Wednesday, May 25, 2011

जन्म से पहले मृत्यु


पिछले दिनों लांसेट जर्नल ने अपनी एक शोध रिपोर्ट में इस तथ्य को खुलासा किया कि विश्व में हर वर्ष जन्म लेने से पहले ही 26 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। इनमें से 98 प्रतिशत मौतें गरीब और विकासशील देशों में होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार मृत शिशु पैदा होने के 18 लाख मामले दस विकासशील देशों में होते हैं। इनमें भारत का नाम पहले स्थान पर है। एक ओर भारत आर्थिक मंच पर विश्व के विकासशील देशों को टक्कर दे रहा है तो दूसरी ओर मानव विकास के पैमानों पर अविकसित देशों के साथ खड़ा है। गरीबी, अशिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की कमी से रोज औसतन 1,680 शिशु मृत पैदा होते हैं। इनकी तादाद आधी से कम हो सकती है अगर प्रसूति के समय सही चिकित्सकीय सहायता प्राप्त हो जाए। देश के चुनिंदा अस्पतालों को अगर छोड़ दिया जाए तो देशभर के अधिकांश अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं। हालात यह है कि ज्यादातर स्थानों पर नर्सिग स्टाफ ही प्रसव-कार्य करवाता है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आपरेशन थिएटर को संक्रमण मुक्त रखने के लिए नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया जाता। भारत अभी भी बाल मृत्युदर कम करने के लिए निर्धारित किए गए सहस्राब्दि स्वास्थ्य लक्ष्यों को हासिल करने में कई विकसित देशों और यहां तक कि श्रीलंका जैसे विकासशील देश से भी पीछे है। पिछले कुछ दशकों से जनस्वास्थ्य पर सरकारी ध्यान कम हुआ है जिसका परिणाम यह हुआ है कि जहां एक ओर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर होती चली गई हैं वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की ज्यादा हिस्सेदारी के चलते साधनविहीन लोग चिकित्सा सुविधाओं से वंचित होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 70 प्रतिशत विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को लागू हुए चार साल हो गए, लेकिन अभी तक एक लाख आबादी पर स्थापित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 50 से 60 प्रतिशत विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। स्वास्थ्य स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने 2011-12 में उम्मीद के विपरीत बजट प्रावधानों में कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं की। वर्तमान में सरकार लोगों के स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का 0.94 प्रतिशत ही खर्च करती है जो विश्व के अन्य देशों की तुलना में सबसे कम है। चीन, ब्राजील और श्रीलंका भारत से तीन गुना ज्यादा खर्च करते हैं। बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद भारत के मुकाबले लगभग आधा है, लेकिन बांग्लादेश में जीवन प्रत्याशा भारत की तुलना में छह साल अधिक है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत के नीति निर्माताओं की दृष्टि में मानव जीवन की कीमत बहुत कम है। बाल अधिकार संगठन सेव द चिल्ड्रन की एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि मां बनने के लिए सर्वोत्तम स्थान की सूची में शामिल 77 देशों में भारत का स्थान 73वां है। भारत सरकार स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसूति को प्रोत्साहित करती है, लेकिन यह देखने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है कि गर्भावस्था संबंधी पेचीदगियों से महिलाओं एवं उनके गर्भस्थ शिशु को बचाने के लिए ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में उन्हें पर्याप्त उपचार मुहैया कराया जा रहा है अथवा नहीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 74 हजार मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जिनमें 21 हजार ऑग्जिलरी नर्स मिडवाइफ्स (एएनएम) की कमी है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कमी देश के बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे में है। बाल मृत्यु के दुष्चक्र की भयावहता को कम करने के प्रयास सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। मृत शिशुओं के जन्म के आंकड़े हमारी नाकामी को बता रहे हैं। जहां इतने बड़े पैमाने पर बाघों का जीवन संकटग्रस्त हो, वहां ऐसी नीतियों को बनाने की आवश्कता है जिससे देश के नौनिहालों का जीवन सुरक्षित हो सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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