ब्रिटिश पत्रिका 'लांसेट' ने भारत के जल में सुपर बग नामक जीवाणु की मौजूदगी बताकर लोगों में भय उत्पन्न करने की कोशिश की है। कुछ वैज्ञानिकों ने भी इसकी मौजूदगी होने की बात कही है। भारत खान- पान की विभिन्न वजहों से पहले ही किस्म-किस्म की बीमारियों से घिरा है। उसमें अब सुपर बग जीवाणु ने आम आदमी को पीने के पानी के प्रति भी सशंकित कर दिया है। हालांकि केंद्र सरकार पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी बताने वाली रिपोर्ट का कड़ा विरोध कर रही है। लगता है कि सुपर बग के नाम से भारत को बदमान करने की कोशिश की जा रही है। इसी के तहत पत्रिका ने इस बीमारी को एन.डी.एम. (न्यू डेल्ही मेटालो-बीटा लैक्टोमेज़) नाम दिया है। आशंका इस आधार पर उठती है कि आखि़र इस ख़तरनाक जीवाणु का नाम नई दिल्ली के नाम पर क्यों किया गया? भले ही इसके पीछे अभी तक कोई तार्किक तथ्य सामने नहीं आये हों पर कुछ संकेत हैं जिनसे मामले को समझा जा सकता है। बहरहाल, स्वास्थ्य सुविधाओं में पिछड़ापन, साफ-सफाई की आदतों की महरूमियत आदि के कारण हिंदुस्तान में जितनी बीमारिया व्याप्त हैं उनकी रिपोर्ट तो विदेशी मीडिया और पत्रिकाएं पहले ही चटखारे लेकर प्रकाशित करती आई हैं। साफ-सफाई के क्षेत्र में हमें विदेशी मुल्क किस श्रेणी में रखते हैं इसका जीवंत उदाहरण तो यही है कि जब हम किसी दूसरे मुल्क की यात्रा करते हैं तो हमें मेडिकल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होते हैं। इस तरह के कई और उदाहरण हमारे पास हैं जिससे हम सचेत हो सकते हैं। फिर भी मैं मानता हूं कि पत्रिका की रिपोर्ट से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि रिपोर्ट कहती है कि सुपरबग का आगमन अगस्त 2010 में हो गया था। बावजूद इसके, इन आठ महीनों में अभी तक इसके दुष्प्रभाव का कोई केस सामने नहीं आया है। इसके विपरीत यह जरूर लगता है कि यह हमारे पर्यटन उद्योग को धक्का लगाने के षड्यंत्र का महज एक हिस्सा हो सकता है ताकि विदेशी भारत की यात्रा न कर सकें। यों, जब से कहा गया है कि दिल्ली के पानी में सबसे ज्यादा सुपर बग की मात्रा है तभी से दिल्ली जल बोर्ड हरकत में आकर इस जीवाणु की ख़्ाोज में जुट गया है। हाल में केंद्र सरकार लांसेट के रिपोर्ट को गलत करार दे चुकी है। इस बीच कतिपय विरोधाभासी बयानों और रिपोर्ट के सच-झूठ की लड़ाई में पानी बेचने वाली कम्पनियों को खूब फायदा हो रहा है। कुछ जगहों पर लोगों ने टोटियों, नलों से पानी पीना बंद कर दिया है और बोतलबंद पानी को अपना लिया है। वे यह पानी खरीदकर पी रहे हैं। इससे एक और आशंका को बल मिलता है कि यह दिल्ली में पेयजल बेचने की किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं है क्योंकि दिल्ली में हर रोज लाखों लीटर बोतलबंद पानी बिकता है और गर्मी में इसकी मांग दोगुने से भी अधिक हो जाती है। फिलहाल, हकीकत कुछ भी हो, हमें इस विषय को गम्भीरता से लेना चाहिए क्योंकि दिल्ली का पानी काफी मटमैला है जिससे कई बीमारियों के होने से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि र्बडफ्लू की बीमारी ने भी इसी तरह की दस्तक दी थी। इस बीमारी ने किस तरह से कहर बरपाया था शायद ही कोई भूल पाए। सुपर बग ने भी अगर इसी तरह से वार किया तो सरकार के सारे दावे उलटे पड़ सकते हैं। सुपरबग संक्रामक रोग फैलाने वाला जीवाणु है। यह शरीर में फैल जाए तो कोई दवा काम नहीं करती है। इसके इलाज का हमारे पास उपाय नहीं है। भविष्य में इस तरीके की कोई घटना हो, इससे बचने के लिए सरकार को पानी के अंदर ऐसे रसायनों का प्रयोग करना चाहिए जो सुपरबग या उस जैसे किसी कीटाणु से लड़ने में सक्षम हों।(श्री खन्ना केंद्रीय जल बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं) -
Monday, April 25, 2011
'सुपर बग' के जरिये खौफ पैदा करना चाहते हैं ब्रिटिश
