Wednesday, March 30, 2011
अब मधुमेह के मरीजों के लिए भी 'पेसमेकर'
माचिस की डिब्बी के आकार का यह यंत्र त्वचा के नीचे और उदर के ऊपर प्रतिरोपित किया जाता है यह उपकरण उदर की मांसपेशियों में उत्तेजना पैदा करता है। इससे शरीर अधिक मात्रा में इंसुलिन स्रवित करता है
वैज्ञानिकों ने 'पेसमेकर' जैसा एक यंत्र बनाया है जो पेट में बिजली के हल्के कंपन देकर 'टाइप-2' मधुमेह के रोगियों के इलाज में मदद करेगा। इस तरह के विद्युत कंपन में किसी तरह का दर्द भी नहीं होगा। 'डेली मेल' की खबर के अनुसार माचिस की डिब्बी के आकार का यह यंत्र त्वचा के नीचे और उदर के ऊपर प्रतिरोपित किया जाता है। खाते समय यह पेट की मांसपेशियों में उत्तेजना पैदा करेगा जिससे शरीर अधिक मात्रा में इंसुलिन जारी करेगा। गौरतलब है कि इंसुलिन ही शरीर में चीनी की मात्रा को नियंत्रित करने का काम करता है और इसी की कमी से मधुमेह की बीमारी होती है। इस उपकरण को लेकर डायमंड (डायबिटीज इमप्रूवमेंट एंड मेटाबॉलिक नॉर्मलाइजेशन डिवाइस) नाम दिया गया है। इस उपकरण लेकर अब तक हुए अध्ययन और परीक्षण में पाया गया कि इससे डायबिटीज-2 के ज्यादा वजन वाले मरीजों में लंबे समय तक रक्त शर्करा नियंतण्रमें रही। यंत्र को 'मेटाक्योर' नाम की स्वास्थ्य यंत्र बनाने वाली कंपनी ने बनाया है। इस यंत्र की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जब मरीज खाना खा रहा होता है तो इसे इस बात का अपने आप पता चल जाता है और इसी समय वह बिना कोई दर्द पैदा किए उदर की मांसपेशियों में वैद्युत कंपन शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में मस्तिष्क को ऐसा अहसास होता है कि जितना भोजन व्यक्ति ने वास्तव में खाया है, उससे ज्यादा पेट में पहुंच चुका है। ऐसे में मरीज को पेट भरे होने की अनुभूति होती है। इस डिवाइस को रिमोट कंट्रोल से भी संचालित किया जा सकता है जिसके कारण कुछ-कुछ समय बाद डॉक्टर विद्युत तरंगों को रोगी की जरूरत के अनुसार बढ़ा और घटा सकते हैं। रोगी अपने पेट के ऊपर एक चार्जर को 45 मिनटों के लिए रख कर इस यंत्र को एक हफ्ते के लिए चार्ज भी कर सकते हैं। वियना (आस्ट्रिया) की मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुए एक परीक्षण में तीन महीने के भीतर टाइप 2 मधुमेह के मरीजों की रक्त शर्करा में एक चौथाई से भी ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। इससे न सिर्फ रक्त शर्करा के स्तर में गिरावट आई बल्कि एक साल के भीतर पांच किलो वजन भी घट गया। यूरोप और अमेरिका में इस उपकरण को लेकर बड़े स्तर पर परीक्षण चल रहे हैं। इस समय 200 लोगों में इस उपकरण को प्रतिरोपित किया गया है। भविष्य में मधुमेह के इलाज में इसे बेहद कारगर तरीका माना जा रहा है।
बच्चों में धूम्रपान के खतरे
स्वस्थ एवं समृद्ध समाज के निर्माण के लिए बच्चों का पारिवारिक और मानसिक रूप से मजबूत होना बेहद जरूरी होता है। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि समाज एवं राष्ट्र मिलजुल कर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उचित एवं अनुकूल वातावरण का निर्माण करें। अगर बच्चे स्वस्थ नहीं रहेंगे तो एक स्वस्थ व समृद्ध समाज के निर्माण की कल्पना मुश्किल है। सबसे गम्भीर चिंता का विषय है कि बच्चों में धूम्रपान की लत लगातार बढ़ती ही जा रही है। साथ ही सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव में आने से उनका स्वास्थ्य भी दांव पर लगता जा रहा है। यह ठीक है कि सरकार एवं स्वयंसेवी संस्थाएं सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव को कम करने एवं उस पर नियंतण्रलगाने के उद्देश्य से