पिछले दो साल में मेरठ मेडिकल कॉलेज आई बैंक को मिलीं 46 आंखें बेकार हो गई। इस दौरान नेत्र प्रत्यारोपण के तकरीबन डेढ़ दर्जन ऑपरेशन फेल हो गए, जबकि लगभग ढाई दर्जन आंखों के प्रत्यारोपण से पहले पता चला कि वह रोगी हैं। उन्हें किसी को लगाया नहीं जा सकता। आरटीआइ को तहत यह खुलासा हुआ है। मेडिकल कॉलेज के जन सूचना अधिकारी ने बताया कि मेरठ आई बैंक को 2009-10 में कुल 122 आंखें प्राप्त हुई। 10-11 में इनकी संख्या 90 रही। यानि कि पिछले दो सालों में आई बैंक को कुल 212 आंखें प्राप्त हुई। प्राप्त हुई आंखों में से कुल 182 लोगों को रोशनी दी जा सकी। 30 आंखें जब डॉक्टर नेत्रहीनों को लगाने चले, तो पता चला कि वह रोगियों की थीं। ऐसे में वह किसी को भी नहीं लगाई जा सकती थीं। इसके अलावा कुल हुए ऑपरेशन में से 16 लोगों का ऑपरेशन फेल रहा, जिन्हें दोबारा नेत्र प्रत्यारोपण किया गया। इस तरह से 16 यह आंखें भी बेकार चली गई। 45 फीसदी यानि कि 82 मरीजों का ऑपरेशन भी आंशिक रूप से ही सफल रहा। उनकी आंखों में न के बराबर रोशनी रही। बाद में रोगी हुई होंगी आंखें : बेकार हुई 46 आंखों में से 30 आंखें रोगी पाई गई। इस बारे में जब मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. प्रदीप भारती से पूछा गया तो उनका कहना था कि किसी की भी आंख दान में लेते समय उसकी मेडिकल हिस्ट्री जरूर ध्यान में रखी जाती है। अगर दानकर्ता की मेडिकल हिस्ट्री सही नहीं है, तो उसकी आंखें दान में नहीं ली जातीं। जो 30 आंखें रोगी हुई, वह आई बैंक में रखने के उपरांत रोगी हुई हो सकती हैं। बता दें कि आई बैंक में आंखें तब आती हैं जब किसी की मौत होती है और उसने पहले से ही आंख दान करने का संकल्प लिया होता है।
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