सर्दी में हार्ट अटैक की आशंका अधिक होती है। खून का थक्का अधिक बनता है और खून काफी गाढ़ा हो जाता है। जो लोग हृदय से संबंधित बीमारियों से ग्रस्त होते हैं, उन्हें इस मौ सम में अपने स्वास्थ्य का खासा ध्यान रखना होता है। सीवियर अटैक होने का खतरा काफी हो जाता है
कुछ लोग ठंड में अपने शरीर पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। वे हेल्थ चेकअप भी नहीं कराते। उन्हें लगता है कि एंजियोग्राफी कराने पर, यदि कुछ निगेटिव आ गया तो दिक्कत हो जाएगी। कहीं र्सजरी करानी पड़ी तो परेशानी हो जाएगी। लोगों को ऐसा नहीं सोचना चाहिए। हेल्थ चेकअप तो लगातार कुछ अंतराल पर करानी चाहिए। खुदा न खास्ता यदि किसी मरीज को हॉर्ट अटैक हो जाए और हॉस्पिटल दूर हो या समय से नहीं पहुंच पाए, तो जान पर बन आती है। ऐसे में, यदि वे पहले से तैयार रहेंगे और लापरवाही नहीं बरतेंगे, तो परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। ईसीजी, होल्टर, डीएमटी आदि अक्सर करानी चाहिए, जिससे स्वास्थ्य के बारे में लोग सजग रहें। बीमारी का पहले पता लग जाए तो उससे बचाव में आसानी होती है। खाने-पीने के मामले में भी खासा ध्यान रखने की जरूरत है। र्सदी के मौसम में धूम्रपान से दूर रहना चाहिए। तली चीजों से परहेज करें। पूरी, हलवा आदि से दूर रहें। रेगुलर एक्सरसाइज जरूरी है। धीरे चलें, लेकिन लंबी दूरी तक चलें। इस मौसम में नाश्ता करने के बाद जब शरीर में थोड़ी र्गमी आ जाए तो टहलने निकलें। ट्रेवलिंग कम करें। ट्रेड मिल घर में हो तो कसरत करें। रेशेवाला भोजन लें। सलाद और हरी सब्जियों का सेवन खूब करें। इस मौसम में गाजर खूब मिलती हैं। गाजर खूब खाएं। शिमला मिर्च का सेवन करें। जिन लोगों को डायबिटीज है, वे खान-पान पर जरूर ध्यान रखें। अमरूद खाएं। नाशपाती और सेब भी खाएं, क्योंकि इनमें काफी फाइबर होता है। डायबिटीज को कंट्रोल में रखें। गेहूं के चोकर से बनी रोटी और ब्राउन ब्रेड लें। कोलस्ट्राल बढ़ाने वाले भोजन न करें। अंडे ज्यादा न खाएं। घी, मक्खन काफी नुकसान करता है। टोंड दूध का सेवन करें। चाय-काफी की मात्रा में कमी करें। ये तनाव को बढ़ाता है। मेडिटेशन-योग आदि जरूर करें। आनुवांशिक रोगों पर खासा ध्यान रखें। इस मौसम में खांसी-जुकाम बड़ा नुकसान करता है। ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखें। कसरत करने से डायबिटीज पर काबू पाया जा सकता है। डिस्प्रिन ले सकते हैं, क्योंकि यह खून का थक्का शरीर में नहीं बनने देता। (डॉ. सत्संगी नई दिल्ली स्थित जीबी पंत अस्पताल में हार्ट स्पेशियलस्टि हैं)
Wednesday, December 29, 2010
बहरा बना रहे हैं म्युजिक प्लेयर
17 फीसदी युवक और युवतियां हियरिंग लॉस की समस्या से ग्रस्त हैं
24 घंटे तक तेज ध्वनि में संगीत सुनने से होता है बहरेपन की समस्या में 20 फीसदी इजाफा