अनेक कार्यक्रम एवं प्रभावोत्पादक तरीके अपना रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर नतीजे बिल्कुल ही संतोषजनक नहीं हैं। सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने वाले लोगों के खिलाफ कड़े कानून और अर्थदंड का प्रावधान किया गया है लेकिन इसके बावजूद सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान की प्रवृत्ति पर लगाम लगता नहीं दिख रहा है। नतीजा सबके सामने है। अब बच्चे भी धूम्रपान की ओर आकर्षित होने लगे हैं। आंकड़ों पर विश्वास किया जाए तो धूम्रपान विरोधी चलाए जा रहे अभियान के बावजूद भी बच्चों में धूम्रपान की लत बढ़ती ही जा रही है। देखा जाए तो बच्चों में धूम्रपान के प्रति बढ़ते आकर्षण की कई मुख्य वजहें हैं। मसलन पड़ोस का बिगड़ा वातावरण, फिल्मों के धूम्रपान वाले दृश्य, परिवार द्वारा बच्चों पर कम ध्यान दिया जाना, बुरी संगत का असर और स्कूलों में नैतिक शिक्षा का कमजोर पड़ता उद्देश्य इत्यादि लेकिन पिछले दिनों आई स्वीडिश नेशनल हेल्थ एण्ड वेल्फेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपिज की एक रिसर्च से साबित हुआ है कि बच्चों में धूम्रपान की लत पड़ने की एक और वजह उनका सेकेंड हैंड स्मोकिंग के प्रभाव में आना भी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सेकेंड हैंड स्मोकिंग के प्रभाव में आने से बच्चे धीरे-धीरे धूम्रपान के लती हो जाते हैं। धूम्रपान से होने वाले लाइलाज खतरों को छोड़ भी दिया जाए तो सिर्फ सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव से आज छ: लाख से अधिक लोग असामयिक मौत के शिकार हो रहे हैं। इन मरने वाले लोगों में तकरीबन दो लाख से अधिक बच्चे ही होते हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल 'लैंसेट' में छपी एक रिपोर्ट पर विश्वास किया जाय तो स्मोकिंग न करने वाले 40 फीसद बच्चों और 30 फीसद से अधिक महिलाओं-पुरुषों पर सेकेंड हैंड स्मोकिंग का घातक प्रभाव पड़ता है। अप्रत्यक्ष धूम्रपान के कारण बच्चों में गम्भीर बीमारियां होती हैं; मसलन अस्थमा एवं फेफड़े का कैंसर। इसके अलावा भी अन्य गम्भीर बीमारियों के होने का खतरा बराबर बना रहता है। इनकी वजह से असमय मृत्यु की आशंका भी प्रबल हो जाती है। पिछले दिनों र्वल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के टुबैको- फी इनिशिएटिव के प्रोग्रामर डा. एनेट ने सेकेंड हैंड स्मोकिंग को लेकर चिंता प्रकट की थी। दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में सेकेंड हैंड स्मोकिंग का दुष्प्रभाव सर्वाधिक देखने को मिल रहा है। अशिक्षा, गरीबी और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव इसका मूल कारण हो सकता है। स्वीडिश रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन बच्चों के माता पिता धूम्रपान करते हैं उन बच्चों में निमोनिया और अस्थमा जैसी घातक बीमारियों की आशंका ज्यादा होती है। सवाल यह उठता है कि बच्चों को धूम्रपान की बढ़ती लत और सेकेंड हैंड स्मोकिंग के दुष्प्रभाव से आखिर कैसे बचाया जाय? इसके लिए ऐसे कारगर उपायों को अमल में लाने की जरूरत है जो न केवल बच्चों में धूम्रपान के प्रति बढ़ते आकर्षण को कम करे बल्कि उनके मन में भी यह भावना पैदा हो कि धूम्रपान एक सामाजिक बुराई है। धूम्रपान के खिलाफ सरकारी कार्यक्रमों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों में स्कूलों एवं अन्य शिक्षण संस्थाओं को शामिल करके इस कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। धूम्रपान पर नियंतण्रस्थापित करने में स्कूलों की भूमिका निर्णायक एवं प्रभावी साबित हो सकती है बशत्रे वह इसे नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए। स्कूलों में जागरूकता पैदा करने वाले कार्यक्रम अन्य संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा कारगर साबित होते हैं।
