Friday, September 28, 2012

पीपीपी से अस्पताल चलाने की तैयारी




कानपुर, जागरण संवाददाता : वाहनों की बढ़ती संख्या व बाजारों के व्यवसायीकरण के चलते लगने वाले जाम से निजात दिलाने के लिए नगर निगम मल्टी लेवल पार्किग बनाने की कवायद में है। साथ ही शहरवासियों को सस्ता इलाज दिलाने के लिए बंद तीन अस्पतालों को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत चलाने की तैयारी हो रही है। इनके समेत 19 प्रस्ताव 29 सितंबर को नगर निगम कार्यकारिणी की पहली बैठक में रखे जाएंगे। कार्यकारिणी की हरी झंडी मिलते ही इन्हें अमली जामा पहनाया जाएगा। नरोना चौराहा के पास स्थित पनचक्की चौराहे पर पूर्व में केडीए द्वारा विकसित टैक्सी पार्किग स्थल को मल्टी लेवल पार्किग में विकसित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसे बैठक में रखा जाएगा। इसके बनने से बिरहाना रोड, मालरोड, सागर मार्केट, राम नारायण बाजार व फूलबाग में जाम से निजात मिलेगी। वहीं चाचा नेहरू अस्पताल कोपरगंज, जागेश्वर अस्पताल गोविन्द नगर व डॉ बीएन भल्ला चिकित्सालय बाबूपुरवा को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) से चलाने का प्रस्ताव भी बैठक में रखा जाएगा। नगर निगम ने गृहकर में कोई बढ़ोत्तरी न करने का फैसला लिया है। गृहकर समय से जमा करने पर दस फीसदी की छूट नवंबर 2012 तक करने का प्रस्ताव भी रखा जाएगा। इसके अलावा कई सालों से नहीं बढ़े नामान्तरण व शमन शुल्क बढ़ाने की तैयारी है, ताकि आय बढ़ाकर विकास कराया जा सके। विरासत, वसीयत, हिबा व उत्तराधिकारी के आधार पर होने वाले नामांतरण में सौ वर्गमीटर से तीन सौ वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल के लिए प्रस्तावित शुल्क तय किया गया है। इसमें आवासीय में पांच सौ से तीन हजार रुपये, मिश्रित में साढ़े सात सौ रुपये से चार हजार रुपये व अनावासीय में एक हजार रुपये से पांच हजार रुपये शुल्क रखा गया है। बैठक में जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन में सीवरेज व पाइप योजना के तहत हुए विकास कार्यो के होने वाले भुगतान के प्रस्ताव पर भी चर्चा होगी।

