Friday, April 29, 2011
Thursday, April 28, 2011
कैंसर के लिए अब रोबोटिक सर्जरी
राजीव गांधी कैंसर संस्थान में शुरू हुई यह आधुनिक तकनीक इंडिया हेबिटेट सेंटर में एक सम्मेलन में हुआ लाइव प्रदर्शन
बच्चेदानी, गुर्दे, स्तन कैंसर के उपचार के लिए अब रोबोटिक सर्जरी उपलब्ध हो गई है। राजीव गांधी कैंसर संस्थान में शुरू हुई आधुनिक तकनीक। इस सर्जरी का इंडिया हेबिटेट सेंटर में संपन्न हुए कैंसर निदान व सर्जरी विषयक एक सम्मेलन में लाइव प्रदर्शन किया गया। कैंसर आंकलोजी विभाग के निदेशक डा. सुधीर रावल ने कहा कि रोबोटिक सर्जरी के प्रचलन से रोगी की पारंपरिक सर्जरी के दौरान अनावश्यक क्षतिग्रस्त होने वाले ऊतकों को बचाते हैं। रक्त व अन्य प्रकार के संक्रमण के जोखिम में भी कमी होती है। रोबोटिक सर्जरी में जोखिम के कम अवसर अब तक की गई सर्जरियों में मिले हैं। रोबोट में एक चिप फिट किया जाता है, जो कैंसर जनित क्षेत्र में इमेजिंग से इस चिप की मेमोरी में फीड करते हैं। जो पूर्व चयनित शरीर के कैंसर वाले भाग को शक कर बाहर निकाल देता है। इसमें चीरा टांका लगने की जरूरत नहीं पड़ती है। सिर्फ दूरबीन तकनीक से जरूरत के मुताबिक बारीक छेद किए जाते हैं। रोबोट में फिट हिडेन कैमरे शरीर के अंदरूनी भाग के चित्र कम्प्यूटर पर दर्शाते हैं, इस सुविधा के बाद सर्जन सटीक सर्जरी कर देता है। चूंकि इस तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए एकग्रता व सघन प्रैक्टिस की जरूरत होती है। इसलिए अधिकांश सर्जन इस सर्जरी का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी कम लेते हैं। फिलहाल यह सुविधा एम्स के बाद अब इस संस्थान में प्रारंभ हो सकी है। सम्मेलन में कैंसर की प्रारंभिक पहचान के लिए जागरूकता लाने व सस्ती जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।
सेहत बिगाड़ सकता है मौसम का मिजाज!
मौसम का तेजी से बदलता मूड सेहत खराब कर सकता है। हर रोज तापमान में आ रहे उतार-चढ़ाव के चलते इन दिनों कॉमन कोल्ड, ब्रॉकाइटिस, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, फेफड़ों और सिर में जकड़न, अस्थमाटिक अटैक जैसी दिक्कतें बढ़ गई हैं। सबसे ज्यादा परेशानी अस्थमा, डायबीटीज, हाई बीपी, कैंसर अथवा दिल के मरीजों को हो रही है। वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डा. आरएन कालरा कहते हैं कि सर्दियों के बाद मौसम में उतार-चढ़ाव से नसों में सिकुड़न आ जाती है, जिससे ब्लड का सकरुलेशन कम हो जाता है और पर्याप्त मात्र में आक्सीजन नहीं मिल पाने के कारण हार्ट को ज्यादा महेनत करनी पड़ती है। ऐसे में अगर तापमान में तेजी से उतार-चढ़ाव आता है तो दिक्कतें बढ़ जाती हैं। गर्मी में हार्ट अटैक के मरीजों की संख्या में भी 25 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाती है। कैंसर हीलर सेंटर की एक्सपर्ट डा. दीपिका कहती हैं कि इम्यून सिस्टम कमजोर होने की वजह से मौसमी उतार-चढ़ाव कैंसर के मरीजों को बहुत जल्दी प्रभावित करता है और दूसरे इन्फेक्शन की चपेट में आने से उनकी हालत और अधिक खराब हो जाती है। इसमें कॉमन फ्लू, धूल भरी अधंड़ से ब्रोंकाइटिस के रोगियों की दिक्कतें ज्याद बढ़ जाती हैं। मूलचंद मेडिसिटी मधुमेह एवं पांव रोग विशेषज्ञ डा. अशोक दमीर कहते हैं कि समस्या से बचाव के लिए डायबिटिक और 60 से ऊपर की उम्र के लोग लिपिड प्रोफाइल (कॉलेस्ट्रॉल टेस्ट) जरूर कराएं। धूप निकलने के बाद ही घर से बाहर निकलें। अगर टहलते समय घबराहट महसूस होती है तो रुक जाएं। धूल मिट्टी से बचना चाहिए। ब्लड प्रेशर व डायबिटिक की दवाएं लेते रहना चाहिए। धूप व धूल से बचाव जरूरी है। अर्मिटिस अस्पताल के कार्डियॉलोजिस्ट डा. अनिल ढल ने सीने में दर्द होने की शिकायत को नजरंदाज न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि तापमान में परिवर्तन से फेफड़ों पर दबाव बढ़ जाता है। दिल के रोगी के शरीर में रक्त की आपूर्ति स्लो हो जाती है। पेट दर्द, दस्त आने, पीलिया से बचाव के लिए हाइजीन सुनिश्चित करें। खांसी, जुकाम, बुखार होने पर डॉक्टर को दिखाएं। सिर पर जरूरी हो तो दिन में धूप से बचाव के लिए टोपी पहनें। पानी उबाल कर पिएं। ताजा खाना, सब्जियों के फल आदि का सेवन करें। व्यायाम करें व पौष्टिक आहार का सेवन करें। खुद दवा न खाएं। नकली डॉक्टर, नीम हकीम से दवाएं नहीं लें। खुले में बिकने वाला पानी न पिएं । कटे फल न खाएं।