Tuesday, March 29, 2011
सावधान! जानलेवा है इस चाय की चुस्की
न्यूज नेटवर्क क्या आप प्लास्टिक की पन्नी में लाई हुई चाय को प्लास्टिक के कप डालकर पीते हैं? क्या आप पन्नी में पैक भोजन करते हैं? अगर ऐसा है तो तत्काल यह काम बंद कर दीजिए। इससे आप लिवर और किडनी की बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। इससे कैंसर भी हो सकता है। बाजार में आमतौर पर बिकने वाली प्लास्टिक की पन्नियां या कप रिसाइकिल्ड होते हैं, जिन्हें बनाने में बिसफिनोल ए नामक एक जहरीला रसायन इस्तेमाल किया जाता है। अब तक हुए परीक्षणों में यह कैंसरकारक साबित हुआ है। बिसफिनोल ए के अलावा प्लास्टिक को रंगने में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी हानिकारक होते हैं। प्लास्टिक के पात्र में गर्म पदार्थ रखा जाए या ठंडा, उसके जहरीले रसायन दोनों ही स्थितियों में उसमें रखे पदार्थ में घुल जाते हैं। एम्स के कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के डॉ. बीर सिंह ने बताया कि सिर्फ पन्नी ही नहीं बल्कि रिसाइकिल किए रंगीन या सफेद प्लास्टिक जार, कप या इस तरह के किसी भी उत्पाद में खाद्य एवं पेय पदार्थ का सेवन जानलेवा हो सकता है। इनमें मौजूद बिसफिनोल ए से महिलाओं में स्तन कैंसर हो सकता है और यह गर्भपात का भी कारण बन सकता है। यह पुरुषों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। एम्स के पूर्व न्यूरो विशेषज्ञ एवं वर्तमान में गुडगांव के आर्टिमिज हिल्स इंस्टीट्यूट में कार्यरत डॉ. प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि प्लास्टिक के घातक तत्वों के खाद्य एवं तरल पदाथरें के माध्यम से शरीर में जाने पर मस्तिष्क का विकास बाधित होता है। विशेषज्ञों के अनुसार बिसफिनोल ए पैंक्रियाज ग्रंथि में इंसुलिन बनाने वाली कोशिका अल्फा सेल को भी प्रभावित करता है। इंसुलिन ही हमारे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करता है और इसकी कार्यप्रणाली प्रभावित होने से डायबिटीज की बीमारी होती है। बिसफिनोल ए हमारे शरीर में हार्मोन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। लखनऊ के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलाजी के निदेशक डॉ. विजय कुमार कहते हैं कि प्लास्टिक की पन्नियों का रंग ही इंसान का दुश्मन है। इन्हें रंगने के लिए सस्ते और हानिकारक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पन्नियों में गर्म चाय या खाद्य पदार्थ रखने से रंग, प्लास्टीसाइजर्स (लचीलेपन के लिए) और स्टेबलाइजर (मजबूती के लिए) के रिस कर सामग्री में मिलने का अंदेशा रहता है। पीजीआइ, लखनऊ के गैस्ट्रो मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. जी. चौधरी की चेतावनी है लाल, नीली झिल्लियों में लाई गई चाय कतई न पिएं। इससे पेट सहित कई बीमारियां हो सकती हैं। बच्चों में खतरा अधिक है। उनकी एकाग्रता कम हो सकती है। (नई दिल्ली से ब्रजकिशोर मिश्र और लखनऊ से रूमा सिन्हा की रिपोर्ट)
Monday, March 28, 2011
Sunday, March 27, 2011
दिमागी बुखार का अब निकलेगा दम
