Saturday, October 27, 2012

भारत 2014 तक हो जाएगा पोलियो से पूरी तरह मुक्त



नई दिल्ली, एजेंसी : पोलियो वायरस के खिलाफ जंग के सुखद परिणाम को देखते हुए उम्मीद है कि भारत को 2014 तक पूरी तरह पोलियो मुक्त देश घोषित कर दिया जाएगा। लोगों में जागरूकता के लिए बुधवार को विश्व पोलियो उन्मूलन दिवस मनाया जा रहा है। मालूम हो कि इस वर्ष के शुरू में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो संक्रमित देशों की सूची से हटा दिया था। 2014 तक कोई केस नहीं आया तो भारत को पूर्ण पोलियो मुक्त देश घोषित कर दिया जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के उप निदेशक डॉक्टर अजय खेर के अनुसार, पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान में पोलियो के वायरस आज भी मौजूद हैं। इसलिए खतरे को देखते हुए सजगता जारी है। देश में पोलियो का अंतिम केस पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में जनवरी 2011 में पाया गया था। पड़ोसी देश से भारत में पोलियो वायरस के आने की संभावना को देखते हुए पांच सीमावर्ती क्षेत्रों जम्मू कश्मीर स्थित बारामुला और पुंछ, पंजाब स्थित अटारी और वाघा बार्डर एवं राजस्थान के मनाबो में पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम जारी है। इस काम में स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ विश्र्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ व रोटरी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। पोलियों के हाई रिस्क एरिया, सघन बस्तियों व घुमंतू परिवारों के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम में लगी 6,500 सदस्यों की टीम का फोकस उत्तर प्रदेश, बिहार राज्यों में नियमित टीकाकरण पर है।
Dainik jagran National Edition 24-10-2012 LokLF;) pej -5 

