कीमोथेरपी के जरिए लंग्स (फेफड़ा) कैंसर का इलाज अब 50 फीसदी सस्ता होने वाला है। एम्स के डाक्टरों ने मरीजों के हितों को देखते हुए कीमोथेरपी का एक नया फार्मूला इजाद किया है। यह पहले जैसे ही कारगर होगा। डाक्टरों का दावा है कि पूर्व में दी जा रही दवाओं के एक विशेष मिश्रण से इस थेरपी पर आने वाला खर्च पहले ही तुलना में 50 फीसदी कम हो जाएगा। एम्स के मेडिसीन विभाग के प्रो. रणदीप गुलेरिया के नेतृत्व में इस अध्ययन को अंजाम दिया गया है। डॉक्टर गुलेरिया ने कहा कि समाज में धूम्रपान का चलन बढ़ता जा रहा है। ऐसे में लंग्स कैंसर के मरीज भी बढ़ रहे हैं। इसके इलाज के लिए कीमोथेरेपी काफी महंगी होती है, जो आम मरीजों के जेब से बाहर की बात है। ऐसे में इलाज पर आने वाले खर्च को कम करने के उद्देश्य से यह अध्ययन किया गया। इसके लिए अलग-अलग उम्र के 100 मरीजों को लिया गया, जिन्हें लंग्स कैंसर था। इन लोगों को कीमोथेरपी में दी जाने वाली दवा ही दी गई, लेकिन दवाओं का एक प्रकार का विशेष मिश्रण बनाने के बाद। यह तकनीक उतनी ही कारगर साबित हुई जितना पहले का इलाज था। लेकिन दवाओं के इस मिश्रण ने इलाज के खर्च को पचास फीसदी कम कर दिया है। ऐसे में अब आम मरीज भी कम खर्च पर कीमोथेरेपी की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि यह कीमोथेरेपी छह चक्र की होगी जो सप्ताह में तीन बार दी जाएगी। इस अध्ययन को यूरोपियन रेसप्रेट्री सोसायटी से भी मान्यता मिल गई है। बता दें कि कीमोथेरेपी एक ऐसा औषधीय उपचार है, जो कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए दिया जाता है। कीमोथेरेपी दो शब्दों से मिलकर बना है। कैमिकल अर्थात रसायन और थेरेपी अर्थात उपचार। कैंसर सेल को मारने के लिए कौन सी कीमोथेरेपी दी जाए इसका निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज को किस प्रकार का कैंसर है।
Wednesday, June 29, 2011
कैंसर रोगियों के लिए जागी नई उम्मीद
कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारी के इलाज की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा इंजेक्शन विकसित करने का दावा किया है, जो प्रतिरक्षा तंत्र को अधिक सक्रिय करके कैंसर कोशिकाओं और ट्यूमर को नष्ट कर सकता है। ब्रिटेन में कैंसर के रिसर्च सेंटर और यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के वैज्ञानिकों ने मिलकर यह इंजेक्शन तैयार किया है। उनका कहना है कि यद्यपि यह इंजेक्शन कैंसर से पूरी तरह निजात नहीं दिला पाएगा। इसको लगाने के बावजूद भी कैंसर की बीमारी बनी रहेगी, लेकिन मरीज इस बीमारी के कारण असमय मौत के मंुह में समाने से बच जाएगा। उन्होंने कहा कि इस इंजेक्शन को लगाने के बाद यह प्राणघातक बीमारी नियंत्रण में आ जाती है और मरीज अपेक्षाकृत अधिक समय तक जी सकता है। वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग के दौरान अमेरिका के मायो क्लीनिक के विशेषज्ञों के साथ मिलकर डीएनए पर आधारित इलाज की यह तकनीक ईजाद की जो बिना किसी दुष्परिणाम के