Wednesday, April 27, 2011
स्वास्थ्य की चिंता
दुनिया भर के लोगों के स्वास्थ्य की चिंता और रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल 80 लाख व्यक्तियों की मौत कैंसर से हो जाती है और वर्ष 2020 तक कैंसर रोगों से मरने वालों की संख्या लगभग पौने दो करोड़ तक पहुंच जाएगी। अब तक की गई तमाम कोशिशों के बावजूद कैंसर पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है, लेकिन अचरज की बात है कि हजारों कैंसर रोगियों को नया जीवन देने वाले डीएस रिसर्च सेंटर के चिकित्सकों द्वारा पोषक ऊर्जा से विकसित औषधि की जांच-पड़ताल को नजरंदाज किया जा रहा है। लगभग सात वर्ष पूर्व कैंसर क्योर के चार सौ से अधिक परिणामों की सूची पूरे नाम व पते तथा प्रमाणों के साथ वाराणसी में स्थित इस सेंटर के वैज्ञानिकों ने डब्ल्यूएचओ को भेजी थी। उम्मीद की थी यह संस्था अपने स्त्रोतों से इसकी जांच पड़ताल करा लेता अथवा दस-पंद्रह परिणामों के हवाले भी कैंसर पर मिली जीत को प्रचारित-प्रसारित कर देता तो संसार के तमाम लोगों व कैंसर रोगियों में आशा और उत्साह का संचार होता और कैंसर पर लगाम लगाने का नया मार्ग प्रशस्त होता। पर ऐसा लगता है कि डब्ल्यूएचओ उन बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के दबाव में है जो यह नहीं चाहती है कि बाजार में कोई ऐसी सस्ती दवा आए जो कैंसर का नामोनिशान मिटा दे, क्योंकि इससे उनके व्यापारिक हितों पर चोट पहुंचेगी। चिकित्सा इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हुआ जब मरणासन्न कैंसर रोगियों को उनकी चारपाई पर ही परिजनों ने लाकर औषधि दी और वह कुछ महीनों में ही स्वस्थ होकर खुशहाल जीवन जीने लगे। यह जीते-जागते लोग इस बात के साक्षात प्रमाण हैं कि उन्हें कैंसर हुआ था और उनका इलाज देश के विभिन्न प्रतिष्ठित कैंसर अस्पतालों में चला था। जब उनके बचने की लगभग सभी संभावनाएं समाप्त हो गई तो इन मरणासन्न रोगियों को पोषक ऊर्जा की औषधि दी गई। इस औषधि का उन पर अद्भुत प्रभाव पड़ा और कइयों को अपेक्षा से अधिक दिनों तक जीवित रहने का अवसर मिला और कुछ पूरी तरह से कैंसर मुक्त होकर नई जिंदगी जी रहे हैं। कैंसर रोगियों को नया जीवन देने वाली इस महा औषधि का आविष्कार वाराणसी के डीएस रिसर्च सेंटर के चिकित्सक वैज्ञानिक डॉ. उमाशंकर तिवारी और प्रो. शिवाशंकर त्रिवेदी ने किया है। लगभग 40 वर्ष पहले ड्रग सिद्धांत से अलग हटकर अनुसंधान करने का क्रांतिकारी अभियान त्रिवेदी बंधुओं ने शुरू किया। पोषक ऊर्जा से तैयार की गई सर्वपिष्टी का परीक्षण कैंसर के मरणासन्न रोगियों पर किया गया, जिसका परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सफल रहा है। हालांकि यह सब पहली नजर में अविश्वसनीय लगता है। इस कारण विश्वास को जगाने के लिए हर प्रकार से जांचकर तथ्य का पता लगाना जरूरी था कि यह सचमुच वही लोग हैं जो कभी बुरी तरह से कैंसर से ग्रस्त थे। उत्तर प्रदेश के अमेठी में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारी अनिल कुमार श्रीवास्तव के कैंसर होने की पुष्टि टाटा कैंसर अस्पताल, मुंबई ने की थी। वहां उनका छह माह तक कैंसर का इलाज भी हुआ था। जांच के बाद वह ब्लड कैंसर (एक्यूट ल्यूकोमिया) के रोगी पाए गए। टाटा कैंसर अस्पताल के चिकित्सकों ने उनके इलाज की हरसंभव कोशिश की पर जब उनका रोग इतना उग्र हो गया कि बचने की कोई संभावना नहीं बची तो 20 जनवरी, 1992 को अस्पताल