Wednesday, December 22, 2010

कैंसर की पहचान करेगी इलेक्ट्रॉनिक नाक

वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक नाक विकसित करने में सफलता पाई है जिसके उपयोग से गर्भाशय कैंसर से ग्रस्त मरीजों की पहचान की जा सकेगी। यह इलेक्ट्रॉनिक नाक कैंसर से ग्रस्त ऊतकों से निकलने वाली एक विशेष महक के जरिए मरीजों की पहचान करती है। वैज्ञानिकों द्वारा किए एक परीक्षण में इस बात की पुष्टि हुई है कि गर्भाशय कैंसर से ग्रस्त ऊतकों और स्वस्थ ऊतकों की महक में भिन्नता होती है, जिसे इलेक्ट्रानिक नाक आसानी से पकड़ लेती है।
गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता ग्योरगे हॉर्वेथ और गावेल यूनिवर्सिटी व केटीएच रॉयल इंस्टीटूट ऑफ टेक्नोलाजी के शोधकर्ताओं द्वारा इस शोध को संचालित किया गया। उल्लेखनीय है वैज्ञानिकों ने इससे पूर्व भी एक विशेष प्रशिक्षित कुत्ते के जरिए गर्भाशय कैंसर के ऊतकों के विशेष महक की पहचान करने में सफलता पाई थी। विशेष प्रशिक्षित कुत्ता स्वस्थ ऊतकों व अन्य स्त्रीरोग संबंधी कैंसर के बीच कैंसरग्रस्त ऊतकों की पहचान करने में सफल हुआ था। बीएमसी कैंसर जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस अनुसंधान से यह भी मालूम हुआ है कि गर्भाशय कैंसर से पीड़ित मरीज के खून में वह विशेष महक पाई जा सकती है जो गर्भाशय की कैंसर ग्रस्त ऊतकों में पाई गई थी। शोधकर्ता हॉर्वेथ ने कहा कि गर्भाशय कैंसर से ग्रस्त ऊतकों की विशेष महक की पहचान अब इलेक्ट्रॉनिक नाक से भी की जा सकेगी जो पहले संभव नहीं था। बकौल हॉर्वेथ, हम गर्भाशय कैंसर वाले ऊतकों के अतिरिक्त फैलोपियन ट्यूब और गर्भ मांसपेशियों से भी इस विशेष महक को पकड़ने व इसकी पहचान करने में सफल हुए हैं। उन्होंने कहा हालांकि महक के जरिए कैंसर की पहचान की टेक्निकल पुष्टि करना व्यवहारिक रूप से कठिन होगा लेकिन यह तकनीक कैंसर की पहचान करने में पूरी तरह से सक्षम होगी और उम्मीद है कि इस संवेदनशील व विशेष मैथेड के जरिए अकेले स्वीडन में सैंकड़ों लोगों की जिंदगी बचाई जा सकेगी।
रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने अभी हाल ही में एक अन्य अति संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक सेंट डिटेक्टर का परीक्षण किया है, जिसक ी मूल बनावट इलेक्ट्रॉनिक नाक की सदृश ही है। लेकिन इस नए इलेक्ट्रॉनिक सेंट डिटेक्टर में कुछ नए उपकरण लगाए गए हैं जो इसकी संवदेनशीलता में वृद्धि करती है। हॉर्वेथ कहते हैं कि उनका लक्ष्य है कि भविष्य में महज सामान्य ब्लड टेस्ट के जरिए ही गर्भाशय कैंसर की संभावना को पकड़ा जा सके, जिससे आरंभिक स्टेज पर ही पीड़ित मरीजों की इलाज शुरु की जा सके। यह अध्ययन फ्युचर आन्कोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई है।


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