Tuesday, October 16, 2012

शैवाल-सीपियों से बनी दवा दूर करेगी गठिया का दर्द




ठ्ठ सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली मुद्दतों से सुनते चले आए हैं कि गठिया यानी आर्थराइटिस है तो दर्द होगा ही। इस दर्द का अभी तक कोई मुकम्मल इलाज नहीं खोजा जा सका है। इस जुमले को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के वैज्ञानिकों ने झूठा साबित कर दिया है। उन्होंने समुद्री सीपों और हरी शैवाल घास से कडलमीन नाम की एक ऐसी अनोखी दवा तैयार की है जो असहनीय पीड़ा से तड़पते गठिया के रोगियों को दर्द से निजात दिलाएगी। यह दवा अपने परीक्षणों में किसी भी अंग्रेजी दवा के मुकाबले अधिक कारगर साबित हुई है। पूर्णतया प्राकृतिक होने की वजह के इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के बाद इन दवाओं का पेटेंट भी करा लिया गया है। कोच्चि का केंद्रीय समुद्री मात्सि्यकी अनुसंधान संस्थान (आइसीएआर) का ही एक संस्थान है। यहां के वैज्ञानिकों ने समुद्री शैवाल और सीपों से आर्थराइटिस की ऐसी दवाएं तैयार की हैं, जो न सिर्फ इस रोग के प्रसार को रोकने में कामयाब होंगी, बल्कि जिनका खर्च वहन करना भी आसान होगा। वैज्ञानिकों को इस दवा को तैयार करने में लंबा समय लगा। बाजार में उपलब्ध देसी-विदेशी दवाओं से अस्थायी आराम ही मिलता है, साथ ही ये बहुत खर्चीली भी हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं रहेगा। वैज्ञानिकों ने पहले सीप अथवा घोंघे (म्यूजेल्स) से गठिया की जो दवा बनाई। वह कारगर तो रही, लेकिन उसे मांसाहारी मानकर शाकाहारी रोगियों ने खाने से मना कर दिया। इस पर वैज्ञानिकों ने सालभर में ही समुद्री घास, हरी शैवाल से उतनी ही कारगर शाकाहारी दवाएं तैयार कर दीं। वैज्ञानिकों ने पाया कि सीपों के वही गुण इन हरी शैवाल में भी मौजूद हैं। इस तरह अब मांसाहारी व शाकाहारी दोनों के लिए आर्थराइटिस की कारगर दवाएं उपलब्ध हैं। दोनों के कैप्सूल व टिकियां तैयार हो चुकी हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन दवाओं के प्रयोग से असह्य पीड़ा से तत्काल मुक्ति मिल जाती है। यह एस्पिरिन के मुकाबले कई गुना अधिक कारगर है। ज्ञात हो, देश में 20 करोड़ से अधिक आबादी गठिया रोग की असह्य पीड़ा सहने को मजबूर है। उनके लिए उपयुक्त दवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
Dainik Jagran National Edition 15-10-2012 Health Pej-14

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