Wednesday, May 25, 2011

मशरूम में मिलने वाला तत्व प्रोस्टेट कैंसर स्टेम कोशिकाओं को निशाना बनाता है


अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि एशिया में इस्तेमाल होने वाला एक चिकित्सीय मशरूम, प्रोस्टेट कैंसर को मात दे सकता है। क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने बताया है कि तुर्की टेल मशरूम प्रयोगशाला में चूहों में प्रोस्टेट कैंसर को विकसित होने से दबाने में 100 फीसदी प्रभावी साबित हो रहा है। यह शोध पीएलओएस वन जर्नल में प्रकाशित हुआ है। मुख्य शोधकर्ता डॉ. पैट्रिक लिंग ने बताया कि तुर्की टेल मशरूम में मिलने वाले तत्व पॉलीसैकैरोपेप्टाइड (पीएसपी) के बारे में पता चला है कि यह चूहों में प्रोस्टेट कैंसर स्टेम कोशिकाओं को निशाना बनाते हुए ट्यूमर बनने की आशंका को कम करता है। उन्होंने कहा कि यह शोध इस बीमारी से लड़ने में अहम कदम साबित हो सकता है। शोध के दौरान मिले परिणाम खासे अहम हैं। उन्होंने कहा, हम जो प्रदर्शित करना चाहते थे वह था कि यह तत्व क्या प्रोस्टेट ट्यूमर के विकास को रोक सकता है। हमने इसके जरिए इलाज में किसी तरह के दुष्प्रभाव भी नहीं देखे। परीक्षण के दौरान, जो यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग और प्रोवाइटल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था, प्रोस्टेट ट्यूमर वाले चूहे को 20 हफ्तों तक पीएसपी का सेवन कराया गया। डॉ. लिंग ने कहा कि जिन्हें पीएसपी दिया गया था उनमें ट्यूमर खत्म हो गया जबकि जिन्हें यह नहीं दिया गया था उनमें इसका विकास हो गया। उन्होंने कहा कि शोध के परिणाम बताते हैं कि पीएसपी इलाज पूरी तरह से ट्यूमर के निर्माण को बाधित कर सकता है।


मीठे जहर में बदल रहा है पेयजल


भूजल स्तर के गिरने के साथ पेयजल जहरीला भी होता जा रहा है। रसातल की ओर लौट रहे इस पानी में कई तरह के खतरनाक रसायनों और खनिज तत्वों के घुलने से पीने के साफ पानी का भी टोटा हो गया है। छोटी-बड़ी कई नदियों वाले उत्तर भारत में साफ पानी की भारी किल्लत है। लोगों के स्वास्थ्य पर अब इस दूषित पानी का असर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। ग्रामीण पेयजल आपूर्ति की हालत और भी खराब है। खासतौर से उत्तरी राज्यों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति का सिर्फ पांच फीसदी सरकारी योजनाओं पर निर्भर है। बाकी 95 फीसदी पेयजल के लिए लोग कुओं पर निर्भर हैं, लेकिन भूजल स्तर के नीचे खिसकने से ज्यादातर कुएं भी सूख गएहैं। उनकी जगह हैंडपंप और नलकूपों ने ले ली है। इन माध्यमों से निकल रहा पानी गुणवत्ता की दृष्टि से जहर से कम नहीं है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 85 फीसदी पेयजल का स्त्रोत भूजल है। इसके बावजूद ज्यादातर लोगों के लिए दूषित पेयजल पीना उनकी नियति बन गई है। सरकारी सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार भूजल में रासायनिक प्रदूषण के अलावा स्वास्थ्य के लिए घातक खनिज तत्व घुले हैं। भूजल में ये तत्व प्राकृतिक रूप से मिले हुए हैं। रासायनिक उर्वरक और सीवरेज से भूजल में नाइट्रेट घुल रहा है। पानी में इसकी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा प्राकृतिक रूप से घुली है। इसे पीने के लायक स्वच्छ बनाना बहुत सरल नहीं है। इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए बारिश के ज्यादा से ज्यादा पानी के संचयन की जरूरत है। सरकारी एजेंसियां भी मानती हैं कि खतरनाक तत्वों को पानी से अलग करने की कारगर तकनीक का देश में अभाव है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की 7067 बस्तियों के निवासी आर्सेनिक और 29070 बस्तियों के लोग फ्लोराइड युक्त भूजल पीने को मजबूर हैं। एक लाख से ज्यादा बस्तियों के लोग लौह तत्व घुले भूजल पर गुजारा कर रहे हैं। इन बस्तियों के लोगों के पास पेयजल का कोई और विकल्प नहीं है।