न्यूयार्क। एक नए शोध में खुलासा किया गया है कि पोर्टेबल ऑडियो प्लेयर से गाना सुनने की शौकीनों को बहरेपन की शिकायत हो सकती है। हालांकि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में हियरिंग लॉस यानी इस तरह के बहरेपन के लक्षण अधिक देखे जाते हैं। शोध के मुताबिक अब महिलाएं भी इस तरह की समस्या दो चार होने लगी हैं।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में शीर्ष शोधकर्ता एलिजाबेथ हेन्डरसन ने बताया कि किशोरवय युवक और युवतियों की हियरिंग क्षमता को जानने के लिए किए एक परीक्षण में पाया गया कि औसतन 17 फीसदी युवक और युवतियां हियरिंग लॉस की समस्या से ग्रस्त थे यानी हर छठवां बहरेपन की परेशानी से जूझ रहा था, जिनमें से कुछ को तो बगल वाले की आवाज तक सुनने में मुश्किल हो रही थी और कुछ तो हाई स्पीड साउंड भी सुनने में अक्षम थे। हालांकि रिपोर्ट में युवतियों में हियरिंग लॉस की समस्या का उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन हेन्डरसन कहती हैं कि युवतियों में हियरिंग लॉस की समस्या इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि किशोरवय युवतियां हेडफोन पर काफी तेज आवाज में गाना सुनना पसंद करती हैं। हालांकि माना जाता है कि युवक ज्यादा तेज आवाज में संगीत सुनना पसंद करते हैं, लेकिन बदलते दौर में पोर्टेबल म्युजिक प्लेयर की पहुंच युवक व युवतियों में समान रुप में पहुंचने से अब दोनों ही अपने हेडफोन से तेज आवाज में संगीत सुन रहे हैं। हेन्डरसन कहती हैं कि यदि कोई युवक हेडफोन से लगातार 24 घंटे तक तेज आवाज में संगीत सुनता है तो उसमें बहरेपन की समस्या में 20 फीसदी इजाफा की संभावना रहती है जबकि वर्ष 1980 से 1990 के आरंभिक वर्षों में जब पोर्टेबल म्युजिक प्लेयर कम प्रचलन में था, उस दौरान युवकों में यह औसत 35 फीसदी था। बकौल हेन्डरसन, ‘युवतियों में बढ़ रहे बहरेपन का कारण पोर्टेबल म्युजिक प्लेयर का बढ़ता प्रचलन है, जिसमें युवतियों की बढ़ती भागीदारी ही उनमें उत्पन्न होने वाली हियरिंग लॉस की परेशानी का प्रमुख कारण हैं।’
Monday, December 27, 2010
उत्तरप्रदेश में राशन वितरण व्यवस्था चरमरायी
चालीस से ज्यादा जिलों में गरीबों को नहीं मिल रहा अनाज स्टेट पूल खत्म होने के बाद आया गंभीर खाद्यान्न संकट खाद्य एवं रसद विभाग व भारतीय खाद्य निगम ने बनायी रणनीति
लखनऊ । प्रदेश के एक करोड़ से ज्यादा गरीब परिवारों के लिए बनी सार्वजनिक वितरण पण्राली (राशन) में खाद्यान्न संकट खड़ा हो गया है। चालीस से ज्यादा जिले इस संकट की गिरफ्त में हैं। इन जनपदों में खाद्यान्न वितरण का रोस्टर पूरी तरह फेल हो चुका है और इनमें रहने वाले गरीब परिवारों को राशन का वितरण रुक गया है। कहीं गरीबों को राशन का गेहूं नहीं मिल पा रहा है, तो कहीं चावल का वितरण नहीं हो पा रहा है। आने वाले दिनों में खाद्यान्न का यह संकट और भी गहराने की आशंका है। राशन वितरण व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाये रखने के लिए प्रदेश में राशन वितरण का रोस्टर है। जिसमें प्रत्येक महीने की 22 तारीख से पहले जिला गोदामों में खाद्यान्न पहुंच जाना चाहिए। हर महीने 23 से 30 तारीख तक खाद्यान्न जिला गोदामों से ब्लाक गोदामों में जाता है और इस अवधि में कोटेदारों को अपने पैसों को जमा करना होता है। महीने की एक से 4 तारीख के बीच खाद्यान का राशन दुकानों में पहुंचने का प्रावधान है,जहां 5 से 20 तारीख के मध्य इसका वितरण गरीबों को होता है। परन्तु