Thursday, November 24, 2011

गर्भपात अधिकार के खतरे


आजकल अमेरिका में पर्सनहुड बिल की चर्चा काफी हो रही है। पर्सनहुड यूएसए नामक ग्रुप की पहल पर मिसिसिपी राज्य में एक बिल पेश किया गया था जिसका अर्थ था मां के गर्भ में बच्चे के भ्रूण के बनने के साथ ही उसे एक मनुष्य माना जाए तथा उसे मनुष्य जैसे अधिकार मिलें। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में गर्भपात को कानूनी दर्जा देने का फैसला दिया था। गर्भपात के नैतिक और कानूनी दर्जे पर बहस लंबे समय से जारी है। इसमें शामिल दो मुख्य समूहों में एक प्रो-चाईस मूवमेंट है जो भ्रूण का नामकरण को लेकर महिलाओं के अधिकार पर जोर देता है। यह अजन्मे बच्चे के जीने के अधिकार पर जोर देता है। कनाडा में जहां गर्भपात आसान वहीं आयरलैंड में गर्भपात पूरी तरह गैर-कानूनी है। गर्भपात का मसला ईसाई मूल के लोगों के लिए इतना संवेदनशील मसला रहा है कि इस पर वह हिंसा करने से भी बाज नहीं आते। आंकड़ों के मुताबिक बीते लगभग बीस सालों में गर्भपात की सेवा उपलब्ध कराने के जुर्म में अमेरिका में आठ लोग मारे जा चुके हैं। मारे गए लोगों में चार डॉक्टर, अस्पताल के दो कर्मचारी, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक क्लीनिक एस्कॉर्ट शामिल है। ईसाई आतंकियों के हाथों मारे जाने वालों में सबसे हाल के घटनाओं में शुमार है डॉ. जार्ज टिलर की हत्या जिन्हें स्कॉट रोडर ने 31 मई 2009 को गोलियों से भून डाला था। इसके पहले भी एक बार डॉ टिलर पर जानलेवा हमला किया जा चुका था। इस हमले के दौरान उन्हें प्रताडि़त करने के लिए उनकी क्लीनिक तक को जला दिया गया था। हालांकि इसमें वह जीवित बच गए थे। जहां तक हमारे देश में गर्भपात अधिकार अथवा गर्भपात कानून बनाने का मुद्दा है तो यहां भी अमेरिका जैसे विचार रखने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। यहां भी इसके पक्ष और विरोध में आवाज उठाने वाले है और वह समय-समय पर ऐसा करते भी रहते हैं। यह अलग बात है कि अमेरिका जैसे देशों की तरह हमारे यहां ऐसे मुद्दों पर उस किस्म की हिंसा नजर नहीं आती। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। इन कारणों में धार्मिक के साथ-साथ पितृसत्तात्मक मानसिकता भी एक बड़ी वजह है। यद्यपि यहां गर्भपात कानून स्वीकृत है फिर भी इसे सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उल्लेखनीय है कि 1971 में गर्भपात कराने के निर्णय को कानूनी दर्जा दिया गया था। कंसोर्टियम ऑन नेशनल कंसेंसस फॉर मेडिकल अबार्शन इन इंडिया के मुताबिक हर साल भारत में तकरीबन 110 लाख गर्भपात कराए जाते हैं और लगभग 20 हजार महिलाएं असुरक्षित गर्भपात को मजबूर होती हैं, जो गर्भपात के बाद की जटिलताओं के कारण काल के गाल में समा जाती हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक तरफ गर्भपात कराना कानूनी अधिकार है, लेकिन दूसरी ओर असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मौतें एक गंभीर समस्या हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव तथा महिलाओं की उपेक्षित सामाजिक स्थिति इसका प्रमुख कारण है। हमारे यहां गर्भपात के अधिकार ने एक अलग तरह के सामाजिक असंतुलन के बीज डाले हैं, जिसके तहत हम यौन केंद्रित गर्भपात की समस्या से रूबरू हो रहे हैं। यह विचारयोग्य है कि गर्भजल परीक्षण की खोज इसी उद्देश्य से हुआ था कि यदि कोई बच्चा अपनी अपंगता के कारण