Friday, November 30, 2012

सरकार के दखल से सस्ती होंगी दवाएं





मुद्दा प्रमोद भार्गव
आम लोगों के स्वास्थ्य की चिंता के मद्देनजर सरकार अनूठी, जरूरी व कड़ी पहल करती दिखाई दे रही है। हाल ही में केंद्र सरकार ने देश के सभी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त जेनेरिक दवाएं दिए जाने की शुरुआत की है। अब इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने सभी आवश्यक दवाओं की कीमतें 20 फीसद तक घटाने का निर्णय लिया है। इनमें कैंसर व एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के अलावा अवसाद दूर करने और ताकत में इजाफा करने वाली दवाएं भी शामिल हैं। कुल मिलाकर सरकार 348 प्रकार की दवाओं की कीमतें तय करेगी। सभी ब्रांडेड दवाओं की औसत कीमत निकाल कर उसे अधिकतम कीमत घोषित किया जाएगा। मालूम हो देश में बीते एक दशक के दौरान दवाओं की कीमत में जबरदस्त इजाफा हुआ है। बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां तो जैसे हर प्रकार के सरकारी नियंतण्रसे खुद को बाहर ही मानती हैं। यही वजह है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1996 से 2006 के बीच दवाओं की औसत कीमत 40 फीसद तक बढ़ी है। ब्रांडेड दवाओं की कीमतें तो जेनेरिक दवाओं की तुलना में 1,123 फीसद अधिक हैं। खास बात यह है कि जो दवाएं सरकारी नियंतण्रमें थीं, उनमें मूल्य वृद्धि महज 0.02 फीसद दर्ज हुई। ऐसी दवाएं जो न सरकारी नियंतण्रमें हैं और न ही जरूरी दवाओं की सूची में दर्ज हैं, उनके दाम भी 137 प्रतिशत तक बढ़े हैं। हालांकि मुनाफे की हवस में बदलते दवा कारोबार की ओर सरकार को विभिन्न संस्थाएं बार-बार चेताती रही हैं, लेकिन न जाने क्यों इस सीधे आम आदमी से जुड़े गंभीर मसले को सरकार नजरअंदाज करती रही? कुछ समय पहले कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक सव्रे रिपोर्ट ने सरकार को आगाह किया था कि दवाएं आम आदमी की पहुंच से जान-बूझकर दूर की जा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि दवाओं की महंगाई का कारण उनमें प्रयुक्त सामग्री का महंगा होना नहीं है, बल्कि दवा कंपनियों की मुनाफे की हवस है। इस लालच के चलते कंपनियां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के नियमों का भी पालन नहीं करती हैं। इसके मुताबिक दवाओं की कीमत सिर्फ लागत से सौ गुनी ज्यादा हो सकती हैं, लेकिन दवाओं की कीमत 1023 फीसद तक अधिक वसूली जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक नामी-गिरामी दवा कंपनियां भी दो सौ से पांच सौ गुना ज्यादा कीमत अपने दवा उत्पादों की रख रही हैं। इसके पहले कैग ने भी देशी-विदेशी दवा कंपनियों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इन्होंने सरकार द्वारा दिए गए उत्पाद शुल्क का लाभ तो लिया लेकिन दवाओं की कीमतों में कटौती नहीं की। इस तरह से इन्होंने ग्राहकों को करीब 43 करोड़ का चूना लगाया, साथ ही 183 करोड़ रुपए का गोलमाल सरकार को कर न चुकाकर किया। इस धोखाधड़ी को लेकर सीएजी ने सरकार को दवा मूल्य नियंतण्रअधिनियम में संशोधन का सुझाव भी दिया था। यह सरकार की ढिलाई का ही परिणाम है कि उत्पाद शुल्क में छूट लेने के बावजूद कंपनियों