जन्म से पहले मृत्यु


पिछले दिनों लांसेट जर्नल ने अपनी एक शोध रिपोर्ट में इस तथ्य को खुलासा किया कि विश्व में हर वर्ष जन्म लेने से पहले ही 26 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। इनमें से 98 प्रतिशत मौतें गरीब और विकासशील देशों में होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार मृत शिशु पैदा होने के 18 लाख मामले दस विकासशील देशों में होते हैं। इनमें भारत का नाम पहले स्थान पर है। एक ओर भारत आर्थिक मंच पर विश्व के विकासशील देशों को टक्कर दे रहा है तो दूसरी ओर मानव विकास के पैमानों पर अविकसित देशों के साथ खड़ा है। गरीबी, अशिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की कमी से रोज औसतन 1,680 शिशु मृत पैदा होते हैं। इनकी तादाद आधी से कम हो सकती है अगर प्रसूति के समय सही चिकित्सकीय सहायता प्राप्त हो जाए। देश के चुनिंदा अस्पतालों को अगर छोड़ दिया जाए तो देशभर के अधिकांश अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं। हालात यह है कि ज्यादातर स्थानों पर नर्सिग स्टाफ ही प्रसव-कार्य करवाता है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आपरेशन थिएटर को संक्रमण मुक्त रखने के लिए नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया जाता। भारत अभी भी बाल मृत्युदर कम करने के लिए निर्धारित किए गए सहस्राब्दि स्वास्थ्य लक्ष्यों को हासिल करने में कई विकसित देशों और यहां तक कि श्रीलंका जैसे विकासशील देश से भी पीछे है। पिछले कुछ दशकों से जनस्वास्थ्य पर सरकारी ध्यान कम हुआ है जिसका परिणाम यह हुआ है कि जहां एक ओर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर होती चली गई हैं वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की ज्यादा हिस्सेदारी के चलते साधनविहीन लोग चिकित्सा सुविधाओं से वंचित होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 70 प्रतिशत विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को लागू हुए चार साल हो गए, लेकिन अभी तक एक लाख आबादी पर स्थापित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 50 से 60 प्रतिशत विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। स्वास्थ्य स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने 2011-12 में उम्मीद के विपरीत बजट प्रावधानों में कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं की। वर्तमान में सरकार लोगों के स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का 0.94 प्रतिशत ही खर्च करती है जो विश्व के अन्य देशों की तुलना में सबसे कम है। चीन, ब्राजील और श्रीलंका भारत से तीन गुना ज्यादा खर्च करते हैं। बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद भारत के मुकाबले लगभग आधा है, लेकिन बांग्लादेश में जीवन प्रत्याशा भारत की तुलना में छह साल अधिक है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत के नीति निर्माताओं की दृष्टि में मानव जीवन की कीमत बहुत कम है। बाल अधिकार संगठन सेव द चिल्ड्रन की एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि मां बनने के लिए सर्वोत्तम स्थान की सूची में शामिल 77 देशों में भारत का स्थान 73वां है। भारत सरकार स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसूति को प्रोत्साहित करती है, लेकिन यह देखने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है कि गर्भावस्था संबंधी पेचीदगियों से महिलाओं एवं उनके गर्भस्थ शिशु को बचाने के लिए ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में उन्हें पर्याप्त उपचार मुहैया कराया जा रहा है अथवा नहीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 74 हजार मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जिनमें 21 हजार ऑग्जिलरी नर्स मिडवाइफ्स (एएनएम) की कमी है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कमी देश के बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे में है। बाल मृत्यु के दुष्चक्र की भयावहता को कम करने के प्रयास सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। मृत शिशुओं के जन्म के आंकड़े हमारी नाकामी को बता रहे हैं। जहां इतने बड़े पैमाने पर बाघों का जीवन संकटग्रस्त हो, वहां ऐसी नीतियों को बनाने की आवश्कता है जिससे देश के नौनिहालों का जीवन सुरक्षित हो सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Sunday, May 22, 2011

