उमा
श्रीराम महाराष्ट्र के एक किसान का बेटा है विशाल। उम्र चार साल और वजन मात्र 10
किलो। इतना वजन आमतौर पर डेढ़-दो साल के बच्चे का होता है। विशाल
मुश्किल से ही अपने पैर हिला डुला पाता है। उसकी नर्सरी की टीचर जब पढ़ाती हैं तो
विशाल फर्श पर बिना हिले-डुले कातर निगाहों से अपनी टीचर को देखता रहता है। इसी
तरह उत्तरी राजस्थान के चांदन गांव की तारा नाम की दो साल की बच्ची पिछले पिछले
डेढ़ साल से आंत्रशोथ से पीडि़त है और अब अस्पताल में भर्ती है। तब से उसका वजन
नहीं बढ़ा है। मां माया देवी के मुताबिक उसे बार-बार डायरिया हो जाता है। मात्र
सात किलो की तारा अपनी मां की गोद में सुस्त पड़ी रहती है। ये हालात सिर्फ दो
राज्यों के नहींहैं। देशभर में हजारों आंगनबाड़ी हैं जिनमें विशाल और तारा जैसे
लाखों कुपोषित बच्चे हैं। विश्व में पांच वर्ष से कम उम्र के 15
करोड़ कुपोषित बच्चों में से एक तिहाई भारत में हैं। देश में कुपोषण
का स्तर कई अफ्रीकी देशों से भी ज्यादा है। कुपोषित बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप
से अपने लक्ष्य को पाने में भी असमर्थ रहते हैं। इसका सीधा असर राष्ट्रीय
उत्पादकता पर पड़ता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार एशियाई देशों में कुपोषण
के चलते राष्ट्रीय विकास दर 3 प्रतिशत
तक गिर जाती है। देश में कुपोषण से निपटने के लिए दो खर्चीली योजनाएं शुरू की गई।
सार्वजनिक वितरण व्यवस्था और मिड-डे मील, लेकिन
दोनों ही योजनाएं भारी भ्रष्टाचार का शिकार हैं। समन्वित बाल विकास योजना कुपोषण
दूर करने के लिए शुरू की गई विश्व की सबसे बड़ी असफल योजना है। इस योजना के तहत एक
आंगनवाड़ी केंद्र में प्रत्येक एक हजार लोगों पर एक शिक्षिका और एक सहायिका उपलब्ध
कराई गई है। हर केंद्र को अपने क्षेत्र की सभी गर्भवती महिलाओं और छह साल से कम
उम्र के सभी बच्चों को आवश्यक पौष्टिक आहार मुहैया कराने की जिम्मेदारी दी गई है।
इसका लाभ दो साल से बड़ी उम्र वाले बच्चों की माताएं बखूबी उठाती हैं,
क्योंकि यहां उनके बच्चों की दिन में देखभाल भी हो जाती है और दोपहर
का खाना भी मिल जाता है। लेकिन देश में ये सार्वजनिक योजनाएं तमाम बुराइयों से
ग्रस्त हैं। कुपोषण दूर करने का एक और प्रयास खाद्य सुरक्षा बिल तो अपने प्रारंभिक
चरण में ही अटका हुआ है। बच्चों में कुपोषण के पीछे अकेले भोजन का अभाव ही कारण
नहीं है, इसके पीछे अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं,
बच्चों और गर्भवती माताओं की अच्छे से देखभाल न होना भी उतने ही
जिम्मेदार हैं। कुपोषण के मामले में लड़कियों की स्थिति लड़कों की तुलना में और भी
बुरी है। देश में करीब 30 फीसद
बच्चे जन्म से ही कम वजन वाले होते हैं। विटामिन और खनिज की कमी भी बच्चों के
विकास को प्रभावित करती है। तीन साल से कम उम्र के 74 फीसद
बच्चे खून की कमी का शिकार हो जाते हैं। 30 फीसद
से अधिक किशोरियां और 50 फीसद
महिलाएं भी खून की कमी का शिकार हैं। आयोडीन की कमी बच्चों में सीखने की क्षमता 13
फीसद तक कम कर देती है। हालत यह है कि आज भी देशभर के आधे घरों में
कम आयोडीन युक्त नमक ही इस्तेमाल होता है। भारतीय खाद्य निगम सभी को संपूर्ण आहार
मुहैया कराने में सक्षम नहीं है। पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को
निर्देश दिया था कि गोदामों में अनाज को सड़ने के बदले गरीबों में बांट दिया जाए।
जवाब में केंद्रीय मंत्री कृषि मंत्री ने कहा था कि यह संभव नहीं हैं। मंत्री