जीवन जीने में अक्षम होता है या उसे अपने जीवन में अधिक मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा तो यह उसके हित में होगा कि वह पैदा ही न हो। भ्रूण की विकृति जानने के लिए विकसित इस तकनीक का इस्तेमाल यौनकेंद्रित गर्भपात के लिए होगा, इसका तो चिकित्सकों ने पूर्वानुमान भी नहीं किया होगा। लिंगानुपात में अंतर एक समस्या है यह तो पहले से पता था, लेकिन स्थिति और बदतर हो गई है यह अब खुलासा हुआ है। अब एक हजार लड़कों पर 914 लड़कियां हैं, जो पिछली जनगणना में 927 थीं। यह शून्य से 6 साल तक के बच्चियों के आंकड़े हैं। हरियाणा और पंजाब में यह अनुपात 830 और 846 के साथ देश के सबसे निचले पायदान पर है। लिंगानुपात के अंतर की स्थिति लगातार भयावह होती जा रही है और इस समस्या पर सरकार को कड़े कदम उठाने की जरूरत है। यौन केंद्रित गर्भपात की समस्या को संबोधित करने के लिए सरकार ने गर्भावस्था में जांच के दौरान भ्रूण के लिंग की जांच करने को वर्ष 1994 में अपराध घोषित किया है। 2002 में इसके लिए तय सजा की राशि को भी बढ़ा दिया जिसके अंतर्गत पहली बार ऐसे जुर्म के लिए तीन साल कैद और 10 हजार रुपये जुर्माना और दूसरी बार इस अपराध को अंजाम देने पर पांच साल की कैद का प्रावधान किया गया है, लेकिन इस पिछड़ी और लिंग भेदभाव वाली मानसिकता के कारण उपजी समस्या से निपटने के लिए महिलाओं को मिले गर्भपात के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। अगर हम पर्सनहुड की बात पर फिर लौटें तो भ्रूण को शुरुआत से ही एक बच्चा मानकर उसे मनुष्य का अधिकार देना, जिसमें जीवन जीने का अधिकार शामिल हो सुनने और समझने में न्यायसंगत लगता है। मानवतावादी नजरिए से यह बात किसी को भी सही लग सकती है। हर एक व्यक्ति को अपनी योजना इस तरह बनानी चाहिए जिसमें अनचाहे गर्भ की समस्या का सामना नहीं करना पडे़। इसके बावजूद कई कारणों से गर्भपात की स्थिति उत्पन्न होती है। यहां यह बात ध्यान में रखनी जरूरी है कि यह भ्रूण जिसके शरीर में पलता है उसका भी उस पर अधिकार है। बच्चा पैदा करने के लिए मजबूरी में लिया गया निर्णय किसी औरत या दंपति को पूरे जीवन भर कठिन स्थिति में डाल सकता है यदि उसकी मानसिक तैयारी या परिस्थितियां इसके अनुकूल नहीं होती हैं। दूसरी बात यहां यह भी है कि एक ऐसे समाज में जहां पैदा होने वाले बच्चों में से आधे से अधिक अनचाहे होते है वहां सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि गर्भपात गैर-कानूनी हुआ तो अनचाहे बच्चों की संख्या का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा तो यह है कि गर्भपात किसी औरत के लिए अपने शरीर पर नियंत्रण एवं निर्णय लेने के अधिकार से जुड़ा हुआ मसला है। कुछ लोग कन्या भ्रूण के गर्भपात की समस्या को काफी गंभीर मानते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए यह जरूरी है कि गर्भपात के अधिकार पर ही धावा बोला जाए और उसे खत्म करने की तैयारी में लगा जाए। इस तरह का विचार तथा अभियान स्त्रीद्रोही अवश्य है, क्योंकि औरत अपने शरीर में अपने भ्रूण को पलने दे या नहीं यह निर्णय सिर्फ उसी का होना चाहिए। हालांकि इसके लिए सतर्क रहने की आवश्यकता होगी ताकि धार्मिक या दूसरे जड़वादी ताकतों को अपनी धार्मिक मान्यताओं को किसी व्यक्ति विशेष पर थोपने का अवसर नहीं मिल सके। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Thursday, November 17, 2011