यूपी में स्कूलों के स्वास्थ्य कार्यक्रम को मारा लकवा


उत्तर प्रदेश में चलाया गया विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम खुद बीमार हो गया है। कुछ अध्यापकों को प्रशिक्षण देने के बाद कार्यक्रम को लकवा मार गया है। स्वास्थ्य विभाग की टीमें काम नहीं कर रही हैं। यही वजह है कि बच्चों के सेहत की रिपोर्ट गोल है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के तहत 2009-10 में विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसमें करीब सवा दो लाख बच्चों की सेहत की देखभाल की जानी थी। उन्हें बताया जाना था कि वह गर्मी में कैसा भोजन लें और किस तरह के भोजन से परहेज करें। कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए ब्लॉक स्तर पर अध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई थी। स्वास्थ्य विभाग की टीमों को स्कूल का दौरा कर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करने और उसका लेखा जोखा स्वास्थ्य रजिस्टर और बच्चे के हेल्थ कार्ड में अंकित करना था। इतना ही नहीं, टीम को बच्चों को पेट के कीड़े मारने, आयरन व फोलिक एसिड की गोलियां भी वितरित करनी थीं। यह है कार्यक्रम की हकीकत : ब्लॉक स्तर पर 40-40 शिक्षकों को बाल स्वास्थ्य के संबंध में दो दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की टीमों को स्कूलों में जाकर बच्चों का परीक्षण, उनमें दृष्टि दोष, कुपोषण, साफ- सफाई, भोजन आदि के बारे में जानकारी देनी थी। शिक्षा विभाग के मिड-डे मील के आंकड़ों के मुताबिक, 2010-11 में उन्हें स्वास्थ्य विभाग से किसी तरह की प्रगति या स्वास्थ्य परीक्षण की रिपोर्ट नहीं मिली। बच्चों के परीक्षण से संबंधित रजिस्टर में भी कोई सूचना अंकित नहीं है। मिड-डे मील के जिला समन्वयक खेलेंद्र सिंह राणा ने बताया कि बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण का कोई रिकार्ड विभाग को नहीं भेजा गया। एमडीएम टास्क फोर्स की बैठक में भी यह मुद्दा उठाया था। डिप्टी सीएमओ डा. एसपी सिंह ने कहा कि हमने गत वर्ष 60 स्कूलों में इस कार्यक्रम के तहत कार्य किया है। 60 और विद्यालय चिह्नित किए हैं। सीमित संसाधनों में ही सही, बेहतर प्रयास किए जा रहे हैं।


Thursday, May 19, 2011

नाक से होगी फेफड़ों के कैंसर की सही पहचान


बोस्टन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिसमें रोगी की नाक की कोशिकाओं की जांच से फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती दौर में पहचान कर ली जाएगी। प्रारंभिक समय में फेफड़ों के कैंसर का पता चलना आसान नहीं होता क्योंकि मौजूदा परीक्षण काफी जटिल होते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक किसी व्यक्ति के नाक की अंदरुनी एपीथीलियल कोशिकाओं में वही आनुवांशिक संकेतक होते हैं जो फेफड़े के कैंसर के मरीजों में होते हैं। एक आसान सी तकनीक की मदद से नाक की अंदरूनी कोशिकाओं की जांच से चिकित्सक फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती अवस्था में पता लगा सकते हैं। उस समय इसका उपचार भी संभव होगा। फेफड़ों का कैंसर वास्तव में कैंसर का एक सामान्य प्रकार है। इससे ग्रस्त मरीजों में से केवल 15 फीसदी मरीज ही औसतन पांच साल जी पाते हैं। मरीज का इतने समय के लिए जीवित रहना इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर का पता किस अवस्था में चला। शोधकर्ताओं ने धूम्रपान करने वाले 33 लोगों के नाक के अंदरुनी हिस्से से एपीथीलियल कोशिकाओं के सैंपल को जमा किया। इन सभी की फेफड़ों का कैंसर होने की आशंका के चलते जांच की जा रही थी। इनमें से 22 को इस बीमारी से ग्रसित पाया गया। जबकि शेष में इस बीमारी का कोई लक्षण नहीं पाया गया। कोशिकाओं का विश्लेषण करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि कोशिकाओं में 170 अलग-अलग जीन थे, जिनकी गतिविधियों का स्तर अलग था और इस बात पर निर्भर था कि रोगी को फेफड़ों का कैंसर है या नहीं।