से उन्हें मुक्त कर दिया गया। उन्हें डेढ़-दो महीने और जीने की संभावना बताई गई थी, लेकिन किसी के बताने पर जब वह डीएस रिसर्च सेंटर के संपर्क में आए तो उनके घर पर ही सर्वपिष्टी से इलाज शुरू हुआ। आश्चर्यजनक रूप से अनिल के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा और जांच रिपोर्ट से भी इसकी पुष्टि हुई। लगभग चार महीने में जब वह स्वस्थ हो गए तो डीएस रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के सुझाव पर उन्होंने टाटा कैंसर अस्पताल जाकर अपनी जांच कराई 29 मई, 1992 को उन्हें रक्त कैंसर (एक्यूट ल्यूकोमिया) से पूरी तरह मुक्त घोषित किया गया। पिछले 18 वर्षो से अनिल कुमार पूर्ण स्वस्थ हैं और अमेठी स्टेट बैंक में कार्यरत हैं। इसी तरह वाराणसी के कपसेठी की रीता सिंह के ब्रेन ट्यूमर का मामला भी कोई कम विस्मयकारी नहीं है। इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, बीएचयू में जांच के बाद पाया गया कि रीता सिंह के बे्रन में एक ट्यूमर है। वहां समय से ही उनकी चिकित्सा शुरू कर दी गई थी, लेकिन कुछ ही दिन बाद फरवरी 1991 की जांच में पाया गया कि ट्यूमर की संख्या बढ़कर छह हो गई है। रीता की शारीरिक स्थिति भी सोचनीय हो गई और पाचन संस्थान ने भी काम करना बंद कर दिया। शरीर पर स्नायुओं का नियंत्रण नहीं था और आंखों की ज्योति भी चली गई थी। चिकित्सकों की राय से उन्हें लखनऊ में संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती किया गया। न्यूरो सर्जरी विभाग ने (सीआर नं.-47850/91 बायोप्सी नं.-285/91 दिनंाक 18.02.91) रीता सिंह को बाद में डिस्चार्ज कर दिया। कोई चारा नहीं देखकर रीता को घर लाया गया। इसी बीच उनके घर वालों ने डीएस रिसर्च सेंटर से संपर्क किया। उनके साथ एक असुविधा यह थी कि जो रोगी एक चम्मच पानी नहीं ले सकती तो उसे दवा कैसे दी जाती? फिर भी पहले सप्ताह की दवा दे दी गई। पहली खुराक पानी में घोलकर दी गई।। दवा की उल्टी नहीं हुई और दो-तीन खुराक दवा लेने के बाद उल्टियों का सिलसिला बंद हो गया। बाद में रोगी को पानी, फिर फलों का रस और थोड़ा-थोड़ा दूध दिया जाने लगा। एक महीने बाद शरीर पर स्नायुओं का नियंत्रण कायम होने लगा। आंखों की ज्योति लौटी और वह थोड़ा बहुत चलने लगीं। प्रो. त्रिवेदी भी संशकित थे कि दिमाग के भीतर की बात है। उन्होंने रोगी के परिजन अनंत बाबू को अस्पतालों की मदद लेने का सुझाव दिया। पर वह अस्पतालों से पहले ही निराश हो चुके थे इसलिए तय कर लिया था कि अब जो होगा सर्वपिष्टी से ही होगा। बहरहाल तीन महीने बाद जब इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, बीएचयू के अस्पताल में जांच हुई तो पता चला कि तीन ट्यूमर गायब हो गए हैं और शेष तीन का आकार भी छोटा हो गया है। इसके बाद दवा नियमित रूप से चलती रही और रीता सिंह दिन प्रतिदिन सामान्य और स्वस्थ होती गई। रीता सिंह आज भी जिंदा हैं और स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही हैं। डीएस रिसर्च सेंटर के पास ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें कैंसर रोगियों की जांच से यह प्रमाणित कर दिया गया है कि अब कैंसर का इलाज संभव हो गया है। वैज्ञानिकों ने डब्ल्यूएचओ के बाद 2005 में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री को भी 750 रोगियों का पूरा ब्यौरा भेजकर सर्वपिष्टी के परिणामों की जांच कराने की मांग की थी, लेकिन आश्चर्य कि कैंसर की चिकित्सा के इन सफल प्रमाणों की जांच की कोई कोशिश न तो डब्ल्यूएचओ और न ही भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने की। उम्मीद की जाना चाहिए कि सरकार इसे अब गंभीरता से लेगी और जांच कराएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Monday, April 25, 2011
कंप्यूटर, टीवी के सामने घंटों बिताना दिल के लिए खतरनाक
सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक और आकरुट पर चैटिंग करने और वीडियो गेम खेलने के लिए कंप्यूटर या टेलीविजन के सामने घंटों बैठे रहने वाले बच्चों में दिल की बीमारियों के खतरे बढ़ रहे हैं। नए वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जो बच्चे घर के बाहर खेलने-कूदने की बजाय घंटों फेसबुक और आकरुट जैसी सोशल नेटवर्किग साइटों पर चैटिंग करते हैं, वीडियो गेम खेलते हैं अथवा टेलीविजन देखते हैं उनमें बड़े होने पर हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप होने के खतरे कई गुना बढ़ जाते हैं। सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ तथा नोएडा स्थित मेट्रो हार्ट इंस्टीच्यूट के निदेशक पुरुषोत्तम लाल ने बताया कि जो बच्चे खेल-कूद से दूर रहते हैं और लैपटाप, पीसी अथवा टेलीविजन के सामने घंटों बैठे रहते हैं उनकी रक्त धमनियां सिकुड़ जाती है और बाद में उनमें दिल रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। दिल्ली नेत्र विज्ञान सोसायटी (डीओएस) के सचिव डा. अमित खोसला ने बताया कि कंप्यूटर और टेलीविजन के सामने अधिक समय तक बैठे रहने का असर केवल आंखों पर ही नहीं बल्कि हृदय एवं रक्त धमनियों पर पड़ता है। असल में जो बच्चे अपना ज्यादा समय इंटरनेट, कम्पयूटर व टेलीविजन पर बिताते हैं वे खेलने-कूदने में काफी कम समय देते हैं। इस कारण उनकी रक्त नलिकायें अन्य बच्चों की तुलना में अधिक सिकुड़ती हैं और उन्हें बड़े होने पर हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप होने के खतरे अधिक होते हैं। भारतीय मूल के वैज्ञानिक डा. बामिनी गोपीनाथ एवं उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने डेढ़ हजार बच्चों पर अध्ययन करने पर पाया कि जो बच्चे अधिक समय तक घर के बाहर खेलते हैं उनमें रक्त की पतली नलिकाओं की स्थिति उन बच्चों की तुलना में अच्छी होती है जो घर में या तो कंप्यूटर या टेलीविजन के सामने बैठकर गेम खेलते हैं या चैटिंग करते हैं। इस अध्ययन में अधिक देर तक कंप्यूटर पर गेम खेलने या चैटिंग करने वाले छह साल उम्र के बच्चोें की आंखों की रक्त नलिकाओं को संकुचित पाया गया जो कि हृदय रोग के खतरे के बढ़ने का संकेत है। यूनिवर्सिटी आफ सिडनी के सेंटर विजन रिसर्च के वैज्ञानिक डा. गोपीनाथ का कहना है कि बच्चों की अस्वास्थ्यकर जीवनशैली रक्त की पतली नलिकाओं में रक्त संचार पर बुरा प्रभाव डालती है जिससे भविष्य में उन्हें रक्त वाहिका रोग तथा उच्च रक्तचाप होने का खतरा बढ़ता है। दरअसल टेलीविजन देखने अथवा कंप्यूटर पर गेम खेलने या चैटिंग करने से जो नुकसान होता है उससे कहीं अधिक नुकसान घंटों तक बैठे रहने और व्यायाम नहीं करने के कारण होता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि महानगरों एवं बड़े शहरों मे व्यायाम एवं खेल-कूद से दूर होने तथा फास्ट फूड के बढ़ते इस्तेमाल के कारण बच्चे हाइपरटेंशन, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों के तेजी से शिकार हो रहे हैं। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि शहरों में रहने वाले करीब 25 प्रतिशत किशोरों और बच्चों को हृदय रोग का खतरा है। डा. लाल ने बताया कि पिछले कुछ सालों में रहन-सहन एवं खानपान की आदतों में बदलाव तथा बढ़ते तनाव के कारण शहरी बच्चों में मोटापा 20-25 प्रतिशत बढ़ा है जिसके कारण उनमें हृदय रोगहोने के खतरे बढ़े हैं।
'सुपर बग' के जरिये खौफ पैदा करना चाहते हैं ब्रिटिश