ब्रिटिश पत्रिका 'लांसेट' ने भारत के जल में सुपर बग नामक जीवाणु की मौजूदगी बताकर लोगों में भय उत्पन्न करने की कोशिश की है। कुछ वैज्ञानिकों ने भी इसकी मौजूदगी होने की बात कही है। भारत खान- पान की विभिन्न वजहों से पहले ही किस्म-किस्म की बीमारियों से घिरा है। उसमें अब सुपर बग जीवाणु ने आम आदमी को पीने के पानी के प्रति भी सशंकित कर दिया है। हालांकि केंद्र सरकार पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी बताने वाली रिपोर्ट का कड़ा विरोध कर रही है। लगता है कि सुपर बग के नाम से भारत को बदमान करने की कोशिश की जा रही है। इसी के तहत पत्रिका ने इस बीमारी को एन.डी.एम. (न्यू डेल्ही मेटालो-बीटा लैक्टोमेज़) नाम दिया है। आशंका इस आधार पर उठती है कि आखि़र इस ख़तरनाक जीवाणु का नाम नई दिल्ली के नाम पर क्यों किया गया? भले ही इसके पीछे अभी तक कोई तार्किक तथ्य सामने नहीं आये हों पर कुछ संकेत हैं जिनसे मामले को समझा जा सकता है। बहरहाल, स्वास्थ्य सुविधाओं में पिछड़ापन, साफ-सफाई की आदतों की महरूमियत आदि के कारण हिंदुस्तान में जितनी बीमारिया व्याप्त हैं उनकी रिपोर्ट तो विदेशी मीडिया और पत्रिकाएं पहले ही चटखारे लेकर प्रकाशित करती आई हैं। साफ-सफाई के क्षेत्र में हमें विदेशी मुल्क किस श्रेणी में रखते हैं इसका जीवंत उदाहरण तो यही है कि जब हम किसी दूसरे मुल्क की यात्रा करते हैं तो हमें मेडिकल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होते हैं। इस तरह के कई और उदाहरण हमारे पास हैं जिससे हम सचेत हो सकते हैं। फिर भी मैं मानता हूं कि पत्रिका की रिपोर्ट से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि रिपोर्ट कहती है कि सुपरबग का आगमन अगस्त 2010 में हो गया था। बावजूद इसके, इन आठ महीनों में अभी तक इसके दुष्प्रभाव का कोई केस सामने नहीं आया है। इसके विपरीत यह जरूर लगता है कि यह हमारे पर्यटन उद्योग को धक्का लगाने के षड्यंत्र का महज एक हिस्सा हो सकता है ताकि विदेशी भारत की यात्रा न कर सकें। यों, जब से कहा गया है कि दिल्ली के पानी में सबसे ज्यादा सुपर बग की मात्रा है तभी से दिल्ली जल बोर्ड हरकत में आकर इस जीवाणु की ख़्ाोज में जुट गया है। हाल में केंद्र सरकार लांसेट के रिपोर्ट को गलत करार दे चुकी है। इस बीच कतिपय विरोधाभासी बयानों और रिपोर्ट के सच-झूठ की लड़ाई में पानी बेचने वाली कम्पनियों को खूब फायदा हो रहा है। कुछ जगहों पर लोगों ने टोटियों, नलों से पानी पीना बंद कर दिया है और बोतलबंद पानी को अपना लिया है। वे यह पानी खरीदकर पी रहे हैं। इससे एक और आशंका को बल मिलता है कि यह दिल्ली में पेयजल बेचने की किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं है क्योंकि दिल्ली में हर रोज लाखों लीटर बोतलबंद पानी बिकता है और गर्मी में इसकी मांग दोगुने से भी अधिक हो जाती है। फिलहाल, हकीकत कुछ भी हो, हमें इस विषय को गम्भीरता से लेना चाहिए क्योंकि दिल्ली का पानी काफी मटमैला है जिससे कई बीमारियों के होने से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि र्बडफ्लू की बीमारी ने भी इसी तरह की दस्तक दी थी। इस बीमारी ने किस तरह से कहर बरपाया था शायद ही कोई भूल पाए। सुपर बग ने भी अगर इसी तरह से वार किया तो सरकार के सारे दावे उलटे पड़ सकते हैं। सुपरबग संक्रामक रोग फैलाने वाला जीवाणु है। यह शरीर में फैल जाए तो कोई दवा काम नहीं करती है। इसके इलाज का हमारे पास उपाय नहीं है। भविष्य में इस तरीके की कोई घटना हो, इससे बचने के लिए सरकार को पानी के अंदर ऐसे रसायनों का प्रयोग करना चाहिए जो सुपरबग या उस जैसे किसी कीटाणु से लड़ने में सक्षम हों।(श्री खन्ना केंद्रीय जल बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं) -
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