ट्यूमर को नष्ट कर सकती है। अखबार डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य तौर पर प्रतिरक्षा तंत्र कैंसर कोशिकाओं के खतरे को नहीं पहचानता और इस कारण उनकी अनदेखी कर देता है। मगर इस इंजेक्शन को लगाने के बाद प्रतिरक्षा तंत्र पहले से अधिक सक्रिय हो जाता है और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है। मिर्गी मानसिक बीमारी नहीं नई दिल्ली : मिर्गी मस्तिष्क का एक विकार है जो तंत्रिका कोशिकाओं के असामान्य व्यवहार की वजह से होता है लेकिन यह मानसिक बीमारी या कोई संक्रामक रोग नहीं है। तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डॉ अनुराधा मिश्र कहती हैं मस्तिष्क में पाई जाने वाली तंत्रिका कोशिकाएं वैसे तो सामान्य संकेत देती हैं। आम तौर पर न्यूरॉन कहलाने वाली यह कोशिकाएं इलेक्ट्रोकैमिकल प्रभाव उत्पन्न करती हैं जो मानवीय विचार, अहसास उत्पन्न करने और उनके अनुरूप कार्य करने के लिए दूसरी न्यूरॉन, ग्रंथियों और मांसपेशियों को प्रेरित करते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया होती है। लेकिन मिर्गी के मरीज में यह प्रक्रिया असामान्य हो जाती है।
रहस्यमय बीमारी से 26 की मौत आज बिहार पहुंचेगा केंद्रीय दल
मुजफ्फरपुर में रहस्यमय बीमारी से चार और बच्चों की मौत से राज्य और केंद्र सरकार चौकन्नी हो गई है। एक हफ्ते में 26 बच्चों की जिंदगी लेने वाली इस रहस्यमय बीमारी की जांच करने केंद्र से विशेषज्ञों की टीम मंगलवार को यहां पहुंचेगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को बताया कि इस बारे में उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से बात कर उनसे टीम भेजने का अनुरोध किया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने इस बीमारी व इससे हो रही बच्चों की मौत के संबंध में मुख्य सचिव व स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव से बात की है। उन्हें यह बताया गया है कि आरएमआइ के विशेषज्ञों ने नमूना संग्रह कर जांच के लिए उसे पुणे भेज दिया है। पिछले कुछ वर्षो से जून में इस तरह की बीमारी सामने आती है। चिकित्सक लक्षण के आधार पर इसका इलाज करते हैं। नीतीश ने कहा कि यह सही समय है इसकी जांच हो जानी चाहिए कि आखिर यह बीमारी है क्या? जांच के आधार पर इलाज होना चाहिए। ऐसी बात भी कही जा रही है कि जहां लीची अधिक होती है वहां यह बीमारी अधिक होती है। पहले गोरखपुर में भी यह बीमारी होती थी। वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक राष्ट्रीय संक्रामक रोग केंद्र (एनसीडीसी) के संयुक्त निदेशक डा. एस के जैन के नेतृत्व में मंगलवार को एक केंद्रीय दल प्रभावित क्षेत्र मुजफ्फरनगर पहुंचेगा। मंत्रालय ने कथित जापानी इंसेफेलाइटिस मामलों की जांच के लिए एक केंद्रीय दल मुजफ्फरपुर भेजने का निर्णय किया है। बिहार के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव अमरजीत सिन्हा ने 17 जून को मुजफ्फरपुर का दौरा कर वहां हालात का जायजा लिया था। इसके बाद, 18 जून को पटना के अगमकुआं में स्थित रीजनल मलेरिया रिसर्च इंस्टीट्यूट (आरएमआरआई) की एक टीम ने मुजफ्फरपुर जाकर अज्ञात बीमारी से पीडि़त बच्चों के खून के नमूने लिए थे जिन्हें जांच के लिए पुणे स्थित एनआइवी एवं नई दिल्ली स्थित एनआइसीडी भेज दिया गया। पिछले एक दिन में इस अज्ञात बीमारी से चार और बच्चों की मौत के साथ ही मृतकों की कुल बढ़कर 26 हो गई है। 