सुभाष गाताडे भारत की जेनेरिक दवाओं की निर्माता कंपनियों और जरूरतमंद
मरीजों को पिछले दिनों
इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी एपेलेट बोर्ड ने राहत प्रदान की, जब उसने दवा बनाने
वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर की एक याचिका खारिज कर दी। दरअसल, कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स ने हैदराबाद स्थित नेटको लिमिटेड को
(जेनेरिक दवाओं की निर्माता)
लीवर एवं किडनी कैंसर की दवा बनाने के लिए लाइसेंस प्रदान किया था, जिसके खिलाफ बायर
ने बोर्ड में अपील की थी। यह मार्च महीने की बात है, जब मंुबई के
कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स ने नेटको को सोरोफेनबिब टासिलेट (बायर द्वारा बनाई जाने वाली कैंसररोधी दवा नेक्सावार का जेनेरिक संस्करण) के निर्माण का कंपलसरी
लाइसेंस दिया था। भारत में सचेत यानी कंपलसरी लाइसेंस प्रदान करने का यह पहला मामला था, क्योंकि भारत के पेटेंट कानूनों के तहत याचिकाकर्ता को ऐसा लाइसेंस प्रदान किया जा सकता है,
अगर यह पता चले कि उपरोक्त दवा सस्ते दामों पर बाजार में
उपलब्ध नहीं है। वर्ष 2008
में बायर ने इस दवा के लिए भारत में पेटेंट लिया,
जिसकी 120 टैबलेट की खुराक 2.8
लाख रुपये की है, जो एक माह में प्रयुक्त होती है। कंट्रोलर ऑफ पेटेंट ने नेटको को निर्देश दिया कि वह 8,800
रुपये में एक माह की खुराक बेचे और अपनी बिक्री से छह फीसद रॉयल्टी बायर को दे।
न्यायमूर्ति प्रभा श्रीदेवन
और सदस्य डीपीएस परमार की अगुआई में बोर्ड ने फैसला दिया कि अगर हमने नेटको के निर्माण पर स्थगनादेश दिया तो यह आम
लोगों के हितों पर प्रतिकूल असर
डालेगा, जिन्हें इस दवा की सख्त जरूरत है। नेटको को कंपलसरी लाइसेंस मिलने की इस घटना
की प्रतिक्रिया वैश्विक स्तर पर महसूस की गई, एक हिस्से का कहना था कि इससे
जेनेरिक उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा कि वह बेहद सस्ते दामों पर दवा उपलब्ध करा दे। वहीं कॉरपोरेट दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों की दलील थी कि
इससे नई-नई दवाओं के आविष्कार पर असर पड़ेगा। भारत बनता
अखाड़ा चाहे बायर का यह
ताजा मामला हो या पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा स्थानीय दवा निर्माता सिपला के हक में सुनाया गया अपना फैसला
हो, जिसके तहत स्विट्जरलैंड की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी रोशे ने सिपला
द्वारा बनाई जा रही कैंसररोधी
दवा एरलोसिप के खिलाफ पेटेंट उल्लंघन का मामला दायर किया था या सुप्रीम कोर्ट के सामने एक अन्य स्विस दवा निर्माता
नोवार्टिस द्वारा उसकी
कैंसररोधी दवा ग्लिवेक को लेकर डाली गई याचिका पर जारी अपनी अंतिम सुनवाई हो, हम यही देख रहे हैं कि आज की तारीख में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां एक तरह से भारत की सरजमीं पर आरपार
की लड़ाई में लगी हैं। तथ्य बताते हैं कि आज की तारीख में भारत की जेनेरिक दवाएं दुनिया भर में सबसे सस्ती कही जाती हैं, क्योंकि भारत ने दवाओं पर पेटेंट देना 2005 तक शुरू नहीं किया, जब तक उस पर
विश्व व्यापार संगठन की तरफ से दबाव नहीं पड़ा। यह अकारण नहीं कि एचआइवी और एड्स जैसी बीमारियों में
प्रयुक्त तमाम दवाएं भारत आज
बनाता है और दुनिया भर में निर्मित जेनेरिक दवाओं का पांचवां
हिस्सा यहीं तैयार होता है। इन दवाओं का आधे
से अधिक हिस्सा विकासशील मुल्कों को भेजा जाता है। यों तो शेष दुनिया में भारत की छवि उसके उदितमान टेक्नोलॉजी सेक्टर से बनी हुई है, मगर उस छवि का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वह फिलवक्त दुनिया भर के लिए कम कीमत पर चलने वाली फार्मेसी भी है।
यह अकारण नहीं कि यूनिसेफ द्वारा दुनिया भर में वितरित की जाने वाली दवाओं का दूसरे नंबर का आपूर्तिकर्ता भारत ही है। नोवार्टिस के मामले में सुप्रीम
कोर्ट से विपरीत फैसला आया तो फिर कम कीमत पर चलने वाली फार्मेसी की भारत की छवि इतिहास की किताबों में दर्ज हो जाएगी। देश-विदेश के अखबारों में भी
नोवार्टिस से जुड़े इस मामले की चर्चा है। अदालत का संभावित फैसला भारतीय दवा बाजार के लिए भी नजीर
बनने की गुंजाइश है,
जहां तमाम प्रमुख पश्चिमी कंपनियां अपनी बौद्धिक संपदा
की रक्षा के लिए
