मलेरिया संक्रामक रोग है, जो प्लास्मोडियम प्रोटोजोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है। चार प्रकार के प्लास्मोडियम परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते हैं, जिनमें सबसे खतरनाक प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम और प्लास्मोडियम वाइवैक्स माने जाते हैं। इसके अलावा, प्लास्मोडियम ओवेल और प्लास्मोडियम मलेरिया भी हमें प्रभावित करते हैं। इन सभी समूह को ‘मलेरिया परजीवी’ कहते हैं। हर साल पूरी दुनिया में करोड़ों लोग मलेरिया से ग्रस्त होते हैं, जिसमें प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम व वाइवैक्स सबसे खतरनाक होते हैं। मलेरिया लाल रक्त कोशिकाओं (रेड ब्लड सेल्स) को प्रभावित करता है। मलेरिया होने पर तेज ठंड लगना, दर्द, बुखार या पसीना आना जैसे मुख्य लक्षण देखे जाते हैं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि जब से मानव जाति की शुरुआत हुई है, तभी से मलेरिया हमें प्रभावित करता आ रहा है। इसे सबसे प्रचलित संक्रामक रोगों में से एक माना जाता है। मलेरिया ट्रॉपिकल क्लाइमेंट्स, जहां गर्मी अधिक होती है जैसे एशिया, अफ्रीका, सेंट्रल और साउथ अमेरिका भारतीय प्रायद्वीप, साउथ पैसिफिक म अधिक होता है। इन देशों में ट्रैवल करने वाले यदि सावधानी न बरतें तो मलेरियाग्रस्त हो सकते हैं।
लक्षण-
मलेरियाग्रस्त लोगों में बुखार, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, मूत्र में खून और एनीमिया आम हैं। कई मरीजों में उल्टी, मिचली, कफ, डायरिया आदि भी देखे जाते हैं। सिवियर केसेज जैसे वाइवैक्स मलेरिया की अवस्था में यूरीन बनना बंद हो जाता है। सर्दी, बुखार और स्वेटिंग के साइकिल सभी इन्फेक्टेड लोगों में दो से तीन दिनों में रिपीट होते हैं। कभी-कभी रेड ब्लड सेल्स और लीवर सेल्स के नाश होने के कारण पीलिया हो जाता है और आंखें सफेद हो जाती हैं। शुरुआती लक्षण 3 से 5 दिन के अंतराल पर रुक-रुककर उभरता है। जो लोग पी. फैल्सीपैरम ग्रस्त होते हैं, उन्हें ब्लीडिंग प्रॉब्लम, शॉक, लीवर या किडनी फेलियर, सेंट्रल नर्वस सिस्टम प्रॉब्लम, लो हीमोग्लोबिन, दिमागी बुखार होने से बेहोसी, जॉन्डिस, कोमा या फिर मृत्यु भी हो सकती है। सीवियर होने पर यदि इसका इलाज समय रहते न किया जाए तो यह बेहद खतरनाक हो सकता है, यहां तक कि इलाज के बाद 15 से 20 प्रतिशत रोगी में मृत्यु का खतरा बना रहता है।
कैसे फैलता है-
मलेरिया पैरासाइट्स (प्लास्मोडियम) का जीवन चक्र (लाइफ साइकिल) काफी जटिल होता है, जिसमें मुख्य रूप से एनोफेल्स शामिल होते हैं। फीमेल इन्फेक्टेड एनोफेल्स मच्छर के काटने पर मलेरिया पै रासाइट्स (स्पोरोज्वॉइट्स) खून में पहुंच जाते हैं, जिससे लोग मलेरिया से पीड़ित हो जाते हैं। स्पोरोज्वॉइट्स ब्लडस्ट्रीम से होकर लीवर में जाता है और फिर परिपक्व होकर हमारे रेड ब्लड सेल्स को प्रभावित करता है। मलेरिया परजीवी का हमारे भीतर दो