शिशु भ्रूण को ही तंदुरुस्त कर देगी सरकार


ऐसा शख्स, जिसने दी एड्स को मात


Tuesday, May 17, 2011

गांवों के लिए नहीं मिल पाए डाक्टर


लखनऊ ,  वर्ष 2007 में सत्ता में आने के बाद बसपा सरकार की पहली ही कैबिनेट बैठक में अगर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए संविदा के आधार पर डाक्टर रखने का फैसला हुआ तो मतलब साफ था कि गांवों की बदहाल स्वास्थ्य सेवा का इल्म उसे था। इस निर्णय का स्वागत हुआ था। उसकी वजह थी कि सरकार ने रिक्त पदों को भरने के लिए नई भर्ती होने का इंतजार करने बजाय एक नया रास्ता चुना, लेकिन सरकार की यह कोशिश इस वजह से परवान नहीं चढ़ पाई कि गांवों में जाने के लिए डाक्टर साहेबान तैयार ही नहीं हुए। सरकार लगभग डेढ़ हजार पदों पर संविदा के आधार पर डाक्टर रखने की ख्वाहिश मंद थी लेकिन सिर्फ चार सौ ही डाक्टर मिल पाए। सरकार ने अपने वादे को निभाने के लिए आयुष (आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) डाक्टरों को संविदा के आधार पर रखना शुरू किया लेकिन इसमें केंद्र सरकार ने अडंगा डाल दिया। केंद्र सरकार का कहना है कि इन डाक्टरों के पास जब एलोपैथिक डिग्री नहीं तो एलोपैथिक इलाज कैसे कर सकते हैं? ऐसे में आयुष डाक्टरों की संविदा रद हो गई। हालांकि सरकार कह रही है कि उसने संविदा के आधार पर डाक्टर रखने की जो नीति तय की है, उसके आधार पर वह रिक्त पदों को भरने के लिए प्रयासरत है लेकिन जानकारों का कहना है कि संविदा पर भी डाक्टर इसलिए नहीं मिल रहे हैं कि सरकार ने जो पैसा तय कर रखा है (18 हजार रुपये महीने), वह कम है। ऊपर से एक दिन की अनुपस्थित पर पांच सौ रुपये की कटौती का भी नियम है। मिशन से लगा भ्रष्टाचार का घुन : ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करने में केंद्र सरकार का राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन भी कामयाब नहीं हो पाया। केंद्रीय अनुदान से अस्पतालों की साज-सज्जा तो बेहतर हुई परंतु चिकित्सकों व स्टाफ की भरपाई नहीं हो पाई। मिशन के तहत 6 हजार करोड़ की आर्थिक इमदाद मिलने के बाद स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरने के बजाय विभाग को भ्रष्टाचार की बीमारी लग गई। लखनऊ में ताबड़तोड़ दो-दो सीएमओ मार दिए गए। खुद सरकार ने माना कि विभाग में कर्मचारियों के स्तर पर भ्रष्टाचार पनपा है। इसके चक्कर में दो विभागों परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य के मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ गया। महानिदेशक डॉ. एसपी राम का कहना है कि चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी को खत्म करने के प्रयास किए जा रहे हैं। 389 चिकित्सकों की नियुक्ति लोक सेवा आयोग के जरिए की गई। संविदा पर नियुक्तियों में आ रही तकनीकी बाधा को दूर करने की कोशिश की जा रही है।