यह ऐसी बीमारी है, जो हर साल हजारों मासूमों को निगल जाती है। यहां तक कि बीमारी का पता लगने के बाद भी डॉक्टर और अभिभावक आंखों के सामने मासूम को दम तोड़ते देखने को बेबस होते हैं। विज्ञान ने इस स्थिति से उबरने की उम्मीद बंधाई है। दिमागी बुखार या जापानी इंसेफलाइटिस (जेई) नाम की इस जानलेवा बीमारी की पहली दवा के अंतिम दौर का परीक्षण अगले महीने से ही शुरू होने जा रहा है। सरकारी रिकार्ड की ही मानें तो पिछले छह साल में इसने साढ़े पांच हजार बच्चों की सांसें हमेशा के लिए थाम दी हैं। जेई वायरस से लड़ने का काम शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर ही छोड़ दिया जाता है। मगर अब नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर, मानेसर के वैज्ञानिक अनिर्बन बसु ने इसकी पहली कामयाब दवा खोज निकाली है। बसु ने दूसरी बीमारी में इस्तेमाल हो रही दवा मीनोसाइक्लिन को इसके लिए प्रभावी पाया है। एनबीआरसी के निदेशक सुब्रत सिन्हा ने बताया कि बसु ने प्रयोगशाला में जानवरों पर इस दवा के प्रभाव को साबित कर दिखाया है। इसके इंसान पर परीक्षण को भी भारत के औषधि महा नियंत्रक की मंजूरी मिल चुकी है। अब जल्दी ही लखनऊ की सीएसएम मेडिकल यूनिवर्सिटी में इसका तीसरे दौर का परीक्षण शुरू होने जा रहा है। इसके बाद यह दवा उपयोग में लाई जा सकेगी। मीनोसाइक्लिन दूसरी पीढ़ी की एंटीबायटिक दवा है, जिसका इस्तेमाल त्वचा रोगों के इलाज में होता रहा है। बसु के अध्ययन को इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर न्यूरोकैमिस्ट्री अपने जर्नल ऑफ न्यूरोकैमिस्ट्री में प्रकाशित कर चुकी है। यह दवा न सिर्फ सस्ती और उपयोगी होगी बल्कि देश में ही इसका उत्पादन भी हो सकेगा। अभी इस बीमारी के लिए टीका जरूर उपलब्ध है। लेकिन यह आयातित टीका कारगर नहीं हो रहा।
बेकार चली गयीं आई बैंक में रखी 46 आंखें
पिछले दो साल में मेरठ मेडिकल कॉलेज आई बैंक को मिलीं 46 आंखें बेकार हो गई। इस दौरान नेत्र प्रत्यारोपण के तकरीबन डेढ़ दर्जन ऑपरेशन फेल हो गए, जबकि लगभग ढाई दर्जन आंखों के प्रत्यारोपण से पहले पता चला कि वह रोगी हैं। उन्हें किसी को लगाया नहीं जा सकता। आरटीआइ को तहत यह खुलासा हुआ है। मेडिकल कॉलेज के जन सूचना अधिकारी ने बताया कि मेरठ आई बैंक को 2009-10 में कुल 122 आंखें प्राप्त हुई। 10-11 में इनकी संख्या 90 रही। यानि कि पिछले दो सालों में आई बैंक को कुल 212 आंखें प्राप्त हुई। प्राप्त हुई आंखों में से कुल 182 लोगों को रोशनी दी जा सकी। 30 आंखें जब डॉक्टर नेत्रहीनों को लगाने चले, तो पता चला कि वह रोगियों की थीं। ऐसे में वह किसी को भी नहीं लगाई जा सकती थीं। इसके अलावा कुल हुए ऑपरेशन में से 16 लोगों का ऑपरेशन फेल रहा, जिन्हें दोबारा नेत्र प्रत्यारोपण किया गया। इस तरह से 16 यह आंखें भी बेकार चली गई। 45 फीसदी यानि कि 82 मरीजों का ऑपरेशन भी आंशिक रूप से ही सफल रहा। उनकी आंखों में न के बराबर रोशनी रही। बाद में रोगी हुई होंगी आंखें : बेकार हुई 46 आंखों में से 30 आंखें रोगी पाई गई। इस बारे में जब मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. प्रदीप भारती से पूछा गया तो उनका कहना था कि किसी की भी आंख दान में लेते समय उसकी मेडिकल हिस्ट्री जरूर ध्यान में रखी जाती है। अगर दानकर्ता की मेडिकल हिस्ट्री सही नहीं है, तो उसकी आंखें दान में नहीं ली जातीं। जो 30 आंखें रोगी हुई, वह आई बैंक में रखने के उपरांत रोगी हुई हो सकती हैं। बता दें कि आई बैंक में आंखें तब आती हैं जब किसी की मौत होती है और उसने पहले से ही आंख दान करने का संकल्प लिया होता है।
Saturday, March 26, 2011
Friday, March 25, 2011
2 वर्षो में बाजार तक न पहुंच सकी टीबी की जांच किट