ब्रिटिश पत्रिका 'लांसेट' ने भारत के जल में सुपर बग नामक जीवाणु की मौजूदगी बताकर लोगों में भय उत्पन्न करने की कोशिश की है। कुछ वैज्ञानिकों ने भी इसकी मौजूदगी होने की बात कही है। भारत खान- पान की विभिन्न वजहों से पहले ही किस्म-किस्म की बीमारियों से घिरा है। उसमें अब सुपर बग जीवाणु ने आम आदमी को पीने के पानी के प्रति भी सशंकित कर दिया है। हालांकि केंद्र सरकार पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी बताने वाली रिपोर्ट का कड़ा विरोध कर रही है। लगता है कि सुपर बग के नाम से भारत को बदमान करने की कोशिश की जा रही है। इसी के तहत पत्रिका ने इस बीमारी को एन.डी.एम. (न्यू डेल्ही मेटालो-बीटा लैक्टोमेज़) नाम दिया है। आशंका इस आधार पर उठती है कि आखि़र इस ख़तरनाक जीवाणु का नाम नई दिल्ली के नाम पर क्यों किया गया? भले ही इसके पीछे अभी तक कोई तार्किक तथ्य सामने नहीं आये हों पर कुछ संकेत हैं जिनसे मामले को समझा जा सकता है। बहरहाल, स्वास्थ्य सुविधाओं में पिछड़ापन, साफ-सफाई की आदतों की महरूमियत आदि के कारण हिंदुस्तान में जितनी बीमारिया व्याप्त हैं उनकी रिपोर्ट तो विदेशी मीडिया और पत्रिकाएं पहले ही चटखारे लेकर प्रकाशित करती आई हैं। साफ-सफाई के क्षेत्र में हमें विदेशी मुल्क किस श्रेणी में रखते हैं इसका जीवंत उदाहरण तो यही है कि जब हम किसी दूसरे मुल्क की यात्रा करते हैं तो हमें मेडिकल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होते हैं। इस तरह के कई और उदाहरण हमारे पास हैं जिससे हम सचेत हो सकते हैं। फिर भी मैं मानता हूं कि पत्रिका की रिपोर्ट से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि रिपोर्ट कहती है कि सुपरबग का आगमन अगस्त 2010 में हो गया था। बावजूद इसके, इन आठ महीनों में अभी तक इसके दुष्प्रभाव का कोई केस सामने नहीं आया है। इसके विपरीत यह जरूर लगता है कि यह हमारे पर्यटन उद्योग को धक्का लगाने के षड्यंत्र का महज एक हिस्सा हो सकता है ताकि विदेशी भारत की यात्रा न कर सकें। यों, जब से कहा गया है कि दिल्ली के पानी में सबसे ज्यादा सुपर बग की मात्रा है तभी से दिल्ली जल बोर्ड हरकत में आकर इस जीवाणु की ख़्ाोज में जुट गया है। हाल में केंद्र सरकार लांसेट के रिपोर्ट को गलत करार दे चुकी है। इस बीच कतिपय विरोधाभासी बयानों और रिपोर्ट के सच-झूठ की लड़ाई में पानी बेचने वाली कम्पनियों को खूब फायदा हो रहा है। कुछ जगहों पर लोगों ने टोटियों, नलों से पानी पीना बंद कर दिया है और बोतलबंद पानी को अपना लिया है। वे यह पानी खरीदकर पी रहे हैं। इससे एक और आशंका को बल मिलता है कि यह दिल्ली में पेयजल बेचने की किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं है क्योंकि दिल्ली में हर रोज लाखों लीटर बोतलबंद पानी बिकता है और गर्मी में इसकी मांग दोगुने से भी अधिक हो जाती है। फिलहाल, हकीकत कुछ भी हो, हमें इस विषय को गम्भीरता से लेना चाहिए क्योंकि दिल्ली का पानी काफी मटमैला है जिससे कई बीमारियों के होने से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि र्बडफ्लू की बीमारी ने भी इसी तरह की दस्तक दी थी। इस बीमारी ने किस तरह से कहर बरपाया था शायद ही कोई भूल पाए। सुपर बग ने भी अगर इसी तरह से वार किया तो सरकार के सारे दावे उलटे पड़ सकते हैं। सुपरबग संक्रामक रोग फैलाने वाला जीवाणु है। यह शरीर में फैल जाए तो कोई दवा काम नहीं करती है। इसके इलाज का हमारे पास उपाय नहीं है। भविष्य में इस तरीके की कोई घटना हो, इससे बचने के लिए सरकार को पानी के अंदर ऐसे रसायनों का प्रयोग करना चाहिए जो सुपरबग या उस जैसे किसी कीटाणु से लड़ने में सक्षम हों।(श्री खन्ना केंद्रीय जल बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं) -
अल्जाइमर का अंत करेगा टीका
अल्जाइमर (दिमागी बीमारी) को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया टीका ईजाद करने का दावा किया है। यह सिर्फ इस बीमारी को रोकने का काम ही नहीं करेगा बल्कि इसके दोबारा हमले से भी बचाए रखेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि दो साल के भीतर यह बाजार में उपलब्ध होगा। नए टीके पर काम करने वाले वैज्ञानिकों ने हालांकि यह भी कहा है कि बचाव का यह तरीका सौ फीसदी सक्षम नहीं है, मगर अल्जाइमर के इलाज में अब तक की सबसे बड़ी सफलता है। