Monday, April 11, 2011

सुपर बग के बहाने फिर साजिश


ब्रिटिश वैज्ञानिक शोध पत्रिका द लांसेट को सुपरबग मामले में भारत सरकार से माफी मांगे हुए अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं कि उसने फिर एक नया शिगूफा छोड़ दिया है। इस मर्तबा लांसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कुछ विशेषज्ञों ने दावा किया है कि राजधानी दिल्ली के पानी में ऐसा सुपरबग है, जिस पर दुनिया भर की किसी एंटीबायोटिक का कोई असर नहीं पड़ता। इस रिपोर्ट में कथित विशेषज्ञों के हवाले से यह भी कहा गया है कि आदमी की जान के लिए खतरनाक एनडीएम-1 सुपरबग दिल्ली की फिजा में मौजूद है और इसके पूरी दुनिया में फैल जाने की आशंका है। जाहिर है, शोधकर्ताओं के इस विवादास्पद निष्कर्ष पर भारत सरकार ने अपना कड़ा रुख दिखलाया है। स्वास्थ मंत्रालय के आला अफसरों और हमारे वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में मुल्क की छवि खराब करने वाली इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए बेबुनियाद और झूठी बतलाया है। उन्होंने इस बात का पुरजोर खंडन किया है कि दिल्ली के पानी या वातावरण में जो बैक्टीरिया मौजूद है, वह इंसानी सेहत के लिए खतरनाक है। गौरतलब है कि कार्डिफ यूनिवर्सिटी के टिमोथी वॉल्स और डॉ. मार्क टॉलेमान की यह विवादास्पद शोध रिपोर्ट 7 मार्च को लांसेट के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शोधकर्ताओं ने मध्य दिल्ली के 12 किलोमीटर के दायरे में पानी के नमूने लिए और उनकी जांच की। इसमें सार्वजनिक नलों से भी पानी लिया गया और जगह-जगह जमा गंदे पानी के भी नमूने लिए गए। शोधकर्ताओं ने दावा किया कि चार फीसदी नल के पानी और 30 फीसदी गंदे पानी के बैक्टीरिया में एनडीएम-1 जीन थे। और यह वही जीन हैं, जो व्यापक तौर से इस्तेमाल में लाए जाने वाले एंटीबायोटिक्स का प्रतिरोध पैदा करते हैं। इसके अलावा इसमें ऐसे बैक्टीरिया भी पाए गए, जो हैजा और दस्त की बीमारी पैदा करते हैं। शोधकर्ताओं ने इसके लिए पानी की अपर्याप्त सफाई और पानी में लगातार गंदे पानी के मिश्रण मिलने को जिम्मेदार ठहराया। बहरहाल, इस सनीसनीखेज रिपोर्ट में कही गई बातों के लिए शोधकर्ताओं ने न तो क्लीनिकल सबूत दिए और न ही महामारी विज्ञान के जरिए कुछ साबित किया, जबकि एक बड़े तबके या मुल्क की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली इस तरह की रिपोर्ट में इन सब बातों का खास तौर से ध्यान रखा जाता है। यही नहीं, कानूनी तौर पर जब भी कोई मुल्क से बाहर का शोधकर्ता अपने यहां जैविक पदार्थ ले जाता है तो उसे सबसे पहले इसकी इजाजत संबंधित सरकार से लेना होती है, लेकिन इस पूरे मामले में न तो भारत सरकार को सूचित किया गया और न ही किसी लोकल एजेंसी को अपने साथ लिया गया। सैंपल कहां से लिए गए गोया कि यह भी शक के दायरे में है। एक बात और, यह रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली के पानी में सुपरबग है! लेकिन इस सुपर बग का पूरे मुल्क में कहीं भी कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता। और न ही अभी तक कोई ऐसा मामला सामने निकलकर आया है यानी पूरा ही मामला दुष्प्रचार से प्रेरित लगता है। मेडिकल और