Friday, March 18, 2011

महंगी हुई दवाएं


18 फीसद तक बढ़ी 62 जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें
महंगाई की मार इनमें टीबी, एलर्जी, अस्थमा मधुमेह जैसी बीमारियों के इलाज होता है इनका उपयोग एनपीपीए की दलील, देशी कंपनियों के हित में जरूरी था मूल्य वृद्धि का कदम घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित इंसुलिन आयातित दवाओं की तुलना में अब भी है 15 फीसद तक सस्ती
नई दिल्ली (एजेंसियां)। दवा कीमत तय करने वाले प्राधिकरण एनपीपीए ने 62 दवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं जबकि 14 औषधियों की कीमतें घटाई गई हैं। जो दवाएं महंगी हुई हैं उनमें से ज्यादातर का उपयोग मधुमेह और टीबी जैसी बीमारियों के इलाज में होता है। हालांकि राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की पिछले सप्ताह हुई बैठक में 21 दवाओं की कीमतों को पूर्वस्तर पर बनाए रखा गया है। एनपीपीए ने मधुमेह, एलर्जी, मलेरिया, डायरिया, अस्थमा और उच्च तनाव के साथ एंटीसेप्टिक दवाओं की कीमतों की समीक्षा की। प्राधिकरण ने पहली बार 19 दवाओं के दाम पर विचार किया। एनपीपीए के चेयरमैन एसएम झारवाल ने कहा, ‘हमें संतुलित कदम उठाने हैं और स्वदेशी कंपनियों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। इंसुलिन के कुल घरेलू बाजार में देसी कंपनियों का योगदान 10 फीसद है।’ उन्होंने कहा कि इंसुलिन आधारित दवाओं की कीमत बढ़ाए जाने के बावजूद यह किफायती बनी रहेंगी। देश में इनका निर्माण कंपनियां बायोकॉन और वोकहार्ड करती हैं। झारवाल ने कहा, ‘हालांकि घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित इंसुलिन की कीमत में पांच से 18 फीसद की वृद्धि की गई है। इसके बावजूद यह आयातित इंसुलिन के मुकाबले करीब 15 फीसद सस्ती होंगी।’ एनपीपीए ने कहा कि कच्चे माल के दाम में वृद्धि के साथ पैकेजिंग शुल्क समेत अन्य मदों में लागत संबंधी नियमों की समीक्षा के बाद कीमतें बढ़ाना जरूरी था। लागत संबंधी नियमों के बारे अधिसूचना 16 दिसम्बर, 2010 को जारी की गई थी। प्राधिकरण के मुताबिक कीमतों में संशोधन से प्रभावित होने वाली कंपनियों में इली लिली, फाइजर, नोवार्तिस, सनोफी एवेन्टिस, जीएसके, बायोकॉन, वोकहार्ड, ल्यूपिन और सिप्ला शामिल हैं। एनपीपीए ने थोक दवाओं की कीमतों की समीक्षा भी की है।

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