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, इसके मात्र दो टीकों में से एक परीक्षण के अंतिम चरण यानी तीसरे चरण तक पहुंच चुका है। अकेले ब्रिटेन में अल्जाइमर और डिमेंशिया की अन्य किस्मों से करीब आठ लाख लोग प्रभावित हैं। आबादी बढ़ने के साथ यह संख्या दोगुना होने की उम्मीद जताई गई है। मौजूदा दवाएं अल्जाइमर की प्रगति को धीमी कर सकती हैं मगर इससे जूझने में असफल रहती हैं। इसका मतलब यह है कि इसका प्रभाव तेजी से चढ़ता है और जल्द ही यह बीमारी खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है। इसके विपरीत, बापिन्यूजूमैब इंजेक्शन, जिसका दुनियाभर के 10,000 से भी ज्यादा लोगों पर परीक्षण किया जा चुका है, इसे रोकने और यहां तक की एमिलॉयड (मस्तिष्क में अल्जाइमर पनपने में मदद करने वाला विषैला प्रोटीन) को फिर से बनने से रोकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह बीमारी की प्रगति को बेहद तेजी से धीमा कर देता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि अल्जाइमर की प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान करने वाले परीक्षण इंजेक्शन देने का पहला संभावित मौका मुहैया करा सकते हैं। इससे लाखों लोग इस अकाट्य बीमारी के प्रभाव में आने से बच सकेंगे। गौरतलब है कि इस बीमारी के कारण व्यक्ति चलने, बोलने और यहां तक की चबाने तक में असमर्थ हो जाता है और उसे पूरी तरह दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। साउथहैंपटन यूनिवर्सिटी के मेमोरी असेसमेंट एंड रिसर्च सेंटर के डॉ. डेविड विलकिंसन ने कहा कि उम्मीद है कि यह टीका अल्जाइमर के इलाज में बड़ा बदलाव ला देगा। अगर हम इसे मस्तिष्क में ज्यादा क्षति होने से पहले ही दे सकें तो यह बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। 1990 के दशक में अल्जाइमर के टीके पर किए गए कुछ प्रारंभिक शोधों में शामिल रहे डॉ. विलकिंसन ने कहा कि अगर मस्तिष्क में एमिलॉयड के पैच स्पष्ट हो जाएं और हम टीके को बीमारी के शुरुआती अवस्था में ही दे दें तो यह क्षति होने से काफी हद तक बचा सकता है। टीके के जरिए इलाज से बीमारी में होने वाला खर्च भी बहुत कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ब्रिटेन में अल्जाइमर पर हर साल खर्च होने वाले 17 अरब पौंड (करीब 1250 खरब रुपये) का आधा हिस्सा बचाया जा सकता है। इस टीके पर काम कर रहीं तीन दवा कंपनियां अगले साल के अंत तक परीक्षण खत्म होने के बाद इसके बाजार में आने की उम्मीद कर रही हैं। ब्रिटेन और यूरोप के दवा लाइसेंस प्राधिकरणों से इस पर आगे बढ़ने की स्वीकृति मिलने के बाद ही टीके के दाम तय किए जाएंगे।
Saturday, April 23, 2011
Friday, April 22, 2011
ज्यादा टीवी देखने वाले बच्चों में दिल की बीमारी का जोखिम
यदि आपका बच्चा ज्यादा टीवी देखता है या वीडियो गेम खेलता है, तो सावधान हो जाइए क्योंकि नए अध्ययन के अनुसार उसके लिए बाद में हृदय की समस्या का जोखिम बढ़ सकता है। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक की अगुवाई में सिडनी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि छह साल उम्र के जो बच्चे घंटों टीवी पर आंख गड़ाए रहते हैं उनके नेत्र की रक्त कोशिकाएं सिकुड़ती चली जाती हैं जो हृदय बीमारी और उच्च रक्तचाप की पूर्व चेतावनी है। इस अध्ययन में डॉ. बामिनि गोपनी और उनके साथियों ने सिडनी के 34 प्राथमिक स्कूलों के छह से सात साल के 1492 बच्चों का सव्रेक्षण किया। शोधकर्ताओं के अनुसार बच्चे औसतन प्रतिदिन दो घंटे टेलीविजन देखते हैं या कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं तथा केवल 36 मिनट ही शारीरिक अभ्यास करते हैं। उनका कहना है कि जो बच्चे प्रतिदिन एक घंटे शारीरिक अभ्यास करते हैं वे ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। यह अध्ययन अमेरिकी पत्रिका आर्टियोस्लेरोसि, थ्रोम्बोसिस एण्ड वस्कुलर बायलोजी में प्रकाशित हुआ है।
पेट दर्द से आराम दिलाता है पुदीना
