ठ्ठ डॉ. एनके अरोड़ा एक डॉक्टर या एक सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवर
के रूप में हमसे अक्सर सवाल पूछे जाते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधी वाद-विवाद केवल डॉक्टरों या एमबीबीएस, एमडी, एमएस या एमपीएच की डिग्री प्राप्त
पेशेवरों तक ही क्यों सीमित हैं?
क्या स्वास्थ्य का दायरा अन्य विशेषज्ञों से संबंधित
नहीं है? यहां मैं फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लिमेंस्यु का
एक कथन याद दिलाना
चाहूंगा। उन्होंने एक बार कहा था, युद्ध इतने
महत्वपूर्ण हैं कि इन्हें
केवल जनरलों तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता। इसी तरह सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे केवल डॉक्टरों, मेडिकल प्रेक्टिशनरों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक ही सीमित नहीं रखे जा सकते। इनका
संबंध सीधे आमजन से है और
दायरा असीमित है। एक बीमारी
को नियंत्रित करना बहुत मुश्किल काम है। हालांकि रोगी कुछ गोलियां खाकर बेहतर महसूस कर सकता है। रोगी का ठीक होना
बीमारी के खिलाफ लगातार
संघर्ष का ही परिणाम होता है, लेकिन जरा सोचिए
कि ऐसी स्थिति ही क्यों
बनने दी जाए कि हमें उपचार की जरूरत पड़े। क्या हम इसकी रोकथाम की दिशा में कुछ कदम नहीं उठा सकते? आज दुनिया के अधिकांश लोग टीकाकरण (वैक्सीनेशन) के महत्व को
समझते और जानते हैं। टीकाकरण
किसी भी बीमारी से संघर्ष में मानवजाति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। चेचक का उन्मूलन और पोलियो को हरा देना
वैक्सीन के बिना संभव नहीं
था। वैक्सीनों ने निश्चित रूप से भारत में और दुनिया भर में उन लोगों या स्थानों को प्रभावित किया है,
जो रोगों के जोखिम पर रहें हैं। वास्तव में, वैक्सीनें किसी
रोग से लड़ने का सबसे प्रभावी और किफायती तरीका है। टीकाकरण विज्ञान की सबसे बड़ी जीतों में से एक है, जिसने अरबों लोगों की जिंदगियां बचाई हैं। आज, जब सार्वजनिक
नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर फोकस किया जा रहा है, वैक्सीनों पर
चर्चा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण बन गया है, क्योंकि किसी भी
बीमारी की रोकथाम की तुलना में उपचार अधिक खतरनाक और अप्रत्याशित होता है। अपने देश से ही एक दुर्भाग्यशाली उदाहरण
लेते हैं। यदि एक रोगी
निमोनिया से पीडि़त है, जो पांच साल से कम उम्र के बच्चों
में मृत्यु का प्रमुख
कारण है, तो ऐसे में इस मामले का सफलतापूर्वक प्रबंधन करना बेहद जरूरी हो जाता है। दुर्भाग्य कि
ऐसे अधिकांश मामले बाल रोग विशेषज्ञ के नियंत्रण में नहीं होते। क्या मां-बच्चे को सही समय पर डॉक्टर के पास लेकर जाएगी? क्या बाल रोग विशेषज्ञ समस्या का निदान ठीक प्रकार से कर पाएंगे? यदि ऐसा है, तो क्या रोगी सही उपचार वक्त रहते
शुरू कर देगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर विचार करने की जरूरत ही न पड़े,
यदि निमोनिया की पहले ही रोकथाम कर ली जाए। साक्ष्य होने के बावजूद आज भी एक
ऐसा वर्ग है जो टीकाकरण पर पूरी
तरह भरोसा नहीं करता। इसलिए ऐसे लोगों को जागरूक करने की जरूरत है, जो दावा करते हैं
कि विज्ञान ऐसे मामलों में लोगों को गुमराह कर रहा है। इस आंदोलन का इतिहास क्या है? यह भारत में बहुत छोटा है। प्रतिरक्षीकरण पर विस्तृत प्रोग्राम के तहत भारत में पहली छह वैक्सीनों का शुरू किया जाना समस्याजनक नहीं था।
1980 के दशक में जब मीजल्स या खसरे की वैक्सीन पर
चर्चाएं शुरू हुईं तब कई अफवाहें फैलने लगीं। खसरे की वैक्सीन के तरफदारों ने इन वैक्सीनों का पक्ष लिया। इनमें से कुछ भारत के सर्वश्रेष्ठ
