Sunday, March 27, 2011

दिमागी बुखार का अब निकलेगा दम


यह ऐसी बीमारी है, जो हर साल हजारों मासूमों को निगल जाती है। यहां तक कि बीमारी का पता लगने के बाद भी डॉक्टर और अभिभावक आंखों के सामने मासूम को दम तोड़ते देखने को बेबस होते हैं। विज्ञान ने इस स्थिति से उबरने की उम्मीद बंधाई है। दिमागी बुखार या जापानी इंसेफलाइटिस (जेई) नाम की इस जानलेवा बीमारी की पहली दवा के अंतिम दौर का परीक्षण अगले महीने से ही शुरू होने जा रहा है। सरकारी रिकार्ड की ही मानें तो पिछले छह साल में इसने साढ़े पांच हजार बच्चों की सांसें हमेशा के लिए थाम दी हैं। जेई वायरस से लड़ने का काम शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर ही छोड़ दिया जाता है। मगर अब नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर, मानेसर के वैज्ञानिक अनिर्बन बसु ने इसकी पहली कामयाब दवा खोज निकाली है। बसु ने दूसरी बीमारी में इस्तेमाल हो रही दवा मीनोसाइक्लिन को इसके लिए प्रभावी पाया है। एनबीआरसी के निदेशक सुब्रत सिन्हा ने बताया कि बसु ने प्रयोगशाला में जानवरों पर इस दवा के प्रभाव को साबित कर दिखाया है। इसके इंसान पर परीक्षण को भी भारत के औषधि महा नियंत्रक की मंजूरी मिल चुकी है। अब जल्दी ही लखनऊ की सीएसएम मेडिकल यूनिवर्सिटी में इसका तीसरे दौर का परीक्षण शुरू होने जा रहा है। इसके बाद यह दवा उपयोग में लाई जा सकेगी। मीनोसाइक्लिन दूसरी पीढ़ी की एंटीबायटिक दवा है, जिसका इस्तेमाल त्वचा रोगों के इलाज में होता रहा है। बसु के अध्ययन को इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर न्यूरोकैमिस्ट्री अपने जर्नल ऑफ न्यूरोकैमिस्ट्री में प्रकाशित कर चुकी है। यह दवा न सिर्फ सस्ती और उपयोगी होगी बल्कि देश में ही इसका उत्पादन भी हो सकेगा। अभी इस बीमारी के लिए टीका जरूर उपलब्ध है। लेकिन यह आयातित टीका कारगर नहीं हो रहा।


No comments:

Post a Comment