पेट दर्द की दवा के तौर पर इस्तेमाल होने के बावजूद अभी तक इसके कोई क्लीनिकल सबूत नहीं मिले थे कि यह दर्द से राहत दिलाने में इतना मददगार कैसे होता है
क्या आप पेट में दर्द या किसी प्रकार के अपच के शिकार हैं तो आपको पुदीना आजमाना चाहिए। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि पुदीना अपच के कारण हुए पेट दर्द या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (आईबीएस) से राहत दिलाने में काफी मददगार होता है। ऐडिलेड यूनिवर्सिटी की अगुवाई में एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन दल ने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार पुदीना मलाशय में एक 'दर्दनिवारक'
चैनल को सक्रि य करता है और किस प्रकार जठरांत्रिय नली में होने वाले जलन पैदा करने वाले दर्द को कम करता है। प्रमुख अध्ययनकर्ता डा. स्टुअर्ट ब्रिरले ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सक सालों से पुदीने को पेट दर्द की दवा के तौर पर मरीजों को देते रहे हैं लेकिन अभी तक इसके कोई क्लीनिकल सबूत नहीं मिले थे कि यह दर्द से राहत दिलाने में इतना मददगार कैसे होता है। उन्होंने बताया,'हमारा शोध दर्शाता है कि पुदीना एक विशेष दर्दनिवारक चैनल के जरिए काम करता है जिसे टीआरपीएम 8 कहा जाता है। पुदीना सरसों और मिर्च के कारण हुए पेट दर्द को विशेष रूप से इन दोनों तत्वों की पहचान कर दर्द को कम करता है। आईबीएस एक जठरांत्रिय विकृति है जिसके चलते पेट में दर्द, पेट फूलना, डायरिया और कब्ज होती है। आईबीएस का कोई उपचार नहीं है और हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी में कभी न कभी इसका सामना करना पड़ता है। जठरांत्रिय और कुछ विशेष खाद्य पदार्थो के प्रति अस्वीकार्यता के अलावा आईबीएस खाद्य विषाक्तता, तनाव, एंटीबायोटिक्स की प्रतिक्रि या और कुछ मामलों में आनुवांशिक भी हो सकता है ।
कैंसर से लड़ता डॉक्टर
कैंसर- ऐसी बीमारी जिसका जिक्र छिड़ते ही इंसान के रोंगटे खड़े हो जाएं और वह दहशत में डूब जाए। आज चिकित्सा विज्ञान ने भले एक से बढ़ कर एक खतरनाक बीमारियों पर काबू पाने का इंतजाम कर लिया हो लेकिन कैंसर रूपी दैत्य से उसकी लड़ाई आज भी जारी है। कैंसर आज तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी के रूप में उभर रहा है। आशंका है कि अगले बीस वर्षो में हर साल सवा करोड़ लोगों की जान इसके हवाले हो चुकेगी। अपने देश में भी यह राक्षस तेजी से पांव पसार रहा है और आशंका है कि केवल दस वर्षो के अंदर हर तीसरा इंसान कैंसर से जान बचाने की मशक्कत कर रहा होगा। दहला देने वाले ऐसे भविष्य से मुकाबले में भारतीय मूल के एक डॉक्टर सिद्धार्थ मुखर्जी ने कैंसर की व्यापक पड़ताल करने वाली एक किताब लिखी है जिसे दुनिया हाथों हाथ ले रही है। 'द इंपेरर ऑफ अॅाल मेलाडीज उर्फ कैंसर की आत्मकथा' नामक इस पुस्तक को इस साल के प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया है। दिल्ली में पैदा मुखर्जी अमेरिका बस चुके हैं जहां एक अस्पताल में वह कैंसर के डॉक्टर हैं। इस जानलेवा बीमारी के इतिहास और वर्तमान की विस्तृत र्चचा के साथ मुखर्जी कैंसर और इंसान के बीच एक सदी से चल रही जंग का ब्योरा देते हुए आश्वस्त करते हैं कि भविष्य में इस राक्षस का अंत तय है। वह बताते हैं कि इस लड़ाई में कैसे कीमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी के हथियार खोजे गए, जिनसे काफी हद तक कैंसर पर अंकुश लगाने में सफलता मिली। कैंसर की भयावहता इसमें है कि इसमें इंसान का शरीर बनाने वाली कोशिकाओं की आंतरिक संरचना ही बदल जाती है और वे निर्माण की जगह विध्वंस करती हुई स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगती हैं। इसलिए अब पूरी खोज इन कैंसर कोशिकाओं के बदले स्वरूप पर केंद्रित है और देखा जा रहा है कि कोशिकाओं के अंदर मौजूद जीन की संरचना किस प्रकार बदल जाती है। इस साल की शुरुआत