दवा न हो और बीमारी बढ़े तो दुख की बात है,लेकिन इलाज हो पर बाजार तक न पहुंचे तो यह दुख और आश्चर्य दोनों की ही बात। यही हुआ है ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) का इलाज करने में काफी सहायक मानी गई एक ऐसी डायग्नॉस्टिक किट के साथ जिसे उसकी निर्माता कंपनी बाजार में उतारने में विफल रही। दो साल की प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआइ) अब नए सिरे से किट की लाइसेंसिंग प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है। सीडीआरआइ द्वारा विकसित इस डायग्नॉस्टिक किट की खासियत यह है कि इससे मात्र 48 घंटों में रोग की पुष्टि हो जाती है, जबकि अभी होने वाली प्रचलित जांच के नतीजे आने में आठ हफ्ते लगते हैं। किट का महत्व इसीलिए है क्योंकि यह बहुत समय बचाती है। संस्थान ने जांच किट का लाइसेंस बॉयोट्रान कंपनी को दिया था। किट को अमेरिकी पेटेंट भी मिल चुका है और चिकित्सा विश्र्वविद्यालय, कमांड अस्पताल सहित कई अन्य अस्पतालों में किट का इस्तेमाल किया जा रहा है। माइक्रोबायलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. रंजना श्रीवास्तव बताती हैं कि किट को बाजार तक पहुंचाने में कंपनी विफल रही है इसलिए अब किसी दूसरी कंपनी को लाइसेंस देने का विचार किया जा रहा है। कोशिश यह भी है कि किट को टीबी के राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किया जाए जिससे मरीजों की पहचान आसान हो सके। सीएसआइआर के महानिदेशक डॉ. समीर ब्रह्मचारी ने टीबी के खिलाफ लड़ाई को प्राथमिकता दी है। ओपेन सोर्स ड्रग डिस्कवरी कार्यक्रम के तहत सीडीआरआइ के साथ अन्य सीएसआइआर प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिक एकजुट होकर टीबी की नई दवा खोजने में जुटे हैं। कई नये मॉलीक्यूल मिले भी हैं। डायग्नॉस्टिक किट : डॉ. रंजना श्रीवास्तव बताती हैं कि टीबी जांच के लिए क्लीनिकल नमूने जैसे थूक, रक्त अथवा मूत्र के नमूने लिए जाते हैं। किट में मौजूद डीएनए जिसमें माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु मौजूद रहता है, से नमूनों का मिलान किया जाता है, से 48 घंटों में परिणाम आ जाता है।
Thursday, March 24, 2011
Wednesday, March 23, 2011
हर बच्चे को मिलेगा इलाज का अधिकार
राजधानी में 14 साल तक के बच्चे का होगा मुफ्त इलाज
राजधानीवासियों को चिकित्सा क्षेत्र में कई सुविधाएं मिलेंगी। वित्त वर्ष 2011-12 में दो नए मेडिकल कॉलेज खुलेंगे। इनमें से एक कॉलेज रोहिणी स्थित अंबेडकर अस्पताल परिसर में, जबकि दूसरा द्वारका में नए अस्पताल के निकटवर्ती परिसर में बनाया जाएगा। यही नहीं चाचा नेहरू सेहत योजना नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया जाएगा, जिसके जरिए राज्य के 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को निशुल्क चिकित्सा देखभाल प्रदान की जाएगी। इस कार्यक्रम के लागू होने पर करीब 27 लाख स्कूली बच्चों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा के दायरे में लाया जा सकेगा। गुरु तेग बहादुर अस्पताल में रोगियों की भीड़ को देखते हुए 500 बिस्तर के नए वार्ड ब्लॉक का निर्माण किया गया है और इसे जल्द ही चालू कर दिया जाएगा। मधुमेह और गुर्दा विकार संबंधी रोगियों के लिए दो विशेषज्ञतापूर्ण क्लीनिक जीटीबी अस्पताल में खोले जाएंगे। इसके अलावा नए ब्लाक का निर्माण किया जाएगा। नए अस्पताल भवनों के निर्माण के लिए 167 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इनमें द्वारका में नए अस्पताल के निर्माण के लिए 50 करोड़ रुपये भी शामिल है। सरिता विहार, सिरसपुर, केशवपुरम्, बापडौला, छतरपुर, बामनौली में नए अस्पताल भवनों और मोलड़ बंद और झटीकरा में प्रसूति एवं शिशु अस्पतालों का निर्माण किया जाएगा। यही नहीं, प्रस्तावित बजट में सरकारने अंबेडकर नगर, बुराड़ी, और विकासपुरी में सरकार निजी भागीदारी के अंतर्गत नये अस्पतालों के निर्माण का निर्णय किया है। रेडियो-डायग्नोस्टिक सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार तथा दिल्ली सरका के सभी बड़े अस्पतालों में डायलिसिस की सुविधा प्रदान केने के लिए, निजी क्षेत्र को शामिल करने का निर्णय किया है, जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर श्रेणी के रोगियों को नि:शुल्क सेवाएं तथा अन्य रोगियों को सस्ती दरों पर सेवाएं प्रदान करेंगे।