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों में से थे। उन्होंने कहा कि समाज के उन लोगों पर इन वैक्सीनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है, जिन्होंने इनका उपयोग किया है। ऐसे में उन्हें अपमानित किया गया, उन्हें चुनौती दी गई कि उन्हें भारत में खसरे की समस्या के बारे में ऐसे साक्ष्यों को प्रस्तुत करना होगा। आज यह विवाद शांत हो गया है। हम जानते हैं
कि खसरे की वैक्सीन प्रभावी है, अरबों बच्चों की
जिंदगियां इसकी मदद से बचाई गई हैं और आने वाले समय में जरूर भारत से खसरे का विनाश कर दिया जाएगा। दुख की बात तो यह
है कि आज भी कुछ स्थानों पर
यह तर्क दिया जाता है कि क्या वास्तव में वैक्सीन जरूरी थी। वैक्सीनों की अनुपस्थिति के कई प्रभाव होते हैं, जिन पर अक्सर हम विचार नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, अक्सर एक विशेष कारक के परे रोग पर प्रभाव पड़ता है, जिसके लिए
वैक्सीनेशन किया जा चुका है। खसरे के संक्रमण के बाद छह सप्ताहों में, बच्चे में
रक्त पेचिश होने की संभावना 4-6 गुना बढ़ जाती है। इससे बच्चों की जान जा सकती है। हालांकि
वैक्सीन इंसान की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर होने से बचाती है। इस
प्रकार से रक्त पेचिश की संभावना को कम करती है। तीस साल
पहले यानी आठ के दशक की शुरुआत में जब दिल्ली के केवल दक्षिणी हिस्से फरीदाबाद (हरियाणा) में गरीब समुदाय
में ओआस प्रोग्राम की शुरुआत की गई, इन क्षेत्रों में दौरा करने वाले
विशेषज्ञों की टीम ने देखा कि यहां पर बच्चों में रक्त डायरिया का जबरदस्त प्रकोप है। यह एक प्रकार के जीवाणु शिगेला के कारण था। बाद में इसके लिए खसरे
के टीकाकरण के बुरे कवरेज को जिम्मेदार ठहराया गया। इसके बाद खसरे का प्रतिरक्षीकरण अभियान शुरू किया गया- जल्दी ही पर्याप्त, देखने योग्य परिणाम सामने आए। ऐसे बहुत से अन्य उदाहरण हैं। सभी संक्रमणों के कारण बच्चों
में कुपोषण हो जाता है। बच्चे
ठीक से खाना नहीं खा पाते हैं। अभिभावक को बेहतर उपचार और पोषक भोजन में से एक को चुनना होता है, क्योंकि उनके लिए दोनों जरूरतें पूरी कर पाना संभव नहीं होता। कारण जो भी हो, मुख्य बात यह है कि पोषण पर प्रभाव पड़ता है, और यह
भारत के गरीब वर्ग के लोगों में बहुत आम है। यदि हम आम बीमारियों की पूरी तरह से रोकथाम कर लेते हैं, तो क्या एक बड़ा परिवर्तन लाने में कामयाबी नहीं मिलेगी? हमें इस विचारधारा को बदलना होगा कि वैक्सीन केवल मौत से बचाती है। यह निश्चित रूप से सच है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इससे रोगों की दर में पर्याप्त रूप से कमी आती है
और रोग की गंभीरता भी कम हो जाती है। ऐसे मामलों में रोगी को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत भी कम
हो जाती है। एक स्वस्थ बचपन सुनिश्चित करता है भविष्य का
वयस्क अपंग नहीं होगा। स्वस्थ वयस्क समाज की समृद्धि में अधिक योगदान दे सकेंगे। प्रतिरक्षीकरण इस
यात्रा को बढ़ावा देता है।
हालांकि, इस विकास के लिए कोई अपरिहार्यता नहीं है। आपके पास विकल्प हैं। आप इसमें मदद कर सकते
हैं या इसमें बाधा डाल सकते हैं। आप इसमें निवेश कर सकते हैं या निवेश का विरोध भी कर सकते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को इस दिशा में
सशक्त बनाने के प्रयास किए जा सकते हैं। वैक्सीनों को अपनाया जा सकता है। आज भारत ऐसे दोराहे पर खड़ा है,
जहां इसे एक बार यह महत्वपूर्ण निर्णय लेना है। जहां तक
दुनिया पर वैक्सीनों का
प्रभाव देखा जा सकता है, हमें
बुद्धिमतापूर्ण फैसला लेना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण पेज -9,21
-9-2012 स्वास्थ्य
No comments:
Post a Comment