में बड़ी सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने प्रोस्ट्रेट कैंसर से ग्रस्त रोगियों की कोशिकाओं की बदली जीन संरचना का नक्शा तैयार कर लिया। जीन के बदले व्यवहार की जानकारी मिल जाने के बाद ऐसी दवाएं तैयार की जा सकती हैं जो सीधे कैंसरग्रस्त कोशिकाओं तक पहुंच उन्हें नष्ट कर देंगी। इसमें कीमोथेरेपी के ऐसे जहर की जरूरत नहीं रह जाएगी जो कैंसरग्रस्त ही नहीं बल्कि स्वस्थ कोशिकाओं को भी नष्ट कर देता है और मरीजों पर खतरनाक प्रभाव छोड़ता है। ऐसी जानकारियों के आधार पर ही ग्लोवाक नामक दवा निकली है जो ब्लड कैंसर में जादू जैसा असर करती है। मुखर्जी की यह पुस्तक व्यक्तिगत अनुभवों के अलावा अन्य डॉक्टरों और मरीजों के सतत संघर्ष का जीवंत लेखाजोखा भी प्रस्तुत करती है और कैंसर के ऊपर चढ़े रहस्यात्मक आवरण का पर्दा खोलती है। भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों से चिंतित मुखर्जी इनके मुकाबले के लिए कई उपाय सुझाते हैं। वह तंबाकू के बढ़ते प्रयोग पर अंकुश लगाने के सरकारी और गैर सरकारी अभियानों की जरूरत बताते हैं। सेक्स के जरिए फैलने वाले सर्वाइकल और ओरल कैंसर पर रोक लगाने के लिए सेक्स स्वास्थ्य शिक्षा को घर-घर फैलाने की अहमियत बताते हैं। महिलाओं में तेजी से फैल रहे ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम के लिए बड़े पैमाने पर जांच कायरे और मैमोग्राफी की अहमियत पर जोर देते हैं और लीवर कैंसर पर अंकुश के लिए सशक्त टीकाकरण अभियान चाहते हैं। कैंसर के दैत्य से लड़ाई में सफलता के लिए मुखर्जी को हमारी शुभकामनाएं।
Thursday, April 21, 2011
Wednesday, April 20, 2011
हृदयाघात से होने वाली क्षति रोकेगा इंजेक्शन!
लिसेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय दल ने ऐसा इंजेक्शन बनाया है जो दिल के दौरे और मस्तिष्काघात के 12 घंटे के भीतर दिए जाने पर इनसे हुई क्षति को नियंत्रित करेगा। माना जा रहा है कि यह इंजेक्शन फिलहाल इन बीमारियों से होने वाले नुकसान को आधा कर देगा। प्रोसीडिंग ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की पत्रिका में यह जानकारी प्रकाशित की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंजेक्शन हृदय रोग के इलाज में क्रांति ला देगा। इससे प्रत्यारोपण सर्जरी में भी सहायता मिलेगी। शोधकर्ताओं के मुताबिक, हमने सबसे पहले एमएएसपी-2 नाम के एंजाइम को पहचाना, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का घटक है। इसमें बदलाव इस्केमिया (रक्त प्रवाह और उसमें ऑक्सीजन की कमी) जैसी बीमारी को बढ़ाता है, जो हार्ट अटैक के कारण जान जाने की मुख्य वजह है। दल ने इस एंजाइम को बे-असर करने के लिए एंटीबॉडी इंजेक्शन तैयार करने में सफलता हासिल की है। इस इंजेक्शन का असर जानवरों में पूरी तरह कामयाब रहा है। मुख्य शोधकर्ता विलहेल्म श्वाएबल ने कहा, यह सफलता इस्केमिया और उसके कारण हार्ट अटैक और मस्तिष्काघात के इलाज में नई उपलब्धि साबित हो सकती है। इस नई पद्धति का इस्तेमाल उन जगहों पर भी किया जा सकता है जहां रक्त प्रवाह के अस्थाई अवरोध के कारण खतरा रहता है। शुरू होते ही पता चलेगी टीबी लंदन, एजेंसी : डॉक्टरों ने तपेदिक (टीबी) की जांच की एक नई तकनीक विकसित की है जिससे इस बीमारी के शुरुआत में ही इसकी पहचान की जा सकेगी। भारत, दक्षिण अफ्रीका, पेरू, अजरबैजान, फिलिपींस और युगांडा जैसे तपेदिक प्रभावित देशों के छह हजार 648 लोगों पर किए गए एक्सपर्ट एमटीबी :आरआइएफ नाम की इस जांच के बाद पता चला है कि इससे बीमारी के शुरुआती चरण में ही इसका पता लगाया जा सकता है। अमेरिका के सेफीड इंक और स्विटजरलैंड के फाउंडेशन फॉर इनोवेटिव निउ डाएगनॉस्टिक्स (फाइन्ड) द्वारा विकसित इस नई जांच तकनीक संबंधी रिपोर्ट को दी लैंसेट जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
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