निजी अस्पतालों पर लगा सेवाकर वापस
लोस से वित्त विधेयक पारित ब्रांडेड परिधान निर्माताओं पर उत्पाद शुल्क अनिवार्य करने के प्रस्ताव में भी दी गई रियायत
वातानुकूलित निजी अस्पतालों और चिकित्सा लैबोरेटरीज पर पांच प्रतिशत सेवाकर लगाने के प्रस्ताव को मंगलवार को वापस ले लिया गया। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने चौतरफा उठी मांग को स्वीकार करते हुए यह कदम उठाया। इसके अतिरिक्त उन्होंने ब्रांडेड परिधान निर्माताओं पर उत्पाद शुल्क अनिवार्य करने के प्रस्ताव में भी कुछ रियायत दी है। इसके बाद लोकसभा ने वित्त विधेयक 2011 पारित करने के साथ ही 2011- 12 के आम बजट को मंजूरी दे दी। लोकसभा में मंगलवार को वित्त विधेयक 2011 पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा, 'स्वास्थ्य क्षेत्र पर प्रस्तावित नया सेवाकर केवल राजस्व वसूली के लिए नहीं लगाया गया था बल्कि इसका उद्देश्य वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) की दिशा में आगे बढ़ना था।' वित्त मंत्री की घोषणा का सदस्यों ने मेजें थपथपाकर स्वागत किया। वित्त मंत्री के इन दोनों बजट प्रस्तावों पर हर खासोआम ने तीखी प्रतिक्रि या जताई थी। 28 फरवरी को वित्त वर्ष 2011-12 का आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने पूरी तरह वातानुकूलित 25 बिस्तर अथवा इससे अधिक क्षमता वाले निजी अस्पतालों और बीमारी की जांच करने वाली शोधशालाओं की सेवाओं पर 50 प्रतिशत छूट के साथ सेवाकर लगा दिया था। इस लिहाज से इन सेवाओं पर 10 प्रतिशत के बजाय सेवा कर की प्रभावी दर पांच प्रतिशत ही होती। मुखर्जी ने इसके अलावा ब्रांडनाम के तहत बिकने वाले सिलसिलाये कपड़ों और मेडअप्स पर भी 10 प्रतिशत की दर से अनिवार्य उत्पाद शुल्क लगाने की घोषणा की थी। इसमें कहा गया था कि उत्पाद शुल्क ऐसे कपड़ों के खुदरा मूल्य के 60 प्रतिशत पर वसूला जाएगा। स्वास्थ्य एवं ब्रांडेड परिधान उद्योग ने इस कर को 'विपदा' कर बताया। वित्त मंत्री ने इसमें फेरबदल करते हुए ब्रांडेड कपड़ों के खुदरा मूल्य के 60 प्रतिशत के स्थान पर अब केवल 45 प्रतिशत मूल्य पर ही उत्पाद शुल्क लगाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा, 'ब्रांडेड कपड़ा निर्माताओं की इस चिंता को दूर करने के लिए, मैं उत्पाद शुल्क रियायत को खुदरा मूल्य के पहले के 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 55 प्रतिशत करने का प्रस्ताव करता हूं, इस रियायत के साथ ही ऐसी कपड़ा इकाइयां 2011-12 में भी लघु उद्योग मानकों को प्राप्त रियायत के लिए पात्र बनी रहेंगी, चाहे चालू वित्त वर्ष में उनकी खुदरा मूल्य पर बिक्री 8.9 करोड रुपए तक ही क्यों नहीं हो। वित्त मंत्री ने हालांकि, विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) डेवलपर्स और सेज स्थित इकाइयों के मामले में अपने प्रस्तावों में कोई फेरबदल नहीं किया। बजट में इन्हें न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) से मिली छूट समाप्त करने का प्रस्ताव है। यह प्रस्ताव एक अप्रैल 2012 से प्रभावी होगा। वित्त मंत्री ने सेज डेवलपर्स को लाभांश वितरण कर से मिली छूट को भी समाप्त करने का प्रस्ताव किया है। आयकर अधिनियम और सेज कानून दोनों में संशोधन कर इस छूट को एक जून 2011 से समाप्त किया जाएगा। कच्चे रेशम के आयात पर बेसिक कस्टम् ड्यूटी को 35 से घटाकर 5 प्रतिशत करने के बजट प्रस्ताव पर वित्त मंत्री ने कहा कि इसके पीछे उद्देश्य हथकरघा और पावरलूम दोनों क्षेत्रों में बुनकरों के लिए कच्चेमाल की आपूर्ति को बढ़ाना है। मुखर्जी ने कहा कि उन्हें क्षेत्र के बारे में अलग अलग प्रतिक्रि याएं मिली हैं। 