Sunday, May 15, 2011

जान से खिलवाड़


क्या होगी बीमारी, पहले बताएगा सॉफ्टवेयर


पांच मिनट की जांच में अगर यह पता चल जाए कि आपको आने वाले दिनों में कौन सी बीमारी हो सकती है तो इलाज कितना आसान हो जाएगा। इस काम को पूरा करने के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। जिसकी मदद से महज पांच मिनट में यह पता लगा जाएगा कि शरीर के किस हिस्से में कौन सी बीमारी हो सकती है। यह सॉफ्टवेयर लावण्या आयुर्वेदिक कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने बनाया है। बृहस्पतिवार को इसका प्रदर्शन किया गया और इसके काम करने के तरीकों के बारे में बताया गया। बृहस्पतिवार को हुई लावण्या के चेयरमैन अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि यह सॉफ्टवेयर रोग के कारणों को जानने में मदद करेगा। शरीर के सेंसर बिंदुओं की मदद से यह सॉफ्टवेयर काम करेगा। शहरी में क्या बीमारी है, किस स्तर पर है और भविष्य में क्या हो सकती है, यह सब जांच में पता लग जाएगा। रोग होने के क्या कारण है, इसके बारे में विस्तृत जानकारी मिलेगी। वहीं, एक स्केनर के जरिए शरीर के सातों चक्र, कुंडली और इनके ऊर्जा स्तर की जानकारी मिलेगी। हार्मोन्स असंतुलित होने के कारण होने वाले रोगों के बारे में इन चक्र की ऊर्जा के स्तर पर पता लगाया जाएगा। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद को वैज्ञानिक तरीके से प्रभावी बनाने के लिए मशीन और सॉफ्टवेयर का सहारा लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि तीन माह में लगभग दो हजार दो सौ मरीजों का डाटा तैयार किया जाएगा, जिनके कैंसर का इलाज लावण्या आयुर्वेदिक कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर द्वारा किया गया है। श्रीवास्तव ने कई उदाहरण देकर बताया कि एक बार कैंसर का इलाज आयुर्वेदिक तरीके से होने के बाद दवाओं के खाने की जरूरत नहीं पड़ती। उन्होंने आयुर्वेद में लीज थेरेपी से किए जाने वाले इलाज के बारे में भी बताया। इसमें मुहांसों को किस तरह से खत्म किया जाए, इसके बारे में विस्तार से बताया।


Monday, May 9, 2011

मुड़ी एड़ियों का नया उपचार मिला


सागर में सबसे अधिक कुपोषित


मुड़ी ऐडि़यों का चिकित्सकों ने खोजा नया उपचार


चिकित्सकों ने मुड़ी ऐडि़यों (क्लब फीट) के साथ पैदा होने वाले बच्चों के उपचार का एक नया तरीका खोजने का दावा किया है। क्लब फीट नाम की यह बीमारी लगभग 800 बच्चों में से किसी एक को होती है। जिन बच्चों को यह परेशानी होती है, उनके ऑपरेशन और कई महीनों के उपचार के बाद वे सामान्य तौर पर चल पाते हैं। डेली मेल की खबर के मुताबिक, चिकित्सक अब इसके नए उपचार के तहत एक विशेष प्रकार के जूतों का उपयोग कर रहे हैं। इस बहुचरणीय उपचार प्रक्रिया का विकास कोवेंट्री यूनिवर्सिटी अस्पताल के चिकित्सकों ने किया है। इस नई पद्धति के बारे में बाल हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. इरेन वॉन डेर ने बताया, इस प्रक्रिया से कम दर्द होगा, संक्रमण की आशंका कम होगी तथाच्बच्चे का पैर और लचीला हो जाएगा। मुड़ी एडि़यों के दो-तिहाई मामलों में दोनों ही पैर प्रभावित होते हैं। इस रोग से प्रभावित शिशुओं को एक बड़ा ऑपरेशन कराना पड़ता है और कुछ महीने तक भीषण पीड़ा सहने के बाद ही उनके सामान्य रूप से चलने की स्थिति बन पाती है। लेकिन नए इलाज से ठीक होने की प्रक्रिया अब इतनी जटिल नहीं रहेगी। नए इलाज में प्रभावित पैरों को घुटनों के नीचे से एक सांचे में रखा जाता है। इतने समय में यह तकलीफ दूर हो जाती है। यह चिकित्सकीय सांचा भी एक लचीले किस्म के प्लास्टर से बना होता है जिसे सामान्य पट्टी की तरह बांधा जा सकता है। हर हफ्ते एक बार इस सांचे को हटा दिया जाता है। उसके बाद पैर को सामान्य रूप से हिलाने और सामान्य स्थिति में रखने की कोशिश की जाती है। चिकित्सकों का कहना है कि परंपरागत रूप से शिशुओं को कमर से पैर तक सांचे में रखा जाना होता है। लेकिन इस प्रक्रिया में घुटने को इलाज से अलग रखा जाता है। एक बार जब प्लास्टर हटा दिया जाता है तो शिशु को खास किस्म से बनाए गए जूते पहनाए जाते हैं। इसमें धातु की छड़ें लगी होती हैं। तीन महीने के लिए प्रतिदिन पैर को 23 घंटे के लिए जूते में ही रखना होता है। उसके बाद सिर्फ रात में दो से चार घंटे के लिए पैर जूते में रखने होते हैं। इससे पहले परंपरागत विधि में बच्चों को नौ माह की अवस्था में एक बड़े आपरेशन का सामना करना पड़ता था। पैर को पूरी तरह से शरीर से अलग किए जाने के बाद उसे वापस सही तरीके से जोड़ा जाता था। नए सिरे से पैर लगाने पर इसके जख्म भरने की अवधि भी अधिक और बहुत पीड़ादायी होती थी।