चरणों में विकास होता है, पहला यकृत और दूसरा रेड ब्लड सेल्स द्वारा। जब संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटते हैं, तो बीजाणु (स्पोरोजॉइट्स) हमारे खून में पहुंच कर लीवर पर असर करता है और शरीर में प्रवेश करने के 30 मिनट के भीतर ही लीवर की कोशिकाओं को संक्रमित कर देता है। इसके बाद लीवर में प्रजनन करने लगते हैं, यह चरण 6 से 15 दिन चलता है। इस प्रजनन से हजारों मेरोजॉइट्स बनते हैं, जो ब्लड सेल्स में पहुंचकर रेड ब्लड सेल्स को संक्रमित करने लगते हैं। संक्रमित मच्छर के काटने के 10-12 दिन के बाद ही व्यक्ति में मलेरिया के लक्षण दिखने लगते हैं।
इलाज
शुरुआती लक्षण में खून का टेस्ट और ओरल टैबलेट खाने को दी जाती है। सीवियर केसेज में आईसीयू या वेंटिलेशन पर रखते हैं, खून चढ़ाते हैं, नसों के जरिए दवाई दी जाती है। साथ ही शारीरिक जांच के दौरान बढ़े हुए लीवर की जांच भी की जाती है। मलेरिया इन्फेक्टेड ब्लड की बूंदें डायग्नोसिस कन्फर्म के लिए हर 6 से 12 घंटे के गैप में ली जाती हैं। जो मलेरिया के असर वाले देशों या क्षेत्रों में जाते हैं, उन्हें एंटी- मलेरियल ड्रग्स प्रेस्क्राइब्ड की जाती है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के अनुसार, साउथ अमेरिका, अफ्रीका, भारतीय प्रायद्वीप, एशिया, साउथ पैसिफिक जाने वाले यात्रियों को काफी सावधान रहना चाहिए। एक्टिव इंफेक्शन जैसे फैल्सिपैरम मलेरिया में अस्पताल में भर्ती होने की भी नौबत आती है।
रोकथाम
मलेरिया की रोकथाम को लेकर टीका यानी वैक्सीन पर अब भी शोध जारी है। इससे बचने के लिए एंटी-ड्रग्स काफी दिनों तक लेनी होती है। साफ-सफाई रखकर भी मलेरिया से बचा जा सकता है। रात में सोने से पहले मच्छरदानी लगाकर सोएं और मच्छर भगाने वाले मॉस्किटो रेपलेंट्स या मैट्स का प्रयोग करें। जिस जगह गंदा पानी जमा हो, वहां मच्छर ज्यादा अंडे देते हैं इसलिए कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें, पानी इकट्ठा न होने दें और कूलर का पानी हर सप्ताह बदलते रहें। पानी ढंक कर रखें। हो सके तो पूरे बदन के कपड़े पहनें, खासकर रात के समय।
लक्षण-
मलेरियाग्रस्त लोगों में बुखार, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, मूत्र में खून और एनीमिया आम हैं। कई मरीजों में उल्टी, मिचली, कफ, डायरिया आदि भी देखे जाते हैं। सिवियर केसेज जैसे वाइवैक्स मलेरिया की अवस्था में यूरीन बनना बंद हो जाता है। सर्दी, बुखार और स्वेटिंग के साइकिल सभी इन्फेक्टेड लोगों में दो से तीन दिनों में रिपीट होते हैं। कभी-कभी रेड ब्लड सेल्स और लीवर सेल्स के नाश होने के कारण पीलिया हो जाता है और आंखें सफेद हो जाती हैं। शुरुआती लक्षण 3 से 5 दिन के अंतराल पर रुक-रुककर उभरता है। जो लोग पी. फैल्सीपैरम ग्रस्त होते हैं, उन्हें ब्लीडिंग प्रॉब्लम, शॉक, लीवर या किडनी फेलियर, सेंट्रल नर्वस सिस्टम प्रॉब्लम, लो हीमोग्लोबिन, दिमागी बुखार होने से बेहोसी, जॉन्डिस, कोमा या फिर मृत्यु भी हो सकती है। सीवियर होने पर यदि इसका इलाज समय रहते न किया जाए तो यह बेहद खतरनाक हो सकता है, यहां तक कि इलाज के बाद 15 से 20 प्रतिशत रोगी में मृत्यु का खतरा बना रहता है।
