Thursday, November 17, 2011

मूल्य नियंतण्रनीति के दायरे में आएंगी 348 जेनरिक दवाएं


केन्द्र सरकार ने कहा है कि दवाओं की लागत और बाजार में आने पर उनके न्यूनतम मूल्य में जमीन-आसमान का फर्क है। इसका असर देश की गरीब जनता वहन कर रही है। इस कारण 348 जेनरिक दवाओं को मूल्य नियंतण्रके दायरे में लाया जाएगा ताकि आम आदमी को कीमती औषधि से राहत मिल सके। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में माना है कि विभिन्न कंपनियां एक ही साल्ट की दवाएं, ब्रांड नेम से बेचकर भारी मुनाफा कमा रही है। मरीजों को अपने इलाज का 60 प्रतिशत हिस्सा दवाइयों पर खर्च करना पड़ता है। 1987 तक 300 से अधिक जेनरिक दवाइयों पर मूल्य नियंतण्रथा। लेकिन इनकी संख्या घटाकर 140 कर दी गई। इसका असर मरीजों और विशेषकर समाज के निचले तबके के लोगों पर पड़ा जो बीमार होने पर बाजार से महंगी दवाइयां खरीदते हैं। चिकित्सा सेवा को
आम आदमी के करीब पहुंचाने के लिए जेनरिक दवाओं पर कंट्रोल जरूरी है। इस समय सिर्फ 74 दवाएं ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के तहत आती है। इन दवाइयों का मूल्य सरकार निर्धारित करती है। कोई भी उद्यमी सरकार की अनुमति के बिना इन दवाओं के दाम नहीं बढ़ा सकता। जल्द ही 348 जेनरिक दवाओं के मूल्यों पर सरकार का नियंतण्रहोगा। हलफनामे में कहा गया है कि मंत्रालय ने इस सिलसिले में आवश्यक दवाओं की सूची में परिवर्तन किया है। नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसन(एनएलक्ष्एम) 2003 के स्थान पर एनएलक्ष्एम 2011 लाया गया है। इन दवाओं का इस्तेमाल बहुत अधिक मात्रा में किया जाता है। इन सभी दवाओं के साल्ट इस सूची में अंकित हैं। औषधि पर मूल्य नियंतण्रके साथ-साथ सरकार यह भी सुनिश्चत करेगी कि दाम घटने से यह दवाएं बाजार से गायब न हो जाए। बाजार में इन दवाओं की समुचित सप्लाई की जाएगी। सरकार सभी को चिकित्सा सेवा मुहैया करना चाहती है। सरकार की इस नीति को लागू करने के लिए मंत्रालय प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने अपने ही औषधि विभाग को इस बारे में सूचित कर दिया है। मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को आासन दिया है कि उसके आदेश के तहत राष्ट्रीय औषधि नीति तैयार की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में केन्द्र सरकार बनाम केएस गोपीनाथ के मामले में जीवन रक्षक दवाओं पर मूल्य नियंतण्रका आदेश दिया था। इसी मुद्दे पर अदालत ऑल इंडिया ड्रग्स एक्शन नेटवर्क द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है।

No comments:

Post a Comment