Saturday, May 7, 2011

खुर पका बीमारी से बच सकेंगे मवेशी


खुर पका (फुट एंड माउथ डिजीज) मवेशियों में होने वाली ऐसी खतरनाक संक्रामक बीमारी है जो महामारी का रूप ले सकती है। भारत समेत दुनियाभर के कई देश इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। इसका सबसे भयावह पहलू यह है कि इसके संक्रमण को रोकने के लिए भारी मात्रा में पशुओं की हत्या तक करनी पड़ जाती है। मगर अब यह पशु संहार बीते दिनों की बात हो जाएगा। वैज्ञानिकों ने यह समझने में कामयाबी हासिल कर ली है कि इस बीमारी का वायरस कैसे फैलता है। गाय के खुर पका बीमारी से संक्रमित होने और इसके वायरस के दूसरे जानवर तक पहुंचने के समय के बीच के बिंदु पर वैज्ञानिकों को एक मौका मिला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खोज का मतलब है कि संक्रमित पशुओं को खोजना संभव है और इससे पहले वह संक्रमण को फैलाएं उन्हें झुंड से अलग किया जा सकता है। यदि वायरस की पहचान का परीक्षण किया जा सके जो सस्ता होने के साथ-साथ किसान के इस्तेमाल के लिए काफी तेज भी हो, तो भारी मात्रा में पशुओं की हत्या किए बिना ही महामारी पर नियंत्रण किया जा सकता है। इडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क वूलहाउस ने कहा, हमारे पर अब नए परीक्षणों को विकसित करने का अवसर है जिसके जरिए संक्रमित जानवरों को काफी पहले ही खोजा जा सकता है। इससे यह बीमारी फैल नहीं पाएगी। वर्ष 2001 में ब्रिटेन में इस कारण करीब एक करोड़ पशुओं को मौत के घाट उतारना पड़ा था, जिससे लगभग आठ अरब पौंड (करीब 600 अरब रुपये) का नुकसान हुआ था। इस अध्ययन को साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है। सरे में इंस्टीट्यूट फॉर एनिमल हेल्थ की एक शाखा पिरब्राइट लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने यह सफलता हासिल की है। उन्होंने 2007 में अपेक्षाकृत छोटे और स्थानीय स्तर तक सीमित खुर पका बीमारी का अध्ययन शुरू किया कि यह कैसे फैलती है। दल ने अपने प्रयोग के दौरान एक स्वस्थ गाय को आठ घंटे तक ऐसी गाय के निकट रखा जिसे जानबूझ कर वायरस से संक्रमित किया गया था। संक्रमण के फैलने का पता लगाने के लिए ऊतकों के नमूनों की जांच की गई। वायरल जीन के परीक्षण ने दिखाया कि कब स्वस्थ जानवर संक्रमित हुआ और कब जानबूझ कर संक्रमित की गई गाय वायरस को दूसरे जानवर में संचारित करने के लायक हुई। दल ने पाया कि खुर पका बीमारी से संक्रमित गाय ने आधे दिन में ही बीमारी के पहले लक्षण दिखा दिए और सिर्फ 1.7 दिनों तक ही संक्रामक रही, जो पहले की सोच के मुकाबले आधा समय है। प्रोफेसर वूलहाउस ने कहा कि यहां अवसर की काफी छोटी खिड़की है, एक या दो दिन, जब हम बता सकते हैं कब गाय संक्रमित हुई मगर यह अन्य गायों के लिए संक्रामक नहीं है।