नींद कम हो या अधिक, दोनों ही स्थितियां नुकसानदायक हैं। इससे न केवल सेहत प्रभावित होती है बल्कि दिमाग पर भी असर होता है। अगर आप बहुत ज्यादा या बहुत कम सोते हैं तो आपका दिमाग बहुत जल्दी बूढ़ा हो जाता है। कहने का मतलब है कि नींद में गड़बड़ी आपके दिमाग को सात साल पहले बूढ़ा बना सकती है। ब्रिटेन में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि रोज छह से आठ घंटे से ज्यादा या कम सोने से मानसिक और शारीरिक रूप से नुकसान होता है और अंतत: इससे जल्दी मौत हो सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन मेडिकल स्कूल के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि अगर आप रोज सात घंटे सोते हैं तो आपका मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। कम सोने से आपकी तर्क शक्ति और शब्दकोष में कमी आती है। डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस अनुसंधान में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि इससे मानव मस्तिष्क चार से सात साल पहले बूढ़ा हो जाता है। नींद के पैटर्न पर किए गए अध्ययन के बारे में शोधकर्ताओं ने कहा कि प्रौढ़ावस्था के समय पांच सालों के दौरान होने वाले परिवर्तन मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। अध्ययन के दौरान पता चला कि नियत सीमा से ज्यादा लंबे समय तक नींद लेने वालों में सात से आठ फीसदी ने संज्ञानात्मक परीक्षा में बुरा प्रदर्शन किया मगर इसमें अल्पकालिक शाब्दिक याद्दाश्त अपवाद रही। वहीं, एक चौथाई महिलाओं और छह में से एक पुरुष, जो ठीक तरह से रात्रि निंद्रा नहीं ले सके थे, में तर्क शक्ति, शब्दज्ञान और संज्ञानात्मक परीक्षा में गिरावट देखी गई। मुख्य अध्ययनकर्ता जेन फेरी ने कहा कि हमारे अध्ययन में जो मुख्य परिणाम सामने आया वह था कि नींद के समय में परिवर्तन प्रौढ़ावस्था में मस्तिष्क के खराब कार्यप्रणाली से संबंधित था। उन्होंने कहा कि बहुत ज्यादा, बहुत कम या च्च्ची नींद के नुकसानदायक प्रभावों ने ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि हमारा 24/7 समाज तेजी से तमाम लोगों की जिंदगियों पर अतिक्रमण कर रहा है। ऐसे में इस बात पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है कि नींद के समय में परिवर्तन हमारे स्वास्थ्य और लंबे समय में सेहत पर क्या असर डाल सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि हर रात सात घंटे की आदर्श नींद का परिणाम प्रत्येक संज्ञानात्मक परीक्षा में उच्चतम अंकों के रूप में सामने आया। पुरुषों में, छह घंटे से कम या आठ घंटे से ज्यादा नींद लेने पर मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में बदलाव देखा जा सकता था। अध्ययन में पांच साल के दौरान 5,431 लोगों पर परीक्षण किया गया। इसमें 35 से 55 साल की आयु वाले लोग शामिल थे। यह अध्ययन स्लीप जर्नल के ताजे अंक में प्रकाशित किया गया है।
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