टूरिज्म के क्षेत्र में दिन पर दिन आगे बढ़ती देश की राजधानी दिल्ली के खिलाफ यह दुष्प्रचार के सिवाय कुछ नहीं है। इस तरह की रिपो‌र्ट्स एक खास मकसद से प्रकाशित होती हैं, जिनका मकसद किसी मुल्क की छवि को पूरी दुनिया भर में धूमिल करना होता है। बीते साल भी लांसेट ने पश्चिमी मुल्कों में पैदा हुए सुपरबग को जान बूझकर नई दिल्ली से जोड़ा था। उस वक्त भी लांसेट ने अपनी तथाकथित शोध रिपोर्ट में यह दावा किया था कि स्वास्थ के लिए खतरनाक सुपरबग नाम का बैक्टीरिया भारत में पैदा हुआ है और यह बैक्टीरिया पूरी दुनिया में फैल सकता है, लेकिन बाद में जाकर यह पूरी रिपोर्ट झूठ का पुलिंदा साबित हुई और इसके लिए लांसेट ने बकायदा भारत से माफी भी मांगी। लांसेट इस बात से कोई सबक लेती, इसके उलट उसने एक बार फिर अपने यहां ऐसी ही एक रिपोर्ट दोबारा प्रकाशित कर दी, जो भारत की आबो-हवा पर सवालिया निशान लगाती है। दरअसल, दिल्ली के पानी में सुपरबग बताने वाली लांसेट की यह विवादास्पद रिपोर्ट हो या उसकी पूर्व रिपोर्ट, दोनों ही रिपो‌र्ट्स तथ्यों से खिलवाड़ कर जान-बूझकर गढ़ी गई हैं। इन रिपो‌र्ट्स के पीछे एक साजिश काम कर रही है, जिसका मकसद मुल्क को पूरी दुनिया में बदनाम करना है। एनडीएम-1 सुपरबग का हौव्वा खड़ा कर मेडिकल टूरिस्टों और दीगर टूरिस्टों को दिल्ली आने से रोकना है। भारत में बढ़ती स्वास्थ पर्यटन की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए पश्चिमी मुल्क और वहां की साइंस पत्रिकाएं इस तरह के शिगूफे आए-दिन छोड़ते रहते हैं, जिससे वहां के लोग भारत में इलाज के लिए न जाएं यानी विशुद्ध रूप से देखा जाए तो यह पूरा मामला व्यावसायिक हितों का है। करोड़ों-अरबों रुपये के हो चुके स्वास्थ व्यवसाय पर एकाधिकार का है। बीते कुछ सालों में हमारा मुल्क चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में एक वैश्विक ताकत के रूप में उभरा है। हर साल तकरीबन 11 लाख मेडिकल टूरिस्ट भारत आते हैं। यह आंकड़ा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। बूमिंग मेडिकल टूरिज्म इन इंडिया रिपोर्ट 2009 कहती है कि साल 2012 में मेडिकल टूरिज्म के क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी 2.4 फीसदी होगी और यह कारोबार सालाना 27 फीसदी के हिसाब से बढ़ेगा। कुल मिलाकर यह सब बाते हैं, जो आज-कल पश्चिमी मुल्कों को लगातार बैचेन कर रही हैं। यह सिलसिला यों ही आगे बढ़ा तो मेडिकल का बहुत बड़ा धंधा पश्चिम की पकड़ से निकल जाएगा। पश्चिमी मुल्कों का यही वह डर है, जो लांसेट जैसी उनकी पत्रिकाओं में जब-तब मुख्तलिफ रिपो‌र्ट्स के जरिए अभिव्यक्त होता रहता है। लांसेट की हालिया शोध रिपोर्ट न सिर्फ मेडिकल, बल्कि हमारे पूरे टूरिज्म को प्रभावित करने की एक चाल है। हमारे मुल्क के साथ लांसेट पहले भी यह गंदी हरकत कर चुकी है और अब उसने दूसरी बार अपनी यह घृणित हरकत दोहराई है। अगर पिछली बार ही हमारी हुकूमत ने लांसेट के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई कर दी होती तो वह अपनी उस गलती को दोबारा दोहराने की हिम्मत नहीं करती। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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