महोदय के रुख के बाद अदालत ने केंद्र को फिर आदेश दिया कि वह देश में गरीबी रेखा
से नीचे जीने वाले परिवारों की संख्या का पता लगाए, पर
गरीबी अब भी विवादास्पद है। खाद्य निगम ने अपने गोदामों में सड़ रहे अनाज पर दबाब
कम करने के लिए चावल और गेहूं के निर्यात की चाल चली है। पिछले साल जयपुर में
खाद्य निगम के गोदाम को शराब के व्यवसायी को किराये पर देने का मामला सामने आया था,
जबकि अनाज खुले में सड़ रहा था। क्या कुपोषण इसी तरह दूर किया जा
सकता है? कुपोषण पर कई सर्वेक्षण और अध्ययन हुए हैं।
एक स्वतंत्र चैरिटेबल समूह ने नौ राज्यों के 73,000 से
अधिक घरों में सर्वे कर पाया कि पांच साल से नीचे की उम्र के 42
फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हाल ही में डेयरी उत्पादों की
विशेषज्ञ एक डच कंपनी ने दक्षिण एशिया के चार देशों में 12
साल की उम्र से कम के 16,000 बच्चों
का का गहन अध्ययन कर डाटा जुटाया। क्या यही निजी कंपनी सर्वेक्षण के बाद इन बच्चों
को आवश्यक पोषक तत्वों वाला खाना खिलाएगी? ये
कंपनियां सिर्फ अपने कारोबार और आर्थिक मुनाफे के लिए यह सब करती हैं। अंतरराष्ट्रीय
संस्था सेव द चिल्ड्रन के नए अध्ययन के मुताबिक बच्चों के विकास की रैंकिंग में
भारत नीचे आ गया है। यहां तक कि भारत बांग्लादेश और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो
से काफी पीछे है। इस समस्या से निपटने के लिए समय-समय पर कई सुझाव दिए गए। कृषि
अनुसंधान और निवेश को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया, राजनीतिक
इच्छाशक्ति के अभाव में ये समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। अब हमारे नेताओं
को खाद्य सुरक्षा और पोषण के नए उपाय पर जल्द सहमती बना लेनी चाहिए। आज दुनिया की 20
फीसद आबादी गरीबी में जी रही है। हमें इस चक्र को तोड़ना है। गराबों
का यह आंकड़ा अमेरिका की आबादी का लगभग साढ़े चार गुना और यूरोपीय संघ के सभी
देशों की संयुक्त आबादी का करीब तीन गुना है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक
कुपोषण से पीडि़त व्यक्ति उसके जीवन भर की कमाई का 10 फीसद
हिस्सा खो देता है। इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। सहस्राब्दि विकास लक्ष्य के तहत
पांच साल से कम उम्र के बच्चों और उनकी माताओं की असामयिक मौत को रोकने के मामले
में कई देश काफी दूर हैं। बाल और मातृ मृत्यु दर को कम करने के प्रयासों की गति
बहुत धीमी है और अभी तक लक्ष्य को प्राप्त करने में एक तिहाई सफलता ही मिली है।
खाद्य और पोषण से जुड़े मुद्दों पर विकासशील दुनिया की प्रगति औसत से बहुत पीछे चल
रही है। इस खाई को पाटने के लिए तत्काल परिवर्तन वाली नीतियों की जरूरत है।
खाने-पीने की चीजों की लगातार बढ़ती कीमतों के चलते लाखों लोग भूखे मरने को मजबूर हैं।
सरकार के सामने प्राथमिकता यह है कि वह खाद्य पदार्थो की कीमतें कम कर पोषक आहार
प्रदान कराए, लेकिन विडंबना यही है कि कीमतों का निर्धारण
बाजार के हवाले छोड़ दिया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2009-10
के अनुसार अभी तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानदारों को जो
सब्सिडी दी जाती रही है, उसे अब
सीधे परिवारों को दी जानी चाहिए। तब शायद संभव होगा कि आने वाले दिनों में महिलाओं
और बच्चों के कुपोषण की समस्या से निपटा जा सके। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Dainik Jagran National Edition 01-11-2012 Health page -9
No comments:
Post a Comment