पिछले कुछ समय से खाद्यान्य वितरण का यह रोस्टर पूरी तरह फ्लाप हो चुका है और राज्य सरकार को इसमें कई बार बदलाव करना पड़ा है। राज्य की राशन वितरण व्यवस्था में अचानक आया गंभीर संकट स्टेट पूल को खत्म किये जाने का नतीजा है। स्टेट पूल के खत्म होने के बाद राज्य सरकार के पास अपना कोई खाद्यान्न भंडारण नहीं है और वह प्रदेश के गरीबों को राशन बांटने के लिए पूरी तरह से केन्द्र सरकार के केन्द्रीय पूल पर निर्भर है। भारतीय खाद्य निगम द्वारा केन्द्रीय पूल का खाद्यान्न समय पर उपलब्ध न करा पाने के कारण गरीबों को राशन का वितरण रुका है। सूबे के जिन जनपदों में राशन वितरण का संकट आया है उनमें मैनपुरी, आगरा, एटा, झांसी, महोबा, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, औरैया, कन्नौज, हरदोई, गाजीपुर, चंदौली, चित्रकूट, कानपुर, कानपुर देहात, मुरादाबाद, सहारनपुर, फतेहपुर, इटावा, मथुरा, प्रतापगढ़, आजमगढ़, बहराइच, फैजाबाद, देवरिया, सीतापुर, सोनभद्र, कांशीरामनगर, बुलंदशहर, जालौन, ललितपुर, महाराजगंज तथा गोण्डा आदि शामिल हैं। इनमें कुछ में गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों को गेहूं नहीं मिल है, तो कुछ में चावल नहीं मिला है। राशन वितरण की गाड़ी वैसे तो इन जनपदों में काफी पहले से गड़बड़ चल रही थी और गरीबों को राशन का वितरण विलंब से चल रहा है, लेकिन अब हालात काफी गंभीर हो चुके हैं। पिछले दो से तीन महीनों से इन जनपदों में गरीबों को राशन नहीं मिला है। प्रभावित जनपदों में गरीबी रेखा के नीचे की बड़ी आबादी बाजार का महंगा राशन खरीदने में सक्षम नहीं है। ऐसे में इनके परिवारों में दो वक्त का चूल्हा नहीं जल पा रहा है। विदित हो कि लक्ष्य आधारित सार्वजनिक वितरण पण्राली में प्रदेश के 1.06 करोड़ परिवारों को राशन का खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान है। हालांकि गरीबी रेखा के ऊपर के परिवारों को भी राशन का गेहूं मिलता है, लेकिन उनको हर महीने इसका वितरण जरूरी नहीं है। इन्हें राशन के खाद्यान्न का वितरण उपलब्धता के आधार पर कराया जाता है। सूत्रों के मुताबिक वर्ष 1994-95 से चली आ रही राशन व्यवस्था में राज्य सरकार ने पिछले साल बदलाव कर दिया था, जिसमें स्टेट पूल को पूरी तरह खत्म कर दिया गया था। नयी व्यवस्था के लागू होने के बाद से प्रदेश में न तो लक्ष्य के अनुरूप गेहूं की खरीद हो पा रही है और न ही धान की। नतीजा पड़ोसी राज्यों में होने वाली खरीद पर राज्य की राशन व्यवस्था निर्भर हो गयी है। सरकारी आंकड़ें बताते है कि पिछले साल निर्धारित लक्ष्य का आधा खाद्यान्न भी नहीं खरीदा जा सका है। जब स्टेट पूल था तो राज्य सरकार के पास अपना खाद्यान्न भंडारण हुआ करता था, जिसका वह राशन में वितरण कराती थी और खरीद और वितरण के दामों के अन्तर की धनराशि केन्द्र सरकार सब्सिडी के रूप में दे दिया करती थी, लेकिन अब स्टेट पूल तो बचा नहीं है। ऐसे में भारतीय खाद्य निगम जब खाद्यान्न उपलब्ध कराता है तभी राशन में इसका वितरण होता है। राशन वितरण में संकट की बात प्रदेश की खाद्य एवं रसद आयुक्त वीना कुमारी मीणा ने भी स्वीकार की है। उनका कहना है कि राशन