Friday, May 6, 2011

बिहार के खेत में उगाई कालाजार की दवा


कालाजार व मलेरिया बिहार के लिए अभिशाप हैं, लेकिन पूर्वी चंपारण के खेतों से उनके खिलाफ जंग की एक पहल हुई है। यहां के चकिया प्रखंड में इन बीमारियों से निजात दिलाने वाली दवाओं के निर्माण में प्रयुक्त पादप आर्टीमिसिया की खेती शुरू की गई है। इसमें मदद कर रही है फार्मास्यूटिकल कंपनी इपका। आर्टीमिसिया से प्राप्त आर्टीमीसिन नामक रसायन से कालाजार व मलेरिया की दवाएं बनती हैं। चकिया प्रखंड के किसान श्री व बारा गोविन्द गांव के किसान अजय कुमार देव औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। इपका फार्मास्यूटिकल ने एक करार के तहत उन्हें आर्टीमिसिया के बीज उपलब्ध कराये हैं। करार के मुताबिक कंपनी उत्पाद खरीद लेगी। अजय के लिए आर्टीमिसिया की खेती फायदेमंद साबित हो रही है। औषधीय पौधों की खेती से वे वर्तमान में तीन लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं। लेकिन समृद्धि की यह वर्तमान राह आरंभ में कठिन थी। कृषि विज्ञान केन्द्र, पीपराकोठी से प्रेरणा लेकर कुछ नया करने की हसरत पाले अजय ने सात साल पहले औषधीय पौधों की खेती का मन बनाया। वर्ष 2005 में उसने पहली बार एक-एक हेक्टेयर में लेमनग्रास व सीटूनेला की खेती शुरू की। तजुर्बे की कमी थी, सो घाटा हो गया। लेकिन उन्होंने दोगुने उत्साह से अगले साल फिर दो-दो हेक्टेयर में जापानी मेंथा व तुलसी की खेती की। इस क्रम में उन्हें औषधीय पादप संघ, पटना व जिला उद्यान कार्यालय से समुचित मार्गदर्शन मिला। फिर क्या था, इनके इरादों को पंख लग गए। उन्होंने औषधीय पौधों से तेल निकालने के लिए डिस्टीलेशन प्लांट लगवा लिया। इसके बाद से वे लगातार एलोवेरा व बच सहित कई औषधीय व सुगंधित पौधों की खेती कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने जिले में पहली बार एक हेक्टेयर में आर्टीमिसिया की खेती शुरू की है। अजय की सफलता से प्रेरित होकर उनके गांव के राकेश देव, चन्द्रशेखर देव, पंकज देव, मनोज देव, सुधीर सिंह, मंजय सिंह, राजेश्वर सिंह व उपेन्द्र सिंह सहित दर्जनभर अन्य किसान भी औषधीय पौधों की खेती कर बेहतर धनोपार्जन कर रहे हैं। अजय बताते हैं कि दो मुख्य फसलों के बीच की खाली अवधि में औषधीय पौधों की खेती बेहतर विकल्प है। जिला उद्यान पदाधिकारी जयराम पाल का कहना है कि इस खेती में फायदे की अंतहीन संभावनाएं हैं। इसे कोई मवेशी नहीं चरता। इसपर 20 फीसदी अनुदान भी मिलता है। औषधीय एवं सुगंधित पौधा उत्पादक संघ बिहार के सचिव कृष्णा प्रसाद ने भी कहा कि मांग को देखते हुए यह खेती फायदेमंद है। खेती के लिए सामान्य दोमट मिट्टी उपयुक्त : आर्टीमिसिया की खेती के लिए सामान्य दोमट मिट्टी उपयुक्त है। इसके बीज की बुआई नवंबर-दिसंबर माह में कर नर्सरी बनाई जाती है। जनवरी-फरवरी माह में पौधों की रोपाई होती है। एक एकड़ में आर्टीमिसिया की खेती के लिए 20 ग्राम बीज की जरूरत होती है। प्रति 10 ग्राम बीज की कीमत 500 रुपये है। एक एकड़ की खेती में 10 हजार खर्च आते हैं, जबकि फसल से आमदनी 26 हजार होती है। एक एकड़ में 8 से 10 क्विंटल आर्टीमिसिया पत्ते का उत्पादन होता है। यह मात्र 120 दिनों की फसल है, जिसमें चार सिंचाई व एक निकाई की जरूरत होती है।


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