30 अन्य अभी भी बीमार हैं। वहीं राजद अध्यक्ष ने दावा किया कि सोमवार सुबह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद से उनकी इस मुद्दे पर बात हुई और आजाद ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में अज्ञात बीमारी से बच्चों की मौत के मामले की जांच के लिए वहां जल्द से जल्द केंद्रीय जांच दल भेजने का आश्वासन दिया।
60 हजार में बदलेंगे घुटने
शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में, अत्याधुनिक उपकरणों और सुविधाओं से सुसज्जित स्टेट ऑफ दि आर्ट ऑपरेशन थिएटर में अब घुटने का प्रत्यारोपण (नी रिप्लेसमेंट) सिर्फ 60 हजार रुपये में संभव है, जबकि इसी ऑपरेशन के लिए मरीज को बड़े निजी अस्पताल में साढ़े तीन लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कानपुर के सरकारी गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज (जीएसवीएम) में कुछ दिन पहले ही अत्याधुनिक उपकरणों और सुविधाओं से सुसज्जित स्टेट ऑफ दि आर्ट ऑपरेशन थिएटर की शुरुआत हुई है। अभी तक इस ऑपरेशन थिएटर में किसी भी रोगी के ऑपरेशन के बाद उसे किसी भी प्रकार के संक्रमण की कोई शिकायत नहीं आई है। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य और हड्डी रोग विभाग के प्रमुख प्रो आनंद स्वरूप ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में घुटना प्रत्यारोपण की सुविधा केवल 60 हजार रुपये में उपलब्ध है। इसमें से 45 हजार रुपये रोगी के घुटने में लगाए जाने वाले, स्वदेश निर्मित इम्प्लान्ट के लिए तथा 15 हजार रुपये अन्य खर्च के लिए प्रयुक्त होते हैं। रोगी को दवाएं और भर्ती रहने के दौरान खाना-पीना अस्पताल से मुफ्त में दिया जाता है। घुटना प्रत्यारोपण कराने वाले रोगी को तीन दिन में उसके पैरों पर चलाने की कोशिश की जाती है तथा एक हफ्ते के अंदर घर जाने की इजाजत दे दी जाती है। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में एक घुटने के प्रत्यारोपण में दो से ढाई लाख रुपये का खर्च आता है। कॉरपोरेट अस्पताल में इसी ऑपरेशन के लिए खर्च तीन से साढ़े तीन लाख रुपये तक होता है। प्रो स्वरूप ने बताया कि निजी अस्पतालों में घुटना प्रत्यारोपण करने वाले सर्जन की फीस ही 70 हजार से एक लाख रुपये के बीच होती है। ऑपरेशन थिएटर, नर्सिंग और एनेस्थीसिया आदि की फीस भी 70 से 80 हजार रुपये होती है तथा 30 से 40 हजार रुपये की दवाएं लगती हैं। जीएसवीएम सरकारी मेडिकल कॉलेज है इसलिए यहां न तो प्रत्यारोपण ऑपरेशन करने वाले सर्जन की फीस देनी पड़ती है और न ही ऑपरेशन थिएटर आदि का खर्च और दवाइयों के पैसे देने पड़ते हैं.
