दवा न हो और बीमारी बढ़े तो दुख की बात है,लेकिन इलाज हो पर बाजार तक न पहुंचे तो यह दुख और आश्चर्य दोनों की ही बात। यही हुआ है ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) का इलाज करने में काफी सहायक मानी गई एक ऐसी डायग्नॉस्टिक किट के साथ जिसे उसकी निर्माता कंपनी बाजार में उतारने में विफल रही। दो साल की प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआइ) अब नए सिरे से किट की लाइसेंसिंग प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है। सीडीआरआइ द्वारा विकसित इस डायग्नॉस्टिक किट की खासियत यह है कि इससे मात्र 48 घंटों में रोग की पुष्टि हो जाती है, जबकि अभी होने वाली प्रचलित जांच के नतीजे आने में आठ हफ्ते लगते हैं। किट का महत्व इसीलिए है क्योंकि यह बहुत समय बचाती है। संस्थान ने जांच किट का लाइसेंस बॉयोट्रान कंपनी को दिया था। किट को अमेरिकी पेटेंट भी मिल चुका है और चिकित्सा विश्र्वविद्यालय, कमांड अस्पताल सहित कई अन्य अस्पतालों में किट का इस्तेमाल किया जा रहा है। माइक्रोबायलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. रंजना श्रीवास्तव बताती हैं कि किट को बाजार तक पहुंचाने में कंपनी विफल रही है इसलिए अब किसी दूसरी कंपनी को लाइसेंस देने का विचार किया जा रहा है। कोशिश यह भी है कि किट को टीबी के राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल किया जाए जिससे मरीजों की पहचान आसान हो सके। सीएसआइआर के महानिदेशक डॉ. समीर ब्रह्मचारी ने टीबी के खिलाफ लड़ाई को प्राथमिकता दी है। ओपेन सोर्स ड्रग डिस्कवरी कार्यक्रम के तहत सीडीआरआइ के साथ अन्य सीएसआइआर प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिक एकजुट होकर टीबी की नई दवा खोजने में जुटे हैं। कई नये मॉलीक्यूल मिले भी हैं। डायग्नॉस्टिक किट : डॉ. रंजना श्रीवास्तव बताती हैं कि टीबी जांच के लिए क्लीनिकल नमूने जैसे थूक, रक्त अथवा मूत्र के नमूने लिए जाते हैं। किट में मौजूद डीएनए जिसमें माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु मौजूद रहता है, से नमूनों का मिलान किया जाता है, से 48 घंटों में परिणाम आ जाता है।
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