कैसे फैलता है-
मलेरिया पैरासाइट्स (प्लास्मोडियम) का जीवन चक्र (लाइफ साइकिल) काफी जटिल होता है, जिसमें मुख्य रूप से एनोफेल्स शामिल होते हैं। फीमेल इन्फेक्टेड एनोफेल्स मच्छर के काटने पर मलेरिया पै रासाइट्स (स्पोरोज्वॉइट्स) खून में पहुंच जाते हैं, जिससे लोग मलेरिया से पीड़ित हो जाते हैं। स्पोरोज्वॉइट्स ब्लडस्ट्रीम से होकर लीवर में जाता है और फिर परिपक्व होकर हमारे रेड ब्लड सेल्स को प्रभावित करता है। मलेरिया परजीवी का हमारे भीतर दो चरणों में विकास होता है, पहला यकृत और दूसरा रेड ब्लड सेल्स द्वारा। जब संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटते हैं, तो बीजाणु (स्पोरोजॉइट्स) हमारे खून में पहुंच कर लीवर पर असर करता है और शरीर में प्रवेश करने के 30 मिनट के भीतर ही लीवर की कोशिकाओं को संक्रमित कर देता है। इसके बाद लीवर में प्रजनन करने लगते हैं, यह चरण 6 से 15 दिन चलता है। इस प्रजनन से हजारों मेरोजॉइट्स बनते हैं, जो ब्लड सेल्स में पहुंचकर रेड ब्लड सेल्स को संक्रमित करने लगते हैं। संक्रमित मच्छर के काटने के 10-12 दिन के बाद ही व्यक्ति में मलेरिया के लक्षण दिखने लगते हैं।
इलाज
शुरुआती लक्षण में खून का टेस्ट और ओरल टैबलेट खाने को दी जाती है। सीवियर केसेज में आईसीयू या वेंटिलेशन पर रखते हैं, खून चढ़ाते हैं, नसों के जरिए दवाई दी जाती है। साथ ही शारीरिक जांच के दौरान बढ़े हुए लीवर की जांच भी की जाती है। मलेरिया इन्फेक्टेड ब्लड की बूंदें डायग्नोसिस कन्फर्म के लिए हर 6 से 12 घंटे के गैप में ली जाती हैं। जो मलेरिया के असर वाले देशों या क्षेत्रों में जाते हैं, उन्हें एंटी- मलेरियल ड्रग्स प्रेस्क्राइब्ड की जाती है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के अनुसार, साउथ अमेरिका, अफ्रीका, भारतीय प्रायद्वीप, एशिया, साउथ पैसिफिक जाने वाले यात्रियों को काफी सावधान रहना चाहिए। एक्टिव इंफेक्शन जैसे फैल्सिपैरम मलेरिया में अस्पताल में भर्ती होने की भी नौबत आती है।
रोकथाम
मलेरिया की रोकथाम को लेकर टीका यानी वैक्सीन पर अब भी शोध जारी है। इससे बचने के लिए एंटी-ड्रग्स काफी दिनों तक लेनी होती है। साफ-सफाई रखकर भी मलेरिया से बचा जा सकता है। रात में सोने से पहले मच्छरदानी लगाकर सोएं और मच्छर भगाने वाले मॉस्किटो रेपलेंट्स या मैट्स का प्रयोग करें। जिस जगह गंदा पानी जमा हो, वहां मच्छर ज्यादा अंडे देते हैं इसलिए कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें, पानी इकट्ठा न होने दें और कूलर का पानी हर सप्ताह बदलते रहें। पानी ढंक कर रखें। हो सके तो पूरे बदन के कपड़े पहनें, खासकर रात के समय।
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