बेचैन हैं। इस बात के भी अनुमान लगाए जा रहे हैं कि यह फैसला
देश के ही नहीं, दुनिया के तमाम गरीब मरीजों के लिए मौत का परवाना साबित हो सकता है। अगर इस मामले में अपीलकर्ता यानी
नोवार्टिस की जीत हुई तो करोड़ों मरीजों के लिए सस्ती दवाएं सपना बनकर रह जाएंगी और बिना इन जीवन रक्षक दवाओं के उनके लिए जिंदगी और कठिन हो
जाएगी। याद रहे कि आला अदालत को भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3 (डी) पर
अपनी राय देनी है। उनकी जंग,
हमारा नुकसान आखिर क्या है धारा 3 (डी),
जिसे लेकर नोवार्टिस ही नहीं, बल्कि दवाओं के धंधे में लगी अन्य तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां परेशान हैं? दरअसल, यह धारा किसी ऐसी चीज का पेटेंट देने से रोकती है,
जिसे पहली किसी चीज में मामूली सुधार करके पेश किया गया हो। इसी आधार पर बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के अलग-अलग पेटेंट के
दावे भारतीय पेटेंट ऑफिस ने खारिज किए हैं। कल्पना करें कि टीबी के लिए प्रयुक्त चर्चित दवा में मामूली
हेरफेर करके उसे बाजार में उतारा गया और उसका पेटेंट लिया गया और नए पेटेंट के नाम पर उसकी कीमत में
जबरदस्त बढ़ोतरी की जाए
तो अंतत: नुकसान किसका होगा? जाहिर है,
आम मरीज का ही। मालूम हो कि दवाओं के धंधे में खरबों रुपये का मुनाफा है और
यह मुनाफा लागत से कई गुना
ज्यादा होता है। इस वजह से होता यही है कि बड़ी बड़ी कंपनियां अपने पहले से आ रहे किसी उत्पाद में थोड़ा
सुधार करके उसे बाजार में पेश करती हैं। चूंकि पश्चिमी देशों में ऐसे पेटेंट मिलते हैं, इस वजह से अन्य कोई कंपनी अगर उसी किस्म का उत्पाद बनाए तो बड़ी कंपनी उसे रोक सकती है या विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक संपदा
अधिकारों के संबंध में जो नियम कानून बने हैं, उसके तहत कार्रवाई कर सकती है। यह मामला शुरू हुआ था नोवार्टिस द्वारा
निर्मित दवा ग्लिवेक के बाद, जो एक विरल किस्म के कैंसर एवं पेट में होने वाले
ट्यूमर के लिए अचूक बताई जाती है। वर्ष 2003 में नोवार्टिस को इस दवा की
मार्केटिंग के अधिकार पांच साल तक के लिए मिले, जिसके आधार पर
उसने सिप्ला, रैनबैक्सी और सन फार्मा जैसी कंपनियों को इसकी मार्केटिंग करने से रोका,
जब यह दवा जनवरी 2005 में बाजार में लाई
गई। चूंकि अब इस दवा पर नोवार्टिस का ही एकाधिकार था, इसके चलते दवा की
कीमत एक माह की जरूरत के लिए 10 हजार रुपये से
अचानक लाख रुपये तक पहुंच गई।
भारतीय कंपनियों ने इसी के बाद अदालत की शरण ली और बताया कि ग्लिवेक दरअसल एक पुरानी दवा का ही सुधरा संस्करण है, जो पेटेंट अधिनियम की नवीनता वाले प्रावधान पर खरा नहीं उतरता। जनवरी 2006 में चेन्नई के पेटेंट ऑफिस ने नोवार्टिस के इस पेटेंट आवेदन को इसी बुनियाद पर
खारिज किया और कहा कि यह जानी
हुई दवा का ही नया रूप है। नोवार्टिस ने इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट में अपील की। वहां पर भी उसकी अपील दो बार खारिज हुई। अंतत: उसने सुप्रीम कोर्ट
में फरियाद की। इस मसले पर बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनियों एवं भारत में ताजा तनाव इस वजह से भी बना है,
क्योंकि मार्च महीने में ही भारत के पेटेंट ऑफिस ने
जर्मनी की बहुराष्ट्रीय दवा
कंपनी बायर एजी को एक अन्य कैंसर दवा बेचने के एकमात्र अधिकारों को खारिज किया। पेटेंट ऑफिस का तर्क यह था कि
नेक्सावार बहुत महंगी दवा है और
अधिकतर भारतीय उसे खरीद नहीं सकते। इस मसले पर लंदन से प्रकाशित फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने लिखा था कि
नोवार्टिस की जीत गरीबों के
लिए सजा-ए-मौत बनकर आएगी। उसके मुताबिक भारत में स्वास्थ्य पर कार्यरत कार्यकर्ताओं ने इस बात की चेतावनी दी
है कि नोवार्टिस की जीत
गरीबों एवं विकासशील मुल्कों के बीमारों के लिए मौत का परवाना बनकर आएगी। उसके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन
यह केस इस बात को निर्धारित
करेगा कि कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के लिए उपलब्ध जेनेरिक दवाएं विकासशील मुल्कों में उपलब्ध रह सकेंगी या
नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
1.
दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण, पेज 9 , 25-09-2012
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