सरकारी अस्पतालों जैसी सुविधाएं नहीं, पर होता है करोड़ों का भुगतान
केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं (सीजीएचएस) के एक हजार करोड़ रुपए में से कितना उपचार और कितना निजी अस्पतालों में जाता है यह तो समय बताएगा, फिलहाल इससे ज्यादा चौंकानेवाला तथ्य यह है कि निजी अस्पतालों को लाभ पहुंचाने के लिए सीजीएचएस ने सारे नियम कायदों को शिथिल कर गैरमान्यता प्राप्त अस्पतालों को भी अपने पैनल में शामिल कर लिया है। इतना ही नहीं, ये अस्पताल केंद्र सरकार के भारतीय जन स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) पर भी खरे नहीं हैं और न ही भारतीय गुणवत्ता परिषद से उन्हें 'एनओसी' प्राप्त है। बिना मान्यता के सीजीएचएस के पैनल में शामिल होने वाले ज्यादातर अस्पताल ऐसे हैं जिनके मालिक किसी न किसी राजनीतिक दल या राजनेता से जुड़े हुए हैं। उल्लेखनीय है कि इस समय मेडिकल कालेजों से निकले 24 डाक्टर संसद के दोनों सदनों के सदस्य हैं और दिल्ली सहित कई राज्यों में कई डाक्टर मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक हैं। यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने सब कुछ ताक में रखकर गैरमान्यता प्राप्त अस्पतालों को न केवल सीजीएचएस के पैनल में डाला, बल्कि कई विभागों की आपत्तियों को भी नजरंदाज कर दिया। यह सिलसिला पिछले दो वर्ष से जारी है। इस सबको देखते हुए अस्पतालों को मान्यता देनेवाली एक मात्र संस्था राष्ट्रीय बोर्ड ने स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा है कि यह पूरी तरह से गलत है, क्योंकि वे सरकारी अस्पतालों तक के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं बावजूद इसके इन्हें पैनल में ले लिया गया है। बोर्ड की पहल के बाद सीजीएचएस में हड़कंप मचा हुआ है, क्योंकि गत वर्ष ही इस महकमे का नेतृत्व अतिरिक्त सचिव स्तर के नौकरशाह को दिया गया था, लेकिन सुधार के बजाय हालत और बदतर हो गई। यह भी पता चला है कि सीजीएचएस ने एक अप्रैल से 31 मार्च 2012 तक के लिए उन निजी अस्पतालों को भी अपने पैनल में ले लिया है जहां पर सरकारी अस्पतालों से भी खराब सुविधाएं हैं। बाहर से तो इन अस्पतालों के भवन बिल्कुल पंच तारा होटल जैसे लगते हैं, मगर अंदर मरीजों के बेहतर उपचार के नाम पर कुछ भी नहीं है। इन अस्पतालों में आने वाले मरीजों के बिलों पर करोड़ों रुपए का भुगतान बिना किसी रोक-टोक के किया जाएगा। राजनेताओं, सांसदों और सरकारी महकमे के कार्मिकों को पूरे देश में उपचार देने के लिए केंद्र सरकार सीजीएचएस नामक सरकारी एजेंसी को एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान करती है। इस योजना के दायरे में आने वाले ज्यादातर लाभार्थी सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी अस्पतालों में जाना ज्यादा पसंद करते हैं। इसके लिए उन्हें अपने क्षेत्र की सीजीएचएस डिस्पेंसरी के डाक्टर को 'सेट' करना पड़ता है। उसके रेफर करते ही मरीज सीजीएचएस द्वारा नामित निजी अस्पतालों में जा सकता है। उपचार करने के बाद निजी अस्पताल बिल भेजता है और उसका भुगतान हो जाता है। यह व्यवस्था कोई दस वर्ष पूर्व बड़े निजी अस्पतालों की लॉबी के दबाव के बाद शुरू की गई थी, मगर उस समय चुनिंदा और पूरी तरह से पाक-साफ निजी अस्पतालों को ही पैनल में लिया गया था। धीरे-धीरे जब इन अस्पतालों को करोड़ों रु का भुगतान होने लगा तो अन्य छोटे निजी अस्पतालों ने भी सीजीएचएस को कामधेनु समझ लिया और गैरमान्यता प्राप्त अस्पताल भी उसकी सूची में शामिल हो गए। सीजीएचएस की सूची में सबसे ज्यादा निजी अस्पताल दिल्ली के हैं जिनकी संख्या 92 है। इनमें केवल 10 अस्पताल ही मान्यता प्राप्त हैं जिनमें अपोलो, फोर्टिस, इस्कॉर्ट, मैक्स, मैक्स देविकी, प्राइमस, पारस, मूलचंद व नोएडा का कैलाश अस्पताल शामिल है। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तरांचल व झारखंड में सीजीएएचएस के सभी निजी अस्पताल गैर मान्यता प्राप्त हैं। गैरमान्यता प्राप्त अस्पतालों को सीजीएचएस ने कैसे अपने पैनल में शामिल कर लिया इसके जवाब में यहां के अधिकारी कहते हैं कि अस्पतालों को सूची में शामिल करने के बाद मान्यता लेने का समय दे दिया जाता है जबकि राष्ट्रीय अस्पताल मान्यता बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डा. गिरधर ज्ञानी का कहना है कि गैर मान्यता प्राप्त अस्पतालों को मान्यता लेने के लिए बाध्य करने के बजाय मंत्रालय उनके मान्यता लेने संबंधी समय में विस्तार करता रहता है। यह गलत है। मान्यता लेने के लिए पूरे देश में आवेदन करने वाले अस्पतालों की संख्या 405 है जबकि पहले यह संख्या ज्यादा थी। अभी हाल में 8 निजी अस्पतालों को मान्यता दी गई है।
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