Saturday, June 18, 2011
Friday, June 17, 2011
Wednesday, June 15, 2011
Tuesday, June 14, 2011
एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया बड़ा खतरा
राजधानी के पानी में एनडीएम-1 (न्यू डेल्ही मेटालोबेटा लैक्टामेज-1) नामक प्रतिरोधी बैक्टीरिया पाए जाने की हालांकि अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है लेकिन यह एक बड़ा खतरा भी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल से ऐसे बैक्टीरिया फिर पैदा हो सकते हैं जिन पर एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं करतीं। ऐसे में इनका संक्रमण ज्यादा खतरनाक होगा। आइएमए नेशनल के सहायक महासचिव और शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि मलिक ने बताया, प्रतिरोधी बैक्टीरिया की उत्पत्ति का कारण एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल होता है। दुनिया भर में सर्वाधिक प्रभावकारी और तेज एंटीबायोटिक दवा कार्बापेनम मानी जाती है लेकिन प्रतिरोधी बैक्टीरिया पर इसका भी असर नहीं होता। यदि एनडीएम-1 की पुष्टि हो जाती है तो वह भी प्रतिरोधी बैक्टीरिया की श्रेणी में ही आएगा। डॉ. आर.के. गुप्ता ने बताया, जानकारी के अभाव में जिस तरह एंटीबायोटिक दवाओं का लोग अधिक इस्तेमाल करते हैं, उससे ऐसे प्रतिरोधी बैक्टीरिया के पैदा होने का खतरा बना रहता है। इनका संक्रमण जानलेवा भी हो सकता है इसलिए ऐसे खतरे के प्रति समय रहते सावधान हो जाना चाहिए। डॉ. मलिक ने बताया, कुछ खास तरह के बैक्टीरिया की एंटीबायोटिक दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता चिंता का कारण बन गई है क्योंकि ऐसे बैक्टीरिया मरीज को कई अन्य तरह की समस्याएं भी उत्पन्न कर देते हैं। इसका आर्थिक खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। अस्पताल में भर्ती मरीजों में से कई के इलाज के 25 फीसदी खर्च का कारण यही होता है। डॉ. एस.एस. राठी कहते हैं कि वैसे तो बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का तेजी से असर होता है लेकिन इनका लगातार उपयोग बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बढ़ा देता है कि वे एंटीबायोटिक दवाओं से बेअसर हो जाते हैं। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि जुकाम और वायरल संबंधी अन्य बीमारियों के लिए एंटीबायोटिक लेना हमेशा कारगर नहीं होता। कई बार तो यह खतरनाक भी हो सकता है क्योंकि इससे ऐसे बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं जिन्हें खत्म करना ही बड़ी चुनौती होता है। इनकी प्रतिरोधक क्षमता बार बार एंटीबायोटिक लेने के कारण इतनी बढ़ चुकी होती है कि उन पर दवाओं का असर नहीं होता।
फिर चेताया, सेलफोन देता है कैंसर
विश्र्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सेलफोन का इस्तेमाल करने वालों के लिए एक बार फिर चेतावनी जारी की है। उसका कहना है कि सेलफोन और अन्य वायरलैस उपकरणों के अत्यधिक इस्तेमाल से कैंसर हो सकता है। डब्ल्यूएचओ से जुड़ी कैंसर पर शोध करने वाली इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आइएआरसी) ने आठ दिन तक फ्रांस के ल्योन में चली अंतरराष्ट्रीय बैठक के समापन पर यह निष्कर्ष पेश किया। उसका कहना है कि मोबाइल फोन जैसे उपकरणों के इस्तेमाल से उत्पन्न होने वाले विद्युत चुंबकीय क्षेत्र से कैंसर की आशंका पैदा होती है। एबीसी न्यूज के अनुसार, विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि सेलफोन आने के बाद मस्तिष्क में होने वाले एक प्रकार के कैंसर ग्लिओमा के भी मामले बढ़े हैं। इस समय दुनिया भर में कुल पांच अरब लोग सेलफोन का इस्तेमाल करते हैं। आइएआरसी के अध्यक्ष और यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के प्रोफेसर