Saturday, October 20, 2012

हर साल दो हजार बच्चे मर जाते हैं कलावती सरन अस्पताल में



नीरज मिश्र नई दिल्ली। बच्चों के इलाज के लिए देशभर में मशहूर कलावती सरन अस्पताल में हर साल औसतन दो हजार बच्चों की मौत हो जाती है। पांच वर्ष के दौरान 10 हजार 81 बच्चों की इस अस्पताल में जान गइ र्है। केंद्र सरकार के इस अस्पताल में चिकित्सा सुविधाओं का आलम यह है कि बच्चों के आईसीयू में 10 वेंटिलेटर लगे हैं, इनमें से चार खराब हैं और एक पूरी तरह कंडम हो चुका है यानि 10 में से पांच वेंटीलेटर ही चालू हालत में हैं। इन तथ्यों का खुलासा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से हुआ। इस गंभीर मामले को लेकर मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर की जा चुकी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता आरएच बंसल ने अस्पताल प्रशासन से आरटीआई के जरिए कुछ जानकारियां मांगी थीं। प्रशासन की ओर से जो सूचनाएं दी गई वे किसी को भी चौंकाने के लिए पर्याप्त हैं। आरटीआई के जवाब में अस्पताल प्रशासन ने अगस्त तक की जानकारी उपलब्ध कराई है, जिसमें बताया गया कि कलावती सरन अस्पातल में पांच वर्ष में 10081 शिशुओं की मौत हुई। वर्ष 2008 में 2713, वर्ष 2009 में 2499, वर्ष 2010 में 2144, वर्ष 2011 में 1782 शिशुओं की मौत हुई। वर्ष 2012 में आंकड़ा तैयार करते समय तक 943 शिशुओं की मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन की ओर से बताया गया कि इन शिशुओं की मौत वेंटिलेटर की कमी के चलते नहीं हुई। एक अन्य प्रश्न के जबाव में बताया गया कि पीडियाट्रिक्स इंटेशिव केयर यूनिट में 10 वेंटिलेटर लगे हैं जिसमें चार चालू स्थिति में हैं जबकि पांच की मरम्मत हो रही है। एक ठीक होने की स्थिति में नहीं है। वाडरे में बीमार शिशुओं को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ने पर आईसीयू या एनआईसीयू में शिफ्ट कर दिया जाता है। दूसरे वाडरे के शिशुओं को आईसीयू के वेंटिलेटर में शिफ्ट करने पर स्वभाविक है कि इसमें दबाव बढ़ेगा जिससे चिकित्सा सुविधा की गुणवत्ता में कमी आएगी। जब आईसीयू में यह हाल है तो अन्य वाडरे का क्या होगा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार अस्पताल में अलग-अलग वाडरे में 25 वेंटिलेटर लगे हैं जिसमें नौ खराब हैं जिन्हें दुरुस्त करने की प्रक्रिया जारी है। अस्पताल की ओर से यह भी बताया गया कि खराब वेंटिलेटरों का आंकड़ा स्थिर नहीं रहता है। खराब होने की स्थिति में टेलीफोन से सर्विस एजेंसी को सूचना दी जाती है जिसके बाद इसे दुरुस्त किया जाता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता आरएच बंसल के अनुसार कलावती सरन दिल्ली का एकमात्र शिशुओं का अस्पताल है। जिस दर से प्रतिवर्ष शिशुओं की मौत हो रही है यह एक गंभीर मामला है। इसके खिलाफ विभाग शीघ्र कदम उठाए। खराब पड़े चिकित्सकीय उपकरणों को ठीक कर बेहतरीन सुविधा उपलब्ध कराई जाए इसके लिए हाईकोर्ट में अर्जी दायर करेंगे। इस मामले को लेकर मानव अधिकार आयोग में याचिका दायर कर दी गई है। आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा कि यह घोर लापरवाही का मामला है। इस मामले में जब अस्पताल प्रशासन से बात करने की कोशिश की गई तो वहां के निदेशक (प्रशासन) अतुल मुरारी ने कहा कि इस मामले की जानकारी केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजी जा चुकी है।
अस्पताल में पांच वर्ष के दौरान 10 हजार 81 बच्चों की जा चुकी है जान सुविधाओं का है टोटा, 10 में से पांच वेंटिलेटर नहीं करते काम मामले को लेकर मानवाधिकार आयोग में याचिका डाली
Rashtirya sahara National Edition 20-10-2012 Pej-3 Health

Friday, October 19, 2012

इंसेफलाइटिस पर रोक को 4038 करोड़ मंजूर















स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रस्ताव को 2017 तक साठ जिलों में लागू करने की योजना
नई दिल्ली (एसएनबी)। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लाइलाज बन चुके इंसेफलाइटिस (जापानी बुखार) की रोकथाम और नियंतण्रके लिए एक व्यापक बहुस्तरीय रणनीति के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। पांच साल की इस योजना पर 4038 करोड़ रुपए खर्च होंगे। पिछले 33 वर्षो से हजारो बच्चों को लील चुके इस जापानी बुखार का इलाज दुनिया भर के डाक्टर नहीं कर पा रहे हैं। अनेक अनुसंधान संस्थानों ने कोशिश की लेकिन उनके हाथ भी निराशा लगी है। अब सरकार ने पांच साल के लिए एक समग्र योजना बनाई है संभव है इसका फायदा पूर्वी उत्तर प्रदेश के 60 जिलों को मिल सके। जापानी दिमागी बुखार और एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम की रोकथाम और नियंतण्रके लिए मंत्रिसमूह की सिफारिशों के आधार पर कार्रवाई के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रस्ताव को 2012-13 से 2016-17 तक पांच साल की अवधि में प्राथमिकता के साथ 60 जिलों में लागू किया जाएगा। योजना को स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय तथा महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा पांच राज्यों असम, बिहार, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में लागू किया जाएगा। इस प्रस्ताव के तहत प्रमुख गतिविधियों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सक्रि यता, जापानी इंसेफलाइटिस के टीकाकरण का विस्तार, चिकित्सकीय और सामाजिक पुनर्वास, ग्रामीण तथा शहरी इलाकों में पेयजल और स्वच्छता के प्रावधानों में सुधार तथा पोषण में सुधार शामिल हैं। मंत्रिमंडल ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान उपलब्ध बजट में से मंत्रालयों के लिए इन बीमारियों से निपटने के लिए आवंटन को मंजूरी दी। इनमें स्वास्थ्य मंत्रालय को 1131.49 करोड़ रुपए का आवंटन, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को 2301.57 करोड़ रुपए और सामाजिक न्याय मंत्रालय को 9.19 करोड़ रुपए का आवंटन किया जाएगा। आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन तथा महिला और बाल विकास मंत्रालय को मंत्रीसमूह की सिफारिशों के अनुसार कैबिनेट की मंजूरी के दो महीने के भीतर अतिरिक्त कोष दिया जाएगा। यह राशि करीब 600 करोड़ रुपए की होगी।
Rashtirya sahara National Edition 19-10-2012 Health PeJ-11