मूल्य नियंतण्रनीति के दायरे में आएंगी 348 जेनरिक दवाएं


केन्द्र सरकार ने कहा है कि दवाओं की लागत और बाजार में आने पर उनके न्यूनतम मूल्य में जमीन-आसमान का फर्क है। इसका असर देश की गरीब जनता वहन कर रही है। इस कारण 348 जेनरिक दवाओं को मूल्य नियंतण्रके दायरे में लाया जाएगा ताकि आम आदमी को कीमती औषधि से राहत मिल सके। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में माना है कि विभिन्न कंपनियां एक ही साल्ट की दवाएं, ब्रांड नेम से बेचकर भारी मुनाफा कमा रही है। मरीजों को अपने इलाज का 60 प्रतिशत हिस्सा दवाइयों पर खर्च करना पड़ता है। 1987 तक 300 से अधिक जेनरिक दवाइयों पर मूल्य नियंतण्रथा। लेकिन इनकी संख्या घटाकर 140 कर दी गई। इसका असर मरीजों और विशेषकर समाज के निचले तबके के लोगों पर पड़ा जो बीमार होने पर बाजार से महंगी दवाइयां खरीदते हैं। चिकित्सा सेवा को
आम आदमी के करीब पहुंचाने के लिए जेनरिक दवाओं पर कंट्रोल जरूरी है। इस समय सिर्फ 74 दवाएं ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के तहत आती है। इन दवाइयों का मूल्य सरकार निर्धारित करती है। कोई भी उद्यमी सरकार की अनुमति के बिना इन दवाओं के दाम नहीं बढ़ा सकता। जल्द ही 348 जेनरिक दवाओं के मूल्यों पर सरकार का नियंतण्रहोगा। हलफनामे में कहा गया है कि मंत्रालय ने इस सिलसिले में आवश्यक दवाओं की सूची में परिवर्तन किया है। नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसन(एनएलक्ष्एम) 2003 के स्थान पर एनएलक्ष्एम 2011 लाया गया है। इन दवाओं का इस्तेमाल बहुत अधिक मात्रा में किया जाता है। इन सभी दवाओं के साल्ट इस सूची में अंकित हैं। औषधि पर मूल्य नियंतण्रके साथ-साथ सरकार यह भी सुनिश्चत करेगी कि दाम घटने से यह दवाएं बाजार से गायब न हो जाए। बाजार में इन दवाओं की समुचित सप्लाई की जाएगी। सरकार सभी को चिकित्सा सेवा मुहैया करना चाहती है। सरकार की इस नीति को लागू करने के लिए मंत्रालय प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने अपने ही औषधि विभाग को इस बारे में सूचित कर दिया है। मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को आासन दिया है कि उसके आदेश के तहत राष्ट्रीय औषधि नीति तैयार की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में केन्द्र सरकार बनाम केएस गोपीनाथ के मामले में जीवन रक्षक दवाओं पर मूल्य नियंतण्रका आदेश दिया था। इसी मुद्दे पर अदालत ऑल इंडिया ड्रग्स एक्शन नेटवर्क द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है।

Monday, November 14, 2011

सेहत के लिए बहुत फायदेमंद फाइबर


अगर आप आंतों के कैंसर को दूर रखना चाहते हैं, तो वैज्ञानिकों ने एक नया और आसान रास्ता सुझाया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि हर दिन तीन बार संपूर्ण अनाज (होल ग्रेन) वाले भोजन से इस बीमारी के खतरे से बचा जा सकता है। इंपीरियल कॉलेज लंदन की अगुवाई में लंदन के शोधकर्ताओं ने कहा है कि रोज अगर आप अपने भोजन में लिए जाने वाले फाइबर अथवा रेशों की मात्रा 10 ग्राम बढ़ा देते हैं, तो आंतों के कैंसर की आशंका 10 फीसद कम हो जाती है। शोधकर्ताओं ने पहले हुए शोधों के आधार पर अपने निष्कर्ष में कहा है कि भोजन में अनाज से मिलने वाले रेशों की मात्रा बढ़ा कर कोलोरेक्टलकैंसर से बचने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं ने अपने इस अध्ययन में करीब 20 लाख लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण तथा समीक्षा की। मुख्य शोधकर्ता डैगफिन ऑन के हवाले से ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने कहा है, ‘आप जितनी मात्रा में रेशे खाएंगे, उतना अच्छा है। यहां तक कि कुछ मात्रा लेने से भी असर होता है।हालांकि शोध में इस बात का कोई सबूत नहीं दिया गया है कि फलों और सब्जियों में मिलने वाले रेशे भी इस बीमारी से बचने में कोई मदद करते हैं। शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि अपने भोजन में फाइबर और संपूर्ण अनाज की मात्रा बढ़ाने से जो लाभ मिलने हैं, वे सिर्फ आंतों के कैंसर की रोकथाम तक ही सीमित नहीं हैं। यह दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज, ज्यादा वजन और मोटापा घटाने में भी मददगार है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि इस शोध से पहले से ही ज्ञात इस तथ्य को बल मिलता है कि आहार में पर्याप्त मात्रा में फाइबर व आंतों के कैंसर के निम्न जोखिम का आपसी संबंध है। यदि लोग पर्याप्त फाइबर वाला संतुलित आहार, फल तथा सब्जियों का ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें आंतों के कैंसर होने के बहुत कम आशंका होगी।

