वैज्ञानिकों ने कोलेस्ट्रॉल की एक नई किस्म अल्ट्रा बेड को खोजा है। यह हृदय रोग के खतरे को बढ़ा देती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नई खोज कोलेस्ट्रॉल के नए इलाज में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। यह कोलेस्ट्रॉल अत्यधिक चिपचिपा और कम घनत्व वाला लाइपोप्रोटीन (एलडीएल) होता है जिसे एमजीमिन-एलडीएल नाम दिया गया है। आमतौर पर यह बुजुर्ग लोगों और टाइप-2 डायबिटीज से पीडि़त लोगों में पाया जाता है। इंग्लैंड में वारविक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह खोज की है। उन्होंने बताया कि यह पदार्थ एलडीएल या बेड कोलेस्ट्रॉल की सामान्य किस्म से कहीं अधिक चिपचिपा है। इसी कारण शिराओं की दीवारों से इसके चिपकने की संभावना ज्यादा होती है। मुख्य शोधकर्ता डॉ. नाइला रब्बानी ने बताया, अपनी खोज को लेकर हम बेहद रोमांचित हैं। यह मधुमेह पीडि़तों और बुजुर्गो में हृदय रोगों के मामले में काफी मददगार साबित होगी। उन्होंने बताया कि हमारा अध्ययन मधुमेह के रोगियों में कोरोनरी हृदय रोग के खतरे के बढ़ने का संभावित कारण उपलब्ध कराता है। डॉ. रब्बानी ने कहा कि उम्मीद है इससे नई एंटी-कोलेस्ट्रॉल दवाओं के विकास में मदद मिलेगी। एमजीमिन-एलडीएल में शर्करायुक्त अणु होते हैं जो सामान्य एलडीएल के मुकाबले बेहद छोटे और घने होते हैं, शिराओं की दीवारों पर आसानी से चिपक जाते हैं और खतरनाक वसीय फलक के निर्माण के लिए प्रारंभिक बिंदु उपलब्ध कराते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि जैसे-जैसे जमाव बढ़ता है, शिराएं संकरी हो जाती हैं और रक्त प्रवाह धीमा हो जाता है। फलस्वरूप ये फट भी सकती हैं, थक्का बन सकता है जो स्ट्रोक या हृदयाघात का कारण बन जाता है। नए कोलेस्ट्रॉल के अणु शरीर में अन्य अणुओं के साथ कैसे मेल करते हैं, यह जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में मानव एमजीमिन-एलडीएल का निर्माण किया। इसमें उन्होंने एलडीएल के अतिरिक्त शर्करायुक्त समूह हो जोड़ा और इसको ज्यादा चिपचिपी किस्म में परिवर्तित होने दिया। जर्नल डायबिटीज में प्रकाशित इस अध्ययन में समझाया गया है कि क्यों मधुमेह की आम दवा मेटफॉरमिन हृदयाघात के खतरे को घटा देती है। मेटफॉरमिन ब्लड शुगर का स्तर कम करती है। साथ ही यह सामान्य एलडीएल को कहीं ज्यादा खतरनाक एमजीमिन-एलडीएल में तब्दील होने से रोक सकती है। डॉ. रब्बानी ने कहा, टाइप-2 डायबिटीज बड़ा मुद्दा है। ब्रिटेन के 2.6 मिलियन मधुमेह रोगियों में करीब 90 फीसदी टाइप-2 से पीडि़त हैं। यह खासतौर पर मध्यम आयवर्ग वालों और दक्षिण एशियाई समुदाय में आम है.
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