आजकल अमेरिका में पर्सनहुड बिल की चर्चा काफी हो रही है। पर्सनहुड यूएसए नामक ग्रुप की पहल पर मिसिसिपी राज्य में एक बिल पेश किया गया था जिसका अर्थ था मां के गर्भ में बच्चे के भ्रूण के बनने के साथ ही उसे एक मनुष्य माना जाए तथा उसे मनुष्य जैसे अधिकार मिलें। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में गर्भपात को कानूनी दर्जा देने का फैसला दिया था। गर्भपात के नैतिक और कानूनी दर्जे पर बहस लंबे समय से जारी है। इसमें शामिल दो मुख्य समूहों में एक प्रो-चाईस मूवमेंट है जो भ्रूण का नामकरण को लेकर महिलाओं के अधिकार पर जोर देता है। यह अजन्मे बच्चे के जीने के अधिकार पर जोर देता है। कनाडा में जहां गर्भपात आसान वहीं आयरलैंड में गर्भपात पूरी तरह गैर-कानूनी है। गर्भपात का मसला ईसाई मूल के लोगों के लिए इतना संवेदनशील मसला रहा है कि इस पर वह हिंसा करने से भी बाज नहीं आते। आंकड़ों के मुताबिक बीते लगभग बीस सालों में गर्भपात की सेवा उपलब्ध कराने के जुर्म में अमेरिका में आठ लोग मारे जा चुके हैं। मारे गए लोगों में चार डॉक्टर, अस्पताल के दो कर्मचारी, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक क्लीनिक एस्कॉर्ट शामिल है। ईसाई आतंकियों के हाथों मारे जाने वालों में सबसे हाल के घटनाओं में शुमार है डॉ. जार्ज टिलर की हत्या जिन्हें स्कॉट रोडर ने 31 मई 2009 को गोलियों से भून डाला था। इसके पहले भी एक बार डॉ टिलर पर जानलेवा हमला किया जा चुका था। इस हमले के दौरान उन्हें प्रताडि़त करने के लिए उनकी क्लीनिक तक को जला दिया गया था। हालांकि इसमें वह जीवित बच गए थे। जहां तक हमारे देश में गर्भपात अधिकार अथवा गर्भपात कानून बनाने का मुद्दा है तो यहां भी अमेरिका जैसे विचार रखने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। यहां भी इसके पक्ष और विरोध में आवाज उठाने वाले है और वह समय-समय पर ऐसा करते भी रहते हैं। यह अलग बात है कि अमेरिका जैसे देशों की तरह हमारे यहां ऐसे मुद्दों पर उस किस्म की हिंसा नजर नहीं आती। इसकी कई वजहें हो सकती हैं। इन कारणों में धार्मिक के साथ-साथ पितृसत्तात्मक मानसिकता भी एक बड़ी वजह है। यद्यपि यहां गर्भपात कानून स्वीकृत है फिर भी इसे सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उल्लेखनीय है कि 1971 में गर्भपात कराने के निर्णय को कानूनी दर्जा दिया गया था। कंसोर्टियम ऑन नेशनल कंसेंसस फॉर मेडिकल अबार्शन इन इंडिया के मुताबिक हर साल भारत में तकरीबन 110 लाख गर्भपात कराए जाते हैं और लगभग 20 हजार महिलाएं असुरक्षित गर्भपात को मजबूर होती हैं, जो गर्भपात के बाद की जटिलताओं के कारण काल के गाल में समा जाती हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक तरफ गर्भपात कराना कानूनी अधिकार है, लेकिन दूसरी ओर असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मौतें एक गंभीर समस्या हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव तथा महिलाओं की उपेक्षित सामाजिक स्थिति इसका प्रमुख कारण है। हमारे यहां गर्भपात के अधिकार ने एक अलग तरह के सामाजिक असंतुलन के बीज डाले हैं, जिसके तहत हम यौन केंद्रित गर्भपात की समस्या से रूबरू हो रहे हैं। यह विचारयोग्य है कि गर्भजल परीक्षण की खोज इसी उद्देश्य से हुआ था कि यदि कोई बच्चा अपनी अपंगता के कारण जीवन जीने में अक्षम होता है या उसे अपने जीवन में अधिक मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा तो यह उसके हित में होगा कि वह पैदा ही न हो। भ्रूण की विकृति जानने के लिए विकसित इस तकनीक का इस्तेमाल यौनकेंद्रित गर्भपात के लिए होगा, इसका तो चिकित्सकों ने पूर्वानुमान भी नहीं किया होगा। लिंगानुपात में अंतर एक समस्या है यह तो पहले से पता था, लेकिन स्थिति और बदतर हो गई है यह अब खुलासा हुआ है। अब एक हजार लड़कों पर 914 लड़कियां हैं, जो पिछली जनगणना में 927 थीं। यह शून्य से 6 साल तक के बच्चियों के आंकड़े हैं। हरियाणा और पंजाब में यह अनुपात 830 और 846 के साथ देश के सबसे निचले पायदान पर है। लिंगानुपात के अंतर की स्थिति लगातार भयावह होती जा रही है और इस समस्या पर सरकार को कड़े कदम उठाने की जरूरत है। यौन केंद्रित गर्भपात की समस्या को संबोधित करने के लिए सरकार ने गर्भावस्था में जांच के दौरान भ्रूण के लिंग की जांच करने को वर्ष 1994 में अपराध घोषित किया है। 2002 में इसके लिए तय सजा की राशि को भी बढ़ा दिया जिसके अंतर्गत पहली बार ऐसे जुर्म के लिए तीन साल कैद और 10 हजार रुपये जुर्माना और दूसरी बार इस अपराध को अंजाम देने पर पांच साल की कैद का प्रावधान किया गया है, लेकिन इस पिछड़ी और लिंग भेदभाव वाली मानसिकता के कारण उपजी समस्या से निपटने के लिए महिलाओं को मिले गर्भपात के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। अगर हम पर्सनहुड की बात पर फिर लौटें तो भ्रूण को शुरुआत से ही एक बच्चा मानकर उसे मनुष्य का अधिकार देना, जिसमें जीवन जीने का अधिकार शामिल हो सुनने और समझने में न्यायसंगत लगता है। मानवतावादी नजरिए से यह बात किसी को भी सही लग सकती है। हर एक व्यक्ति को अपनी योजना इस तरह बनानी चाहिए जिसमें अनचाहे गर्भ की समस्या का सामना नहीं करना पडे़। इसके बावजूद कई कारणों से गर्भपात की स्थिति उत्पन्न होती है। यहां यह बात ध्यान में रखनी जरूरी है कि यह भ्रूण जिसके शरीर में पलता है उसका भी उस पर अधिकार है। बच्चा पैदा करने के लिए मजबूरी में लिया गया निर्णय किसी औरत या दंपति को पूरे जीवन भर कठिन स्थिति में डाल सकता है यदि उसकी मानसिक तैयारी या परिस्थितियां इसके अनुकूल नहीं होती हैं। दूसरी बात यहां यह भी है कि एक ऐसे समाज में जहां पैदा होने वाले बच्चों में से आधे से अधिक अनचाहे होते है वहां सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि गर्भपात गैर-कानूनी हुआ तो अनचाहे बच्चों की संख्या का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा तो यह है कि गर्भपात किसी औरत के लिए अपने शरीर पर नियंत्रण एवं निर्णय लेने के अधिकार से जुड़ा हुआ मसला है। कुछ लोग कन्या भ्रूण के गर्भपात की समस्या को काफी गंभीर मानते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए यह जरूरी है कि गर्भपात के अधिकार पर ही धावा बोला जाए और उसे खत्म करने की तैयारी में लगा जाए। इस तरह का विचार तथा अभियान स्त्रीद्रोही अवश्य है, क्योंकि औरत अपने शरीर में अपने भ्रूण को पलने दे या नहीं यह निर्णय सिर्फ उसी का होना चाहिए। हालांकि इसके लिए सतर्क रहने की आवश्यकता होगी ताकि धार्मिक या दूसरे जड़वादी ताकतों को अपनी धार्मिक मान्यताओं को किसी व्यक्ति विशेष पर थोपने का अवसर नहीं मिल सके। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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