Wednesday, November 9, 2011

बाल- सेहत को लेकर कितनी मुस्तैदी


इकतीस अक्तूबर को फिलीपींस के मनीला शहर में जन्मी डानिका कमाचो या भारत के लखनऊ में जन्मी नरगिस में से कौन सी बच्ची दुनिया की सात अरबवीं इंसान हैं, इस बहस पर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विराम लगाते हुए स्पष्ट किया गया कि गणना में 1 से 2 फीसद गलती संभव है, इसलिए इस बार प्रत्येक देश को अपना सात अरबवां बच्चा घोषित करने की छूट है। इस तरह अपने देश में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में जन्मी नरगिस को सांकेतिक रूप से दुनिया का सात अरबवां इंसान बताया जा रहा है। इस मौके पर यह बहस मौज़ू है कि अपना मुल्क शिशुओं के स्वास्थ्य, उनकी पौष्टिक खुराक और शिक्षा को लेकर कितना संवेदनशील और मुस्तैद है? बीते कुछ दिनों से पश्चिम बंगाल के बीसीराय सरकारी अस्पताल में करीब 50 और दिल्ली के कलावती सरन अस्पताल में 14 नवजात शिुशओं ने दम तोड़ दिया। ऐसे मौकों पर प्रशासन गरीब जनता को उलझाए रखता है। अपने देश में हर 1,000 में से 30.15 बच्चों की जन्म के साथ ही मौत हो जाती है। हर साल देश में 21 लाख बच्चे पांच वर्ष की उम्र से पहले कुपोषण की वजह से ही गुजर जाते हैं। चालीस फीसद बच्चे (ज्यादातर लड़कियां) बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका जर्नल ऑफ हेल्थ, पॉपुलेशन एंड न्यूट्रीशनके ताजा संस्करण में छपी रिपोर्ट के अनुसार नवजातों के लिए बनी केयर यूनिटों में कई खामियां हैं। जरूरी डॉक्टरों और र्नसों की कमी के अलावा उपकरण भी ज्यादातर समय खराब रहते हैं। उत्तर प्रदेश, जहां नरगिस पैदा हुई है, को ही लें तो वहां की स्थितियां इस मामले में निराश ही करती हैं। गौरतलब है कि इस राज्य की जनसंख्या ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की कुल जनसंख्या के बराबर है। अपने देश के सबसे बड़े और राजनीतिक दृष्टि से अहम राज्य की आबादी यूरोप के तीन शक्तिशाली देशों की कुल आबादी के बराबर तो है लेकिन यहां लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार ज्यादा फिक्रमंद नहीं है। मसलन पूर्वी उत्तर प्रदेश में चालू वर्ष में करीब पांच सौ बच्चों की मौत दिमागी बुखार से हो चुकी है। यह संख्या बढ़ भी सकती है क्योंकि अभी इस बीमारी का सीजन खत्म होने में कुछ दिन बचे हैं। मरने वाले 80 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण गरीब परिवारों के थे और उनकी उम्र दस साल से कम थी। ध्यान देने वाला पहलू यह है कि उत्तर प्रदेश बीते 33 सालों से दिमागी बुखार की धुरी रहा है। इसके बावजूद राज्य का रवैया इस जानलेवा बीमारी के प्रति उदासीनता भरा रहा है। 2005-06 और 10-11 के बीच राज्य सरकार को नेशनल वेक्टर बोर्न डिसीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 544 करोड़ रुपए इस बीमारी पर काबू पाने के लिए मिले लेकिन सात महीने पहले तक 428 करोड़ ही इस्तेमाल हुए थे। बीते कई सालों से अवांटित रकम का पूरा इस्तेमाल नहीं होना, गंभीर सवाल खड़ा करता है। दिमागी बुखार के कारण मौतों की संख्या बढ़ रही है और यह इस बात का संकेत है कि राज्य में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को और अधिक विकसित करने के लिए केंद्रीय फंड का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है। कैग ने हाल में इसकी पुष्टि की है। उसने उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत मिलने वाले फंड की प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें खुलासा है कि इस फंड का इस्तेमाल करने वाले राज्य का स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार में डूबा है। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने बीते छह सालों में केंद्र से 8200 करोड़ रुपए प्राप्त किए लेकिन खर्च किए 7400 करोड़। और इसमें अपना हिस्सा पाने के लिए बड़े अधिकारी से छोटे तक झगड़ा करते हैं। राज्य सरकार बेशक अपने ऊपर लगे आरोपों को दूसरी राजनीतिक पार्टियों की साजिश, एक दलित मुख्यमंत्री को कुर्सी से हटाने वाली आवाज के रूप में प्रचारित करें, मगर राज्य में लोगों के स्वास्थ्य पर निवेश करने वाले मुददे पर सरकार की चाल ज्यादा उम्मीद नहीं बंधाती। यदि पैसा खर्च हुआ है तो नतीजे नजर क्यों नहीं आते!
राज्य सरकार ने कैग को जो दस्तावेज सौंपे हैं, उसकी प्रमाणिकता संदेह के घेरे में हैं। उत्तर प्रदेश में बढ़ती आबादी वाले इस ग्राफ के साथ राज्य सरकार के लिए कोख में पल रहे, जन्मे शिशु, नागरिकों को सस्ती व उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना, जीवनशैली प्रदान करना एक स्थायी चुनौती है। वैसे संयुक्त राष्ट्र ने सात अरब की आबादी पूरी होने के मौके पर वि बिरादरी का ध्यान एक बार फिर इस तरफ आकषिर्त किया है कि जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट लाने के लिए अधिक से अधिक महिलाओं को शिक्षित करने और उन्हें कमाई के साधनों से जोड़ने पर फोकस करने की जरूरत है। 1970 में दुनिया में प्रति महिला 4.45 बच्चे का जन्म होता था, जो दर अब 2.45 तक गिर चुकी है। बहरहाल, जनांनिकी विशेषज्ञों को महिलाओं से जनसंख्या बम डिफ्यूज करने में खास अपेक्षाएं हैं।