जोनाथन सेमेट का कहना है कि सेलफोन एक हानिकारक उपकरण है। इस उपकरण और कैंसर के संबंध में अभी और शोध करने की जरूरत है। वैज्ञानिकों ने कुछ लोगों के फोन पर बात करने की आदत पर भी गौर किया। उन्होंने पाया कि इन लोगों ने पिछले दस साल में प्रतिदिन औसतन 30 मिनट फोन पर बात की थी। आइएआरसी का कहना है कि वर्तमान वैज्ञानिक निष्कर्ष वायरलैस उपकरणों और कैंसर के बीच केवल संभावित संबंध को बताते हैं, हालांकि अभी इनकी पुष्टि नहीं हुई है। आइफोन, ब्लैकबेरी और अन्य फोनों में इस्तेमाल होने वाली 3जी तकनीक में रेडियोएक्टिव किरणों का उत्सर्जन कम होता है। हालांकि इस दिशा में प्रयोग अभी शुरुआती अवस्था में ही हैं।
यूपी में पोषाहार की जिम्मेदारी भी माताओं को
मिड डे मील के बाद अब सूबे के आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को पौष्टिक आहार बांटने की जिम्मेदारी भी माताओं को सौंप दी गई है। माताएं बच्चों को पोषाहार देकर उनकी सेहत सुधारेंगी। फिलहाल यह योजना सहारनपुर, मथुरा, झांसी, कुशीनगर और सीतापुर में लागू की गई है। वैसे बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग ने यह फैसला तो पहले ही कर लिया था, मगर माताओं के हाथ में योजना संचालित करने की चाभी अब दी गई है। गौरतलब है कि इससे पहले प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में मिड डे मील को पकाने और परोसने की जिम्मेदारी भी माताओं को सौंपने का फैसला किया था। विभाग ने विशेष पहल करके हाट कुक्ड फूड योजना के संचालन के लिए मातृ समितियों का पुनर्गठन किया है और उनके बैंक खाते खुलवाकर धनराशि भेजी जा रही है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर तीन से छह साल के कुपोषित बच्चों को पौष्टिक आहार देने में पारदर्शिता बरतने के लिए यह प्रयोग किया गया है। विभाग ने पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चयनित सूबे के पांच जिलों में कक्षा आठ तक पढ़ी लिखी उन माताओं को मातृ समितियों के लिए चुना है, जिनके बच्चे आंगनबाड़ी केंद्रों पर पंजीकृत हैं। योजना की स्थिति यह है कि सहारनपुर जिले की चयनित परियोजना शहर, सढ़ौली, कदीम, गंगोह एवं नकुड़ में संचालित 1005 केंद्रों के सापेक्ष 900 केंद्रों पर मातृ समितियों का गठन कर उनका खाता खुलवा दिया गया है। सहारनपुर ही नहीं मथुरा जिले की चयनित परियोजना मथुरा ग्रामीण, नवझील, बल्देव, चौमुहा, झांसी की मऊ रानीपुर, मोंठ और शहर, कुशीनगर की चयनित परियोजना पड़रौना, शहर, बिशुनपुरा, कप्तानगंज, नेबुआ नौरंगिया तथा सीतापुर की सिधौली, कसमण्डा, बिसवा, पहला एवं रामपुर मथुरा में संचालित सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर मातृ समितियों का पुनर्गठन कर उनके बैंक खाते खोलने के कार्य पूरे कर लिये गये हैं। अभी तक सिर्फ महमूदाबाद परियोजना में भी मातृ समितियों के पुनर्गठन का कार्य पूरा नहीं हो सका है। विभागीय निदेशक देवेन्द्र नाथ वर्मा कहते हैं कि अब तो माताओं की सीधी जवाबदेही है कि वे अपने बच्चों की सेहत सुधारें। इसके लिए योजना के संचालन की उन्हें जिम्मेदारी दी गई है और अब उनको ही अपने बच्चों को हाट कुक्ड योजना का पौष्टिक आहार देना है। हर माह 58:71 करोड़ आहरण की स्वीकृति मिली : बाल विकास परियोजनाओं में संचालित आंगनबाड़ी केन्द्रों पर दिये जाने वाले गरम पूरक पोषाहार की सामग्री खरीदने के लिए सूबे के सभी 897 परियोजनाओं को शासन ने 58 करोड़ 71 लाख 71 हजार 875 रुपये प्रतिमाह की दर से अग्रिम आहरण की स्वीकृति प्रदान की है। यह व्यवस्था अगस्त से आगे हर माह के लिए लागू होगी। जून और जुलाई के व्यय के लिए एक अरब 17 करोड़ 43 लाख 43 हजार 750 रुपये एकमुश्त जारी कर दिये गये हैं।
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