'मैं सदन को आश्वस्त करना चाहता हूं कि जब कभी जरूरत होगी प्रतिकूल प्रभाव को दूर करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।'
Tuesday, March 22, 2011
Friday, March 18, 2011
खाने में कीटनाशक
प्रतिबंधित कीटनाशकों के खुले इस्तेमाल पर लेखक की टिप्पणी
हाल ही में कंज्यूमर वॉयस नामक एक एनजीओ द्वारा तैयार अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि सब्जियों और फलों में प्रतिबंधित कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है। वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित पांच कीटनाशकों की मात्रा सब्जियों और फलों में पाई गई है। इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में बिक रही सब्जियों में प्रतिबंधित कीटनाशकों के प्रयोग के लिए सरकार को फलों और सब्जियों की जांच का आदेश दिया है। हमारी सरकार लोगों के स्वास्थ्य के प्रति कितनी लापरवाह है इसे दिल्ली के उदाहरण से समझा जा सकता है। दिल्ली सरकार के प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्टरेशन (पीएफए) की जिम्मेदारी है कि वह मंडियों में फल-सब्जियों के नमूने ले और जांच में गड़बड़ी पाने पर दोषियों को पकड़े। लेकिन इस विभाग ने पिछले तीन साल में दिल्ली की मंडियों में जाकर एक भी नमूना नहीं लिया। इससे आम लोगों की सेहत के प्रति सरकारी विभागों की उदासीनता का पता चलता है। जब देश की राजधानी का यह हाल है तो पूरे देश की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। दरअसल सब्जियों और फलों के ज्यादा से ज्यादा उत्पादन और मुनाफा कमाने के उद्देश्य से रसायनों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। गर्भवती महिलाओं के आसान प्रसव के लिए प्रयोग किए जाने वाले ऑक्सीटोसिन नामक हारमोन का इस्तेमाल आज बहुत सारे पशुपालक और किसान पशुओं से अधिक दूध निकालने या अधिक मात्रा में सब्जियां उगाने के लिए करने लगे हैं। परीक्षणों से यह प्रमाणित हो चुका है कि फलों या सब्जियों को अधिक ताजा दिखाने के लिए उन्हें रसायनों में डुबो कर रखा जाता है। चिकित्सकों के मुताबिक इस तरह के फल व सब्जियों के सेवन से कैंसर सहित 12 तरह की बीमारियां होती हैं। तंत्रिका तंत्र के अचानक फेल होने, हृदय की धड़कन बढ़ने, रक्तचाप, कैंसर, गुर्दे की खराबी, चर्म रोगों, नपुंसकता के मामले तेजी से बढ़ने के पीछे खान-पान के साथ शरीर में जा रहे जहरीले रसायनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। देखा जाए तो फलों-सब्जियों के साथ-साथ अन्य फसलों में भी नुकसानदेह कीटनाशकों का प्रचलन बढ़ा है। इसका एक कारण कृषि मित्र जीव-जंतुओं का विनाश भी है। पहले देसी कीटनाशकों का प्रयोग होता था, लेकिन जैसे ही रासायनिक कीटनाशक आए वैसे ही इन्हें अनुपयोगी मान लिया गया। नए कीटनाशकों ने मिट्टी की उर्वरता नष्ट करने और हवा-पानी को जहरीला बनाने के साथ ही कीटनाशकों की जरूरत को बढ़ा दिया। इससे किसानों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ा। इसे कपास के उदाहरण से समझा जा सकता है। 