Thursday, October 18, 2012

डेंगू के इलाज में मददगार विटामिन ई





ठ्ठ जागरण संवाददाता, लखनऊ डेंगू के मरीजों को यदि उपचार के साथ शुरुआत से विटामिन ई दवा भी दी जाए तो उनमें न केवल प्लेटलेट्स तेजी से बढ़ती हैं बल्कि रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या में हो रही कमी पर भी काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.एके वैश्य द्वारा किया गया यह शोध हाल में इंग्लैंड के इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल द अनॉल्स ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। डॉ. वैश्य बताते हैं कि विटामिन ई में एंटी ऑक्सीडेंट होता है। डेंगू बुखार में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से कम होती है जिससे कई तरह की गंभीर समस्याएं हो जाती हैं। अकसर अंदरूनी रक्तस्राव होने से मरीज की मृत्यु तक हो जाती है। ऐसे में मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाना एकमात्र उपचार रह जाता है। उन्होंने बताया कि केजीएमयू में डेंगू के 66 मरीजों को दो भाग में विभाजित कर अध्ययन किया गया। 33 मरीजों के एक समूह को उपचार के साथ 400 मिग्रा. की विटामिन ई की एक टैबलेट भी दी गई जबकि दूसरे समूह को केवल जरूरी दवाएं ही दी गई। जिन मरीजों को दवाओं के साथ विटामिन ई की टैबलेट भी दी गई, उनमें 64 फीसद मरीजो में एक हफ्ते में प्लेटलेट्स की संख्या एक लाख तक बढ़ गई। दूसरी तरफ जिन मरीजों को विटामिन ई नहीं दिया गया उनमें मात्र 39.28 फीसद मरीजों में ही प्लेटलेट्स की संख्या में वृद्धि देखी गई। ऐसे मरीज जिन्हें अन्य दवाओं के साथ विटामिन ई भी दिया गया था एक सप्ताह पश्चात उनमें से मात्र 6 फीसद मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ी। इसके विपरीत जिन मरीजों को विटामिन ई नहीं दिया गया उनमें से 15.15 फीसद मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाना पड़ा। डॉ. वैश्य बताते हैं कि मरीजों के दोनों समूहों में शुरुआत में प्लेटलेट्स की संख्या लगभग बराबर थी लेकिन देखा गया जिन मरीजों को विटामिन ई दिया जा रहा था उनमें प्लेटलेट्स की संख्या काफी तेजी से बढ़ी। इस शोध अध्ययन से साफ है कि डेंगू मरीजों में यदि प्लेटलेट्स की संख्या कम हो रही हो तो विटामिन ई देने से न केवल इसकी गिरावट को कम किया जा सकता है बल्कि प्लेटलेट्स की संख्या में तेज वृद्धि भी होती है।


Dainik Jagran Nation Edition 18-10-2012 LokLF;)  Pej-9