Dainik Jagran National Edition 27-9-2012  Health

जन-स्वास्थ्य पर संजीदगी दिखाती सरकार






हमारे देश में जन-स्वास्थ्य का मसला हमेशा से सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां तक कि सरकारों के विकास के एजेंडे में कभी जन- स्वास्थ्य अहमियत का विषय नहीं रहा। कहीं भी, कोई भी सरकार हो, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मद में वह नहीं के बराबर खर्च करती है। हालत यह है कि वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारें दोनों मिलकर स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 12 फीसद ही खर्च करती हैं। यही वजह है कि देश में जन-स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि देखें, तो जन-स्वास्थ्य की स्थिति को सुधारने के लिए यूपीए सरकार ने हाल ही में जो दो फैसले किए हैं, उनका स्वागत किया जाना चाहिए। सरकार ने पहले फैसले के तहत 12 वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक, स्वास्थ्य पर जीडीपी के 1.2 फीसद खर्च को बढ़ाकर 2.5 फीसद तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। दूसरा फैसला यह है कि सरकार जल्द ही सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र- प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज तक पर आने वाले सभी रोगियों को मुफ्त जेनेरिक दवाएं मुहैया कराएगी। जाहिर है, सरकार के ये दोनों ही फैसले आने वाले दिनों में जन- स्वास्थ्य की व्यवस्था को सुधारने की दिशा में क्रांतिकारी कदम साबित होंगे। देश के सभी सरकारी अस्पतालों से नागरिकों को मुफ्त दवाएं मिलें, यह पुरानी मांग रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य पर आज से तकरीबन 70 साल पहले आई जोसेफ भोरे कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि जन- स्वास्थ्य राज्य की जिम्मेदारी है। भुगतान करने की क्षमता न होने पर भी किसी को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित नहीं किया जा सकता। यह बेहद अफसोसनाक है कि तब से लेकर अब तक केंद्र में कई सरकारें आई और चली गई, मगर किसी ने भी जन-स्वास्थ्य को राज्य की जिम्मेदारी नहीं समझा। सरकार के सामने जब भी यह मुद्दा उठा, बजट का रोना रोकर इसे कारपेट के नीचे दबा दिया गया। जनता की इस न्यायसंगत मांग को पूरा करने में बजट हमेशा आड़े आता रहा। बजट के अभाव में यह योजना ठंडे बस्ते में पड़ी रही। यही वजह है कि सरकार ने जब लोगों की सेहत से संजीदा सरोकार दिखाने का फैसला किया, तो सबसे पहले उसने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को दो हजार करोड़ रुपये सालाना देने की व्यवस्था की, ताकि इस राशि से राज्यों की मदद की जा सके। यानी जन-स्वास्थ्य के मुद्दे पर केंद्र, राज्यों की कोशिश में पूरक की भूमिका निभाएगा। सबको मुफ्त दवा देने की महत्वाकांक्षी योजना राजस्थान और तमिलनाडु में पहले से ही सफलतापूर्वक चल रही है। बहरहाल, अब यह योजना पूरे देश में एक साथ लागू हो, इससे पहले ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर दिए हैं कि राज्य अपने यहां जेनेरिक दवाओं की फेहरिस्त तैयार करने के साथ- साथ मानक उपचार दिशा-निर्देश और खरीद की पण्राली तैयार करें। मंत्रालय का मानना है कि दवाएं केंद्रीय स्तर पर खरीदी जानी चाहिए और उनका भंडार भी करके रखा जाना चाहिए, जिससे ऐसी दवाओं की लागत उल्लेखनीय रूप से कम करने में मदद मिले। गौरतलब है कि राजस्थान में इस कदम के उठाने से दवाओं की कीमत में 70 फीसद तक की कमी आ गई। इस परियोजना की सफलता के लिए केंद्र जेनेरिक दवाओं के उपयोग प्रेस्क्रिप्शन पर भी जोर दे रहा है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि शिकायत निपटान पण्राली विकसित करने के अलावा दवाओं की उचित परीक्षण पण्राली के जरिए इनकी गुणवत्ता बरकरार रखी जा सके। सरकारी अस्पतालों में हालांकि बीपीएल परिवारों के लिए मुफ्त दवा की व्यवस्था पहले से ही थी। सरकार, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर हर व्यक्ति को मुफ्त चिकित्सा सुविधा मुहैया कराती है। बावजूद इसके दवाओं की मात्रा, गुणवत्ता और उपलब्धता सवालों के घेरे में रही है। स्वास्थ्य महकमे में संजीदगी का अभाव, भ्रष्टाचार और प्रबंधन की बदहाली रही-सही कसर पूरी कर देते हैं। सरकारी मेडिकल स्टोरों में जब मरीज दवा लेने के लिए जाता है, तो अधिकांश मौकों पर उपलब्ध नहींके नोट के साथ उसे पर्ची वापस कर दी जाती है। यही नहीं, सरकारी मेडिकल स्टोर की दवाओं के खुलेआम निजी मेडिकल दुकानों पर बिकने के किस्से भी आम हैं। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना में जो घोटाला हुआ, वह सबके सामने है। कुल मिलाकर, सरकार ने अपने नागरिकों को मुफ्त दवा देने का जो फैसला किया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह योजना सारे देश के अंदर सही तरह से अमल में आए, इसके लिए सरकार को कुछ और कदम उठाने होंगे। सरकार को पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने पर जोर देना होगा। जनसंख्या के मुताबिक वहां डॉक्टरों और नसरे की तादाद बढ़ानी होगी। राजस्थान, जहां यह योजना सबसे पहले लागू हुई, वहां एक साल के अंदर सरकारी अस्पताल जाने वालों की संख्या में कहीं-कहीं सौ फीसद की बढ़ोतरी देखी गई। मरीजों की तादाद बढ़ी तो राजस्थान सरकार ने राज्य में उसी रफ्तार से ढांचागत सुधार भी किए। जरूरतों को ध्यान में रखकर सरकार ने राज्य में 15 हजार मेडिकल स्टोर खोले। यही नहीं, इस काम के लिए उसने निजी कंपनियों से भी मदद ली। जाहिर है कि योजना को सारे देश में लागू करने से पहले केंद्र सरकार, तमिलनाडु और राजस्थान के इन अनुभवों से कुछ मदद ले सकती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े डॉक्टरों को जेनेरिक दवाओं को प्राथमिकता देने का निर्देश जारी करने और मुफ्त वितरित की जाने वाली दवाओं पर लगातार निगरानी रखने की भी जरूरत है। क्योंकि, ढांचागत और नियामक सेवाएं यदि चुस्त-दुरुस्त नहीं रहीं, तो दवाओं की कालाबाजारी का पुराना डर जस का तस बना रहेगा। अगर यह सब कुछ अच्छी तरह से हुआ, तो योजना की कामयाबी भी निश्चित है।


राष्ट्रीय  सहारा  दिल्ली संस्करण पेज 10, 26-9-2012 स्वास्थ्य