वितरण व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भारतीय खाद्य निगम के आला-अफसरों के साथ लगातार बैठकें हो रही हैं और यह प्रयास किये जा रहे हैं कि सभी जनपदों में केन्द्रीय पूल का राशन समय पर उपलब्ध हो सके । उनका कहना है कि भारतीय खाद्य निगम की गोदामों से गेहूं और चावल के विलंब से मिलने के कारण यह नौबत बनी है। आयुक्त ने बताया कि संकट से निपटने के लिए खाद्य एवं रसद विभाग और भारतीय खाद्य निगम के अफसरों ने एक रणनीति तैयार की है, जिससे आगे चलकर खाद्यान्न संकट के कम होने की उम्मीद है।
मृत घोषित बच्चे में एक घंटे बाद हरकत, अस्पताल ने पल्ला झाड़ा
अस्पताल के एक कर्मचारी ने बच्चे को किया मृत घोषित
दफनाते समय बच्चे में देखी गई हरकत
सिरसा (एसएनबी)। रविवार को डबवाली रोड स्थित एक निजी अस्पताल के एक कर्मचारी ने कथित रूप से एक बच्चे को मृत घोषित कर दिया। परिजन मृत बच्चे को दफनाने जब शिवपुरी में पहुंचे तो बच्चे में हरकत देखी गई। परिजनों बच्चे को एक अन्य निजी अस्पताल में दाखिल कराया है। इस बच्चे का इलाज कर रहे डॉक्टर का कहना है कि अविकसित बच्चों के साथ ऐसा हो जाता है। उधर बच्चे का पहले इलाज करने वाले डॉक्टर ने कहा कि उन्होंने बच्चे को मृत घोषित नहीं किया था लेकिन उसकी हालत गंभीर बताई थी। रानियां रोड पर बाबा बिहारी की समाधि के समीप रहने वाले युवक विनेद कुमार ने बताया कि बीस दिन पहले उसकी पत्नी सरोज रानी ने एक बच्चे को जन्म दिया था। बच्चा कमजोर है। इस कारण उसे डा. आरएम बाना के अस्पताल में दाखिल कराया था जिसे बाद में घर ले आए। रविवार सुबह आठ बजे बच्चे की तबियत अचानक खराब हो गई तो वह बच्चे के साथ निजी अस्पताल पहुंचे। उस समय डा. आरएम बाना नहीं थे लेकिन अस्पताल के ही एक अन्य कर्मचारी ने बच्चे को देखकर बताया कि बच्चे की मौत हो चुकी है। विनोद कुमार ने बताया कि बच्चे को घर लेकर पहुंचे और बाद में बच्चे को दफनाने के लिए परिजन शिवपुरी ले गए। दफनाते समय बच्चे में हरकत देखी गई। उसे फिर डबवाली रोड स्थित एक नर्सिग होम में ले जाया गया जहां पर बच्चे का उपचार हो रहा है। बच्चे का उपचार कर रहे डा. राजेंद्र सिंह सरां ने बताया कि बच्चे को कृत्रिम श्वांस दी जा रही है लेकिन हालत गंभीर बनी हुई है। उन्होंने बताया कि बच्चे का दिल सामान्य गति से धड़क रहा है। उधर डा. बाना का कहना है कि मैंने बच्चे के परिजन को कहा था कि बच्चे की हालत गंभीर है। उसे भर्ती कराना पड़ेगा फिर भी वे बच्चे को घर ले गए। मेरी अनुपस्थिति में किस कर्मचारी ने बच्चे को मृत करार दिया, उसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।
Sunday, December 26, 2010
सर्दी में महिलाओं में हार्टअटैक का खतरा ज्यादा
छह गुना ज्यादा तक बढ़ जाता है खतरा, जबकि पुरुषों में तीन गुना
