बोस्टन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिसमें रोगी की नाक की कोशिकाओं की जांच से फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती दौर में पहचान कर ली जाएगी। प्रारंभिक समय में फेफड़ों के कैंसर का पता चलना आसान नहीं होता क्योंकि मौजूदा परीक्षण काफी जटिल होते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक किसी व्यक्ति के नाक की अंदरुनी एपीथीलियल कोशिकाओं में वही आनुवांशिक संकेतक होते हैं जो फेफड़े के कैंसर के मरीजों में होते हैं। एक आसान सी तकनीक की मदद से नाक की अंदरूनी कोशिकाओं की जांच से चिकित्सक फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती अवस्था में पता लगा सकते हैं। उस समय इसका उपचार भी संभव होगा। फेफड़ों का कैंसर वास्तव में कैंसर का एक सामान्य प्रकार है। इससे ग्रस्त मरीजों में से केवल 15 फीसदी मरीज ही औसतन पांच साल जी पाते हैं। मरीज का इतने समय के लिए जीवित रहना इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर का पता किस अवस्था में चला। शोधकर्ताओं ने धूम्रपान करने वाले 33 लोगों के नाक के अंदरुनी हिस्से से एपीथीलियल कोशिकाओं के सैंपल को जमा किया। इन सभी की फेफड़ों का कैंसर होने की आशंका के चलते जांच की जा रही थी। इनमें से 22 को इस बीमारी से ग्रसित पाया गया। जबकि शेष में इस बीमारी का कोई लक्षण नहीं पाया गया। कोशिकाओं का विश्लेषण करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि कोशिकाओं में 170 अलग-अलग जीन थे, जिनकी गतिविधियों का स्तर अलग था और इस बात पर निर्भर था कि रोगी को फेफड़ों का कैंसर है या नहीं।
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