1960 के शुरू में कुल सात कीट ही कपास किसानों को परेशान कर रहे थे, लेकिन आज किसानों को 120 कीटों से जूझना पड़ रहा है जिनमें 70 बड़े कीटों की श्रेणी में आ गए हैं। जागरूकता के अभाव में कीटनाशकों का अनावश्यक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। उदाहरण के लिए फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) ने बताया कि एशिया में धान पर कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पूरी तरह से धन और समय की बर्बादी है। इस बात का अहसास तब हुआ जब फिलीपींस, वियेतनाम और बांग्लादेश के किसानों ने बिना रासायनिक कीटनाशकों के पहले से भी अधिक धान का उत्पादन किया। भारत में भी कीटनाशकों के बिना खेती का प्रचलन शुरू हो चुका है। आंध्र प्रदेश के 18 जिलों के ढाई लाख किसान बगैर कीटनाशकों के इस्तेमाल के फसल उगा रहे हैं और पैदावार में कोई गिरावट नहीं आई है। अब किसानों को अवांछित कीटों से नहीं जूझना पड़ रहा है। इससे न केवल पर्यावरण बिल्कुल साफ और सुरक्षित हो गया है, बल्कि कीटनाशकों के विषैले तत्वों का मानव और पशुओं पर दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ रहा है। ऐसे में कीटनाशक विहीन खेती का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
महंगी हुई दवाएं
18 फीसद तक बढ़ी 62 जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें
महंगाई की मार इनमें टीबी, एलर्जी, अस्थमा मधुमेह जैसी बीमारियों के इलाज होता है इनका उपयोग एनपीपीए की दलील, देशी कंपनियों के हित में जरूरी था मूल्य वृद्धि का कदम घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित इंसुलिन आयातित दवाओं की तुलना में अब भी है 15 फीसद तक सस्ती
नई दिल्ली (एजेंसियां)। दवा कीमत तय करने वाले प्राधिकरण एनपीपीए ने 62 दवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं जबकि 14 औषधियों की कीमतें घटाई गई हैं। जो दवाएं महंगी हुई हैं उनमें से ज्यादातर का उपयोग मधुमेह और टीबी जैसी बीमारियों के इलाज में होता है। हालांकि राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की पिछले सप्ताह हुई बैठक में 21 दवाओं की कीमतों को पूर्वस्तर पर बनाए रखा गया है। एनपीपीए ने मधुमेह, एलर्जी, मलेरिया, डायरिया, अस्थमा और उच्च तनाव के साथ एंटीसेप्टिक दवाओं की कीमतों की समीक्षा की। प्राधिकरण ने पहली बार 19 दवाओं के दाम पर विचार किया। एनपीपीए के चेयरमैन एसएम झारवाल ने कहा, ‘हमें संतुलित कदम उठाने हैं और स्वदेशी कंपनियों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। इंसुलिन के कुल घरेलू बाजार में देसी कंपनियों का योगदान 10 फीसद है।’ उन्होंने कहा कि इंसुलिन आधारित दवाओं की कीमत बढ़ाए जाने के बावजूद यह किफायती बनी रहेंगी। देश में इनका निर्माण कंपनियां बायोकॉन और वोकहार्ड करती हैं। झारवाल ने कहा, ‘हालांकि घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित इंसुलिन की कीमत में पांच से 18 फीसद की वृद्धि की गई है। इसके बावजूद यह आयातित इंसुलिन के मुकाबले करीब 15 फीसद सस्ती होंगी।’ एनपीपीए ने कहा कि कच्चे माल के दाम में वृद्धि के साथ पैकेजिंग शुल्क समेत अन्य मदों में लागत संबंधी नियमों की समीक्षा के बाद कीमतें बढ़ाना जरूरी था। लागत संबंधी नियमों के बारे अधिसूचना 16 दिसम्बर, 2010 को जारी की गई थी। प्राधिकरण के मुताबिक कीमतों में संशोधन से प्रभावित होने वाली कंपनियों में इली लिली, फाइजर, नोवार्तिस, सनोफी एवेन्टिस, जीएसके, बायोकॉन, वोकहार्ड, ल्यूपिन और सिप्ला शामिल हैं। एनपीपीए ने थोक दवाओं की कीमतों की समीक्षा भी की है।
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