इकतीस अक्तूबर को फिलीपींस के मनीला शहर में जन्मी डानिका कमाचो या भारत के लखनऊ में जन्मी नरगिस में से कौन सी बच्ची दुनिया की सात अरबवीं इंसान हैं, इस बहस पर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विराम लगाते हुए स्पष्ट किया गया कि गणना में 1 से 2 फीसद गलती संभव है, इसलिए इस बार प्रत्येक देश को अपना सात अरबवां बच्चा घोषित करने की छूट है। इस तरह अपने देश में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में जन्मी नरगिस को सांकेतिक रूप से दुनिया का सात अरबवां इंसान बताया जा रहा है। इस मौके पर यह बहस मौज़ू है कि अपना मुल्क शिशुओं के स्वास्थ्य, उनकी पौष्टिक खुराक और शिक्षा को लेकर कितना संवेदनशील और मुस्तैद है? बीते कुछ दिनों से पश्चिम बंगाल के बीसीराय सरकारी अस्पताल में करीब 50 और दिल्ली के कलावती सरन अस्पताल में 14 नवजात शिुशओं ने दम तोड़ दिया। ऐसे मौकों पर प्रशासन गरीब जनता को उलझाए रखता है। अपने देश में हर 1,000 में से 30.15 बच्चों की जन्म के साथ ही मौत हो जाती है। हर साल देश में 21 लाख बच्चे पांच वर्ष की उम्र से पहले कुपोषण की वजह से ही गुजर जाते हैं। चालीस फीसद बच्चे (ज्यादातर लड़कियां) बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘जर्नल ऑफ हेल्थ, पॉपुलेशन एंड न्यूट्रीशन’ के ताजा संस्करण में छपी रिपोर्ट के अनुसार नवजातों के लिए बनी केयर यूनिटों में कई खामियां हैं। जरूरी डॉक्टरों और र्नसों की कमी के अलावा उपकरण भी ज्यादातर समय खराब रहते हैं। उत्तर प्रदेश, जहां नरगिस पैदा हुई है, को ही लें तो वहां की स्थितियां इस मामले में निराश ही करती हैं। गौरतलब है कि इस राज्य की जनसंख्या ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की कुल जनसंख्या के बराबर है। अपने देश के सबसे बड़े और राजनीतिक दृष्टि से अहम राज्य की आबादी यूरोप के तीन शक्तिशाली देशों की कुल आबादी के बराबर तो है लेकिन यहां लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार ज्यादा फिक्रमंद नहीं है। मसलन पूर्वी उत्तर प्रदेश में चालू वर्ष में करीब पांच सौ बच्चों की मौत दिमागी बुखार से हो चुकी है। यह संख्या बढ़ भी सकती है क्योंकि अभी इस बीमारी का सीजन खत्म होने में कुछ दिन बचे हैं। मरने वाले 80 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण गरीब परिवारों के थे और उनकी उम्र दस साल से कम थी। ध्यान देने वाला पहलू यह है कि उत्तर प्रदेश बीते 33 सालों से दिमागी बुखार की धुरी रहा है। इसके बावजूद राज्य का रवैया इस जानलेवा बीमारी के प्रति उदासीनता भरा रहा है। 2005-06 और 10-11 के बीच राज्य सरकार को नेशनल वेक्टर बोर्न डिसीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 544 करोड़ रुपए इस बीमारी पर काबू पाने के लिए मिले लेकिन सात महीने पहले तक 428 करोड़ ही इस्तेमाल हुए थे। बीते कई सालों से अवांटित रकम का पूरा इस्तेमाल नहीं होना, गंभीर सवाल खड़ा करता है। दिमागी बुखार के कारण मौतों की संख्या बढ़ रही है और यह इस बात का संकेत है कि राज्य में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को और अधिक विकसित करने के लिए केंद्रीय फंड का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है। कैग ने हाल में इसकी पुष्टि की है। उसने उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत मिलने वाले फंड की प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें खुलासा है कि इस फंड का इस्तेमाल करने वाले राज्य का स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार में डूबा है। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने बीते छह सालों में केंद्र से 8200 करोड़ रुपए प्राप्त किए लेकिन खर्च किए 7400 करोड़। और इसमें अपना हिस्सा पाने के लिए बड़े अधिकारी से छोटे तक झगड़ा करते हैं। राज्य सरकार बेशक अपने ऊपर लगे आरोपों को दूसरी राजनीतिक पार्टियों की साजिश, एक दलित मुख्यमंत्री को कुर्सी से हटाने वाली आवाज के रूप में प्रचारित करें, मगर राज्य में लोगों के स्वास्थ्य पर निवेश करने वाले मुददे पर सरकार की चाल ज्यादा उम्मीद नहीं बंधाती। यदि पैसा खर्च हुआ है तो नतीजे नजर क्यों नहीं आते!
राज्य सरकार ने कैग को जो दस्तावेज सौंपे हैं, उसकी प्रमाणिकता संदेह के घेरे में हैं। उत्तर प्रदेश में बढ़ती आबादी वाले इस ग्राफ के साथ राज्य सरकार के लिए कोख में पल रहे, जन्मे शिशु, नागरिकों को सस्ती व उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना, जीवनशैली प्रदान करना एक स्थायी चुनौती है। वैसे संयुक्त राष्ट्र ने सात अरब की आबादी पूरी होने के मौके पर वि बिरादरी का ध्यान एक बार फिर इस तरफ आकषिर्त किया है कि जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट लाने के लिए अधिक से अधिक महिलाओं को शिक्षित करने और उन्हें कमाई के साधनों से जोड़ने पर फोकस करने की जरूरत है। 1970 में दुनिया में प्रति महिला 4.45 बच्चे का जन्म होता था, जो दर अब 2.45 तक गिर चुकी है। बहरहाल, जनांनिकी विशेषज्ञों को महिलाओं से जनसंख्या बम डिफ्यूज करने में खास अपेक्षाएं हैं।
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