Wednesday, April 20, 2011

मनोरोगों के बढ़ते खतरे


गहरे अवसाद की शिकार अनुराधा और सोनाली का मामला बड़ी खबर बन गया है। अनुराधा तो अंतत: जिन्दगी से हार ही मान गई। इसके पहले दिल्ली में शालिनी मेहरा तथा सुमनलता का केस भी सुर्खियां बना था। शालिनी अपनी मां के मृत शरीर के साथ तीन महीने तक कमरे में बंद रही थी। ये सभी मामले गहरे डिप्रेशन के बताए गए हैं। सनसनी के अन्दाज में सुर्खियां बनती गंभीर अवसाद की इन खबरों से किसी को भ्रम हो सकता है कि हमारे यहां अवसाद की ऐसी घाटनाएं अपवादात्मक ही दिखती हैं लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। ताजा आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 121 करोड़ की आबादी वाले देश में हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मनोविकार का शिकार है। इसी साल फरवरी में भारतीय मनोचिकित्सा सोसायटी के 63 वें सम्मेलन के मौके पर देश भर से मनोचिकित्सक दिल्ली में एकत्र हुए थे। मनोचिकित्सकों ने सरकार के सामने समस्या से निपटने के लिए कुछ सुझाव रखे थे। चिकित्सकों का कहना था कि देश में 15 करोड़ की आबादी किसी न किसी प्रकार के मनोविकार की शिकार है लेकिन उनका इलाज करने के लिए महज चार हजार विशेषज्ञ ही उपलब्ध हैं। इन विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने पर ही जोर दिया गया था। आयोजकों में डॉ सुनील मित्तल का कहना था कि देश में मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र अत्यन्त उपेक्षित है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम 1982 में शुरू हुआ था जिसके तहत हर जिला स्तर पर कम से कम एक मनोचिकित्सक होने की बात कही गयी थी तथा राज्य स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा आयोग के गठन की बात भी हुई थी। सोसायटी के मनोचिकित्सकों ने बताया कि मनोरोगियों के अस्पतालों में न तो एम्बुलेंस सेवा होती है, न ही उन्हें स्वास्थ्य बीमा के दायरे में रखा जाता है। सरकार इस क्षेत्र में शोध के प्रति भी गम्भीर नहीं है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के रिपोर्ट के मुताबिक करीब साढ़े 6 करोड़ मानसिक रोगियों में से 20 फीसद यानी सवा करोड़ डिप्रेशन की चपेट में है। हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट 2010 के मुताबिक भी मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ रही है। मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर आर सी जिलोहा बताते हैं कि ओपीडी अर्थात बाह्य रुग्ण विभाग में आनेवाले 30 से 40 फीसद मामले डिप्रेशन के होते हैं। मानसिक बीमारियों में पहले नम्बर पर डिप्रेशन, दूसरे पर एंक्जाइटी तथा तीसरे पर नशीले पदार्थों की लत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 2008 में इसे विश्व की चौथी बड़ी बीमारी माना था जिसका अनुमान है कि 2020 तक दुनिया भर में दूसरी बड़ी बीमारी हो जाएगी। हमारे समाज में एक तो चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध नहीं है, दूसरे जो निजी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं, वह बहुत महंगी हैं। कई चिकित्सकों की प्राइवेट फीस हजार से तीन हजार तक बतायी जाती है। दूसरे इस समस्या के प्रति समाज में अभी खुलापन भी नहीं है। मनोचिकित्सकों या काउंसलर के पास जाना एक तरह से पागल हो जाने का भय दिखाता है और लोग इससे बचते हैं कि उन्हें कोई केस न मान बैठे। किसी को सलाह देना भी खतरे से खाली नहीं होता कि वह किसी मनोचिकित्सक या साइकियाट्रिस्ट से मिल ले। अवसाद के कारणों पर भी काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन रोजमर्रा के रहन-सहन पर इसका ध्यान नहीं दिया जाता है तथा परिस्थितियां भी ऐसी बन जाती हैं कि व्यक्ति अवसाद में चला जाता है। इंडियन साइकियाट्रिस्ट सोसायटी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक एकान्त अवसाद का प्रमुख कारण है। दिल्ली के बारे में रिपोर्ट बताती है कि यहां 55 फीसद लोगों की सामाजिक भागीदारी शून्य है। इंन्स्टीट्यूट ऑफ हयूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंस के निदेशक डॉ. एनजी देसाई का भी कहना है कि सामाजिक सहभागिता कम होने के कारण लोगों में अवसाद बढ़ रहा है। आमतौर पर यही देखा जाता है कि लोग कमाने और गृहस्थी चलाने में व्यस्त होते हैं। किसी न किसी प्रकार से यह धारणा मजबूत बनायी जाती है कि अपने से और अपने काम से मतलब रखो। सुबह काम पर जाओ और लौट कर घर देखो। घर- बाहर दोनों दायित्वों के कारण अधिकतर महिलाओं की स्थिति और भी बदतर होती है। यही कारण है कि महिलाओं में अवसाद का फीसद अधिक होता है। जहां पुरुषों में यह 13.9 फीसद है वहीं महिलाओं में 16.3 फीसद पाया गया है। हमारे यहां खाने-कमाने के अलावा जिन्दगी में कोई और लक्ष्य तय करने की प्रेरणा परिवारों या शिक्षण संस्थानों से नहीं मिलती। पढ़ाई पर ही अधिकतर जोर होता है। सामाजिक रूप से सक्रिय इन्सान के, जिसने जीवन का कोई उद्देश्य तय किया हो, अवसाद में जाने का खतरा कम होता है बनिस्पत किसी आत्मकेन्द्रित व्यक्ति के। किसी अप्रिय घटना के कारण भी इंसान अवसाद में चला जाता है। ऐसे ही हीन भावना से ग्रस्त होना तथा असफलता का एहसास भी घातक बन जाता है। आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण डिप्रेशन माना जाता है। विश्व में हर साल 85 हजार मौतें डिप्रेशन के कारण हो रही हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि व्यक्ति स्वयं को व्यस्त रखे, स्वयं को सामाजिक गतिविधियों से जोड़े। परिवार में मधुर संबन्ध रखे तथा स्वास्थ्य पर ध्यान दे। अनुराधा और सोनाली की हालत में उनकी निष्क्रियता भी एक कारक था। निर्भरता या निष्क्रियता का भाव व्यक्ति को बेकार होने का एहसास कराता है जो अन्दर से उसे कमजोर बनाता है। जरूरत है ऐसे मनोविकार को ठीक ढंग से समझने बूझने की।

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