Monday, November 7, 2011

मुफ्त इलाज में आनाकानी पर निजी अस्पतालों पर जुर्माना

 नई दिल्ली गरीबों का मुफ्त में इलाज करने के मामले में कोताही बरतने वाले निजी अस्पतालों से दिल्ली सरकार ने अब हर्जाना वसूलने का फैसला किया है। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने ऐसे 8 अस्पतालों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है जो पूर्व में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का पालन नहीं कर रहे थे। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ कुछ अस्पतालों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी थी जिसकी वजह से विभाग कार्रवाई नहीं कर पा रही थी। लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भी हाईकोर्ट के आदेश पर मोहर लग गई है तब विभाग ने अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई करने के फैसला किया है। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव ने हाईकोर्ट को यह सूचना दी है। सूचना में यह कहा गया है कि लगभग 25 निजी अस्पतालों ऐसे हैं जो कोर्ट के फैसले के बाद भी इलाज नहीं कर रही थी। विभाग निजी अस्पतालों से वसूले गए जुर्माने की राशि दिल्ली सरकार के अस्पतालों के हालात सुधारने में खर्च करेगी। इस मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने एक हलफनामा दायर कर बताया है कि 22 मार्च 2007 को हाई कोर्ट द्वारा मुफ्त इलाज करने के संबंध में दिए गए आदेश का पालन करवाने के लिए विभाग कदम उठा रहा है। जिसमें देखा जा रहा है कि अस्पताल निश्चित प्रतिशत में ओपीडी व आइपीडी में गरीबों का इलाज कर रहे है या नहीं। सरकार ने 43 ऐसे अस्पताल चिन्हित किए हैं जिन्होंने सरकार से रियायती दर पर जमीन ली थी, जिनमें तीन अस्पतालों के बारे में हाल में पता चला है। फिलहाल 43 में से 40 ऐसे अस्पताल हैं जहां गरीबों का मुफ्त में इलाज किया जा रहा है। इन सभी अस्पतालों में गरीबी कोटे के तहत इलाज कराने वालों के लिए 636 बेड आरक्षित हैं। अब तक निजी अस्पताल में जहां इनडोर 1,05,499 मरीजों को भर्ती किया गया है वहीं 31, 90,798 मरीजों को ओपीडी में मुफ्त में यह सुविधा प्राप्त कर चुके हैं।