ने कीमतें तो कम नहीं कीं। इंसान की जीवन-रक्षा से जुड़ा दवा करोबार अपने देश में तेजी से मुनाफे की हवस में बदल गया है। चिकित्सकों को महंगे उपहार देकर रोगियों के लिए मंहगी और गैर जरूरी दवाएं लिखवाने का प्रचलन लाभ का धंधा हो गया है। इस पर लगाम लगाने के लिए कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने दवा कंपनियों से ही एक आचार संहिता लागू कर उसे कड़ाई से अमल में लाने की अपील की थी। लेकिन संहिता का जो स्वरूप सामने लाया गया, वह राहत देने वाला नहीं था। संहिता में चिकित्सकों की अनैतिक कारगुजारियों को लेकर न तो कोई साफगोई है और न ही संहिता की प्रस्तावित शत्रे कानूनन बाध्यकारी हैं। इन प्रस्तावों को लेकर दवा संघों में भी मतभेद हैं। हमारे देश में मुक्त बाजार की व्यवस्था के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ। इसके बाद जिस तेजी से व्यक्तिगत व व्यवसायजन्य अर्थिलप्सा और लूटतंत्र का विस्तार हुआ, उसके शिकार चिकित्सक तो हुए ही सरकारी और गैरसरकारी ढांचा भी हुआ। नतीजतन देखते-देखते भारत के दवा बाजार में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की 70 प्रतिशत से भी ज्यादा की भागीदारी हो गई। इनमें से 25 फीसद दवा कंपनियां ऐसी हैं जिनको व्यवसायजन्य अनैतिकता अपनाने के कारण अमेरिका भारी आर्थिक दंड दे चुका है। ऐसे हालात में चिकित्सक अनैतिकता और दवा कंपनियां केवल लाभ का दृष्टिकोण अपनाएंगी तो आर्थिक रूप से कमजोर तबका स्वास्थ्य चिकित्सा से बाहर होगा ही, जो मरीज दवा ले रहे हैं उनके मर्ज की दवा सटीक दी जा रही हैं अथवा नहीं, इसकी गारंटी भी नहीं रह जाएगी। इस कारण सरकार ने 2009 के आरंभ में दवा कंपनियों के संघ से स्वयं एक आचार संहिता बनाकर अपनाने को कहा था। साथ ही सरकार ने यह हिदायत भी दी थी कि यदि कंपनियां इस अवैध गोरखधंधे पर अंकुश नहीं लगातीं तो सरकार को इस बाबत कड़ा कानून लाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। लेकिन सरकारी चेतावनी की परवाह किए बिना दवा कंपनियों का संघ जो नई आचार संहिता सामने लाया उसमें उपहार के रूप में रिश्वत देने का केवल तरीका बदला गया। मसलन तोहफों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। संहिता में केवल दवा निर्माताओं से उम्मीद जताई गई है कि वे चिकित्सकों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरण व नकद राशि नहीं देंगे। परंतु वैज्ञानिक सम्मेलन, कार्यशालाओं और परिर्चचाओं के बहाने तोहफे देने का सिलसिला और चिकित्सकों की विदेश यात्राएं जारी रहेंगी। जाहिर है, आचार संहिता के बहाने चिकित्सक और उनके परिजनों को विदेश यात्रा की सुविधा को परंपरा बनाने का फरेब संहिता में जान- बूझकर डाला गया। अब केन्द्रीय कैबिनेट ने दवाओं की कीमतें 20 फीसद घटाने का जो निर्णय लिया है, वह स्वागतयोग्य कदम है। यदि सरकार थोड़ी आौर कड़ाई बरते तो कंपनियों द्वारा चिकित्सकों को दिए जाने वाले उपहारों और विदेश यात्राओं पर भी रोक लगा सकती है। यदि ऐसा किया जाता है तो दवाओं की कीमतों में लगभग 50 फीसद गिरावट की उम्मीद की जा सकती है।
Rashtirya sahara National Edition 30-11-2012 Page-10 LokLF;

No comments:

Post a Comment