गिरते पारे से राजधानीवासियों को ठंड से तो दो चार होना ही पड़ रहा है, हृदय रोगियों को दोहरी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दी के मौसम में हृदय रोगियों की धमनियों में रक्त प्रवाह की गति में कमी होने लगती है। दिल की धड़कन स्लो होने से हृदयाघात की संभावनाओं की पुनरावृत्ति आम मौसमों की अपेक्षा 40 फीसद अधिक हो जाती है। एम्स में सीटीवीएएस विभाग के अध्यक्ष डा.बीके बहल के अनुसार महिलाओं में हृदयाघात का खतरा 6 गुना बढ़ जाता है जबकि पुरुषों में तीन गुना बढ़ता है। यह खतरा बिना धूम्रपान करने वालों की तुलना में उन लोगों में बढ़ता है जो एक दिन में कम से कम 20 सिगरेट पीते हैं। दरअसल ओपीडी में ऐसे मामले आजकल ज्यादा आ रहे हैं, जिनकी कुछ समय पहले बायपास व एंजियोग्राफी की गई है। इसमें वे रोगी भी शामिल हैं जिनकी बीते कुछ सालों के दौरान हृदय तंत्रिकाओं की सर्जरी हो चुकी है। ऐसे रोगियों के रेगुलर जांच में यह पाया गया कि उनके खून की वाहिकाओं में रक्त गाढ़ा होने, थक्क ा बनने की रफ्तार तेज हो जाती है। इसलिए नवम्बर से जनवरी के दौरान ऐसे रोगियों को विशेष एहतियात बरतनी चाहिए। इंडियन हार्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष डा. आरएन कालरा ने कहा कि नवम्बर से 15 दिसम्बर के दौरान 1800 लोगों के स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग में पाया गया कि दिल के रोगी सामान्य दिनों की अपेक्षा खानपान, जीवनशैली स्लो कर देते हैं। जो हार्ट अटैक का सबब बनते हैं। इनके लिए जरूरी है कि नियमित व्यायाम करें। मदिरा, सिगरेट, तैलीय खाद्य वस्तुओं का सेवन करने से बचें। आर्टिमस अस्पताल के कार्डियक सर्जन डॉ. अनिल ढल ने कहा कि तापमान गिरने से इसका असर शरीर में रक्त प्रवाह करने वाली नलिकाओं पर पड़ता है। हृदयाघात के साथ ही ब्रेन अटैक, लकवाग्रस्त होने जैसे मामलों में वृद्धि हो जाती है। उन्होंने 50 की उम्र पार करने वाले रोगियों को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने की सलाह दी और कहा कि खुद ही अपने जीवन को बचाने के लिए नियमित व्यायाम जरूर करें। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल ने अपने मन से दवाएं नहीं लेने की सलाह दी। दिल के रोगियों को धूम्रपान से बचना चाहिए।
गिरते पारे से राजधानीवासियों को ठंड से तो दो चार होना ही पड़ रहा है, हृदय रोगियों को दोहरी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दी के मौसम में हृदय रोगियों की धमनियों में रक्त प्रवाह की गति में कमी होने लगती है। दिल की धड़कन स्लो होने से हृदयाघात की संभावनाओं की पुनरावृत्ति आम मौसमों की अपेक्षा 40 फीसद अधिक हो जाती है। एम्स में सीटीवीएएस विभाग के अध्यक्ष डा.बीके बहल के अनुसार महिलाओं में हृदयाघात का खतरा 6 गुना बढ़ जाता है जबकि पुरुषों में तीन गुना बढ़ता है। यह खतरा बिना धूम्रपान करने वालों की तुलना में उन लोगों में बढ़ता है जो एक दिन में कम से कम 20 सिगरेट पीते हैं। दरअसल ओपीडी में ऐसे मामले आजकल ज्यादा आ रहे हैं, जिनकी कुछ समय पहले बायपास व एंजियोग्राफी की गई है। इसमें वे रोगी भी शामिल हैं जिनकी बीते कुछ सालों के दौरान हृदय तंत्रिकाओं की सर्जरी हो चुकी है। ऐसे रोगियों के रेगुलर जांच में यह पाया गया कि उनके खून की वाहिकाओं में रक्त गाढ़ा होने, थक्क ा बनने की रफ्तार तेज हो जाती है। इसलिए नवम्बर से जनवरी के दौरान ऐसे रोगियों को विशेष एहतियात बरतनी चाहिए। इंडियन हार्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष डा. आरएन कालरा ने कहा कि नवम्बर से 15 दिसम्बर के दौरान 1800 लोगों के स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग में पाया गया कि दिल के रोगी सामान्य दिनों की अपेक्षा खानपान, जीवनशैली स्लो कर देते हैं। जो हार्ट अटैक का सबब बनते हैं। इनके लिए जरूरी है कि नियमित व्यायाम करें। मदिरा, सिगरेट, तैलीय खाद्य वस्तुओं का सेवन करने से बचें। आर्टिमस अस्पताल के कार्डियक सर्जन डॉ. अनिल ढल ने कहा कि तापमान गिरने से इसका असर शरीर में रक्त प्रवाह करने वाली नलिकाओं पर पड़ता है। हृदयाघात के साथ ही ब्रेन अटैक, लकवाग्रस्त होने जैसे मामलों में वृद्धि हो जाती है। उन्होंने 50 की उम्र पार करने वाले रोगियों को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने की सलाह दी और कहा कि खुद ही अपने जीवन को बचाने के लिए नियमित व्यायाम जरूर करें। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल ने अपने मन से दवाएं नहीं लेने की सलाह दी। दिल के रोगियों को धूम्रपान से बचना चाहिए।
गर्भवती महिला पर पहले ही खतरा भांप लेगा नया टेस्ट
लंदन, एजेंसी : वैज्ञानिकों ने एक ऐसा परीक्षण विकसित करने का दावा किया है, जो उच्च रक्तचाप से पीडि़त महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान होने वाली ज्यादा जटिलताओं के बारे में पहले ही बता देगा। हर 10 में से एक महिला को उच्च रक्तचाप के कारण मूत्र में प्रोटीन जाने की परेशानी (प्री-एक्लेंप्सिया) होती है। ऐसी कई महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान उनके जीवन को भी खतरा पैदा हो जाता है। इसका एकमात्र उपचार बच्चे को जल्दी जन्म देना होता है। द लैंसेट पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक दल ने ऐसा परीक्षण ईजाद किया है जिससे महिलाओं में प्री-एक्लेंप्सिया के बारे में पहले ही बताया जा सकेगा, कब महिला के लिए दौरा, कोमा या मृत्यु की स्थिति पैदा हो सकती है। वैज्ञानिकों ने मां के लक्षणों, पूर्व इलाज का इतिहास, कार्डियोवेस्कुलर संकेत, रक्त, किडनी के परिणाम, लिवर परीक्षण और भ्रूण संबंधी परीक्षणों पर एकत्रित आंकड़ों का इस्तेमाल गणना करने के लिए किया। उन्होंने प्री-एक्लेंप्सिया वाली 2000 से ज्यादा महिलाओं के आंकड़ों की गणना की जिनमें से 13 फीसदी में जटिलताएं विकसित हो गई थीं। मगर इनमें से किसी की मृत्यु नहीं हुई। फुलपियर्स नामक इस गणना के फलस्वरूप ऐसी तीन चौथाई से ज्यादा महिलाओं की पहचान हुई जिन पर बाद में होने वाला खतरा काफी ज्यादा था। जबकि सिर्फ 16 फीसदी ऐसी महिलाएं थीं जिनमें उच्च्च खतरे की पहचान गलत हुई। द डेली टेलीग्राफ में प्रकाशित खबर के अनुसार, वैज्ञानिकों ने कहा है कि नई खोज पुराने परीक्षणों को खारिज कर सकती है और इनका स्थान ले सकती है। इससे प्रयोगशाला में होने वाले खर्च में भी कमी आएगी। सह शोधकर्ता डॉ. पीटर वॉन ने बताया कि फुलपियर्स मॉडल जटिलताएं उभरने से सात दिन पूर्व ही ऐसी महिलाओं की पहचान कर लेता है जिनमें खतरा बढ़ रहा होता है और इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
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