच फीसदी से कम लोगों को यह समस्या पाई गई है। उत्तर प्रदेश में यह 5.91 फीसद जरूर है, मगर फिर भी राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। जबकि दक्षिण के तमिलनाडु में 11.76 फीसद, कर्नाटक में 10.23 फीसद और केरल में 9.38 फीसद के साथ और ज्यादा डरावने स्तर पर है। हालांकि उड़ीसा में 9.05 फीसद और पश्चिम बंगाल में 9.84 फीसद लोगों के प्रभावित होने की वजह से यह भी साफ है कि राज्य की आर्थिक समृद्धि का इससे संबंध नहीं है। भारत में डायबिटीज के खतरे को लेकर आशंका तो पहले से ही जताई जाती रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंदाजे के मुताबिक वर्ष 2000 में भारत में जहां 3.2 करोड़ डायबिटीज के रोगी थे, वहीं वर्ष 2030 तक यह तादाद बढ़ कर आठ करोड़ तक पहुंच जाएगी। मगर पहली बार कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और लकवा के बचाव और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत इतने बड़े पैमाने पर जांच हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक जुलाई 2010 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम के तहत देश भर की 30 से ज्यादा उम्र की पूरी आबादी की डायबिटीज जांच की जानी है। फिलहाल इसमें सौ जिलों को शामिल किया गया है। इसके लिए 21,500 ग्लूकोमीटर, 4.3 करोड़ ग्लूकोस्ट्रीप और 4.95 करोड़ लैसेट्स भेजे गए हैं। ग्यूलोकमीटर की मदद से यह जांच करने के लिए एएनएम (नर्सो) को प्रशिक्षित किया गया है। साथ ही जिन लोगों को डायबिटीज पाया जाता है, उन्हें अस्पताल जाने की सलाह भी दी जा रही है। अधिकारी के मुताबिक स्वास्थ्य उप केंद्रो में होने वाली इस जांच के सारे रिकार्ड जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर रखे जा रहे हैं। मधुमेह के कारण लोगों के पैर खराब हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घटती है। ये एक जानलेवा रोग भी है।
Dainik Jagran National Edition 30-11-2012 Page-14 LokLF;
देश में मधुमेह न बन जाए महामारी
ठ्ठ मुकेश केजरीवाल, नई दिल्ली देश में पहली बार एक करोड़ से ज्यादा लोगों की डायबिटीज जांच पूरी हो चुकी है। इसके नतीजों को देखते हुए तुरंत सावधान हो जाने की जरूरत है। 30 साल से ज्यादा उम्र के 1.06 करोड़ लोगों की इस जांच में 7.59 लाख को मधुमेह का शिकार पाया गया है। यानी इस उम्र में 7.15 फीसद लोगों को जीवन भर इस समस्या से जूझने को तैयार रहना होगा। हालांकि असम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और हरियाणा में इस उम्र के पांच फीसदी से कम लोगों को यह समस्या पाई गई है। उत्तर प्रदेश में यह 5.91 फीसद जरूर है, मगर फिर भी राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। जबकि दक्षिण के तमिलनाडु में 11.76 फीसद, कर्नाटक में 10.23 फीसद और केरल में 9.38 फीसद के साथ और ज्यादा डरावने स्तर पर है। हालांकि उड़ीसा में 9.05 फीसद और पश्चिम बंगाल में 9.84 फीसद लोगों के प्रभावित होने की वजह से यह भी साफ है कि राज्य की आर्थिक समृद्धि का इससे संबंध नहीं है। भारत में डायबिटीज के खतरे को लेकर आशंका तो पहले से ही जताई जाती रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंदाजे के मुताबिक वर्ष 2000 में भारत में जहां 3.2 करोड़ डायबिटीज के रोगी थे, वहीं वर्ष 2030 तक यह तादाद बढ़ कर आठ करोड़ तक पहुंच जाएगी। मगर पहली बार कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और लकवा के बचाव और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत इतने बड़े पैमाने पर जांच हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक जुलाई 2010 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम के तहत देश भर की 30 से ज्यादा उम्र की पूरी आबादी की डायबिटीज जांच की जानी है। फिलहाल इसमें सौ जिलों को शामिल किया गया है। इसके लिए 21,500 ग्लूकोमीटर, 4.3 करोड़ ग्लूकोस्ट्रीप और 4.95 करोड़ लैसेट्स भेजे गए हैं। ग्यूलोकमीटर की मदद से यह जांच करने के लिए एएनएम (नर्सो) को प्रशिक्षित किया गया है। साथ ही जिन लोगों को डायबिटीज पाया जाता है, उन्हें अस्पताल जाने की सलाह भी दी जा रही है। अधिकारी के मुताबिक स्वास्थ्य उप केंद्रो में होने वाली इस जांच के सारे रिकार्ड जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर रखे जा रहे हैं। मधुमेह के कारण लोगों के पैर खराब हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घटती है। ये एक जानलेवा रोग भी है।
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