भूजल स्तर के गिरने के साथ पेयजल जहरीला भी होता जा रहा है। रसातल की ओर लौट रहे इस पानी में कई तरह के खतरनाक रसायनों और खनिज तत्वों के घुलने से पीने के साफ पानी का भी टोटा हो गया है। छोटी-बड़ी कई नदियों वाले उत्तर भारत में साफ पानी की भारी किल्लत है। लोगों के स्वास्थ्य पर अब इस दूषित पानी का असर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। ग्रामीण पेयजल आपूर्ति की हालत और भी खराब है। खासतौर से उत्तरी राज्यों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति का सिर्फ पांच फीसदी सरकारी योजनाओं पर निर्भर है। बाकी 95 फीसदी पेयजल के लिए लोग कुओं पर निर्भर हैं, लेकिन भूजल स्तर के नीचे खिसकने से ज्यादातर कुएं भी सूख गएहैं। उनकी जगह हैंडपंप और नलकूपों ने ले ली है। इन माध्यमों से निकल रहा पानी गुणवत्ता की दृष्टि से जहर से कम नहीं है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 85 फीसदी पेयजल का स्त्रोत भूजल है। इसके बावजूद ज्यादातर लोगों के लिए दूषित पेयजल पीना उनकी नियति बन गई है। सरकारी सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार भूजल में रासायनिक प्रदूषण के अलावा स्वास्थ्य के लिए घातक खनिज तत्व घुले हैं। भूजल में ये तत्व प्राकृतिक रूप से मिले हुए हैं। रासायनिक उर्वरक और सीवरेज से भूजल में नाइट्रेट घुल रहा है। पानी में इसकी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा प्राकृतिक रूप से घुली है। इसे पीने के लायक स्वच्छ बनाना बहुत सरल नहीं है। इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए बारिश के ज्यादा से ज्यादा पानी के संचयन की जरूरत है। सरकारी एजेंसियां भी मानती हैं कि खतरनाक तत्वों को पानी से अलग करने की कारगर तकनीक का देश में अभाव है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की 7067 बस्तियों के निवासी आर्सेनिक और 29070 बस्तियों के लोग फ्लोराइड युक्त भूजल पीने को मजबूर हैं। एक लाख से ज्यादा बस्तियों के लोग लौह तत्व घुले भूजल पर गुजारा कर रहे हैं। इन बस्तियों के लोगों के पास पेयजल का कोई और विकल्प नहीं है।
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