Friday, April 22, 2011

कैंसर से लड़ता डॉक्टर

कैंसर- ऐसी बीमारी जिसका जिक्र छिड़ते ही इंसान के रोंगटे खड़े हो जाएं और वह दहशत में डूब जाए। आज चिकित्सा विज्ञान ने भले एक से बढ़ कर एक खतरनाक बीमारियों पर काबू पाने का इंतजाम कर लिया हो लेकिन कैंसर रूपी दैत्य से उसकी लड़ाई आज भी जारी है। कैंसर आज तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी के रूप में उभर रहा है। आशंका है कि अगले बीस वर्षो में हर साल सवा करोड़ लोगों की जान इसके हवाले हो चुकेगी। अपने देश में भी यह राक्षस तेजी से पांव पसार रहा है और आशंका है कि केवल दस वर्षो के अंदर हर तीसरा इंसान कैंसर से जान बचाने की मशक्कत कर रहा होगा। दहला देने वाले ऐसे भविष्य से मुकाबले में भारतीय मूल के एक डॉक्टर सिद्धार्थ मुखर्जी ने कैंसर की व्यापक पड़ताल करने वाली एक किताब लिखी है जिसे दुनिया हाथों हाथ ले रही है। 'द इंपेरर ऑफ अॅाल मेलाडीज उर्फ कैंसर की आत्मकथा' नामक इस पुस्तक को इस साल के प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया है। दिल्ली में पैदा मुखर्जी अमेरिका बस चुके हैं जहां एक अस्पताल में वह कैंसर के डॉक्टर हैं। इस जानलेवा बीमारी के इतिहास और वर्तमान की विस्तृत र्चचा के साथ मुखर्जी कैंसर और इंसान के बीच एक सदी से चल रही जंग का ब्योरा देते हुए आश्वस्त करते हैं कि भविष्य में इस राक्षस का अंत तय है। वह बताते हैं कि इस लड़ाई में कैसे कीमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी के हथियार खोजे गए, जिनसे काफी हद तक कैंसर पर अंकुश लगाने में सफलता मिली। कैंसर की भयावहता इसमें है कि इसमें इंसान का शरीर बनाने वाली कोशिकाओं की आंतरिक संरचना ही बदल जाती है और वे निर्माण की जगह विध्वंस करती हुई स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगती हैं। इसलिए अब पूरी खोज इन कैंसर कोशिकाओं के बदले स्वरूप पर केंद्रित है और देखा जा रहा है कि कोशिकाओं के अंदर मौजूद जीन की संरचना किस प्रकार बदल जाती है। इस साल की शुरुआत में बड़ी सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने प्रोस्ट्रेट कैंसर से ग्रस्त रोगियों की कोशिकाओं की बदली जीन संरचना का नक्शा तैयार कर लिया। जीन के बदले व्यवहार की जानकारी मिल जाने के बाद ऐसी दवाएं तैयार की जा सकती हैं जो सीधे कैंसरग्रस्त कोशिकाओं तक पहुंच उन्हें नष्ट कर देंगी। इसमें कीमोथेरेपी के ऐसे जहर की जरूरत नहीं रह जाएगी जो कैंसरग्रस्त ही नहीं बल्कि स्वस्थ कोशिकाओं को भी नष्ट कर देता है और मरीजों पर खतरनाक प्रभाव छोड़ता है। ऐसी जानकारियों के आधार पर ही ग्लोवाक नामक दवा निकली है जो ब्लड कैंसर में जादू जैसा असर करती है। मुखर्जी की यह पुस्तक व्यक्तिगत अनुभवों के अलावा अन्य डॉक्टरों और मरीजों के सतत संघर्ष का जीवंत लेखाजोखा भी प्रस्तुत करती है और कैंसर के ऊपर चढ़े रहस्यात्मक आवरण का पर्दा खोलती है। भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों से चिंतित मुखर्जी इनके मुकाबले के लिए कई उपाय सुझाते हैं। वह तंबाकू के बढ़ते प्रयोग पर अंकुश लगाने के सरकारी और गैर सरकारी अभियानों की जरूरत बताते हैं। सेक्स के जरिए फैलने वाले सर्वाइकल और ओरल कैंसर पर रोक लगाने के लिए सेक्स स्वास्थ्य शिक्षा को घर-घर फैलाने की अहमियत बताते हैं। महिलाओं में तेजी से फैल रहे ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम के लिए बड़े पैमाने पर जांच कायरे और मैमोग्राफी की अहमियत पर जोर देते हैं और लीवर कैंसर पर अंकुश के लिए सशक्त टीकाकरण अभियान चाहते हैं। कैंसर के दैत्य से लड़ाई में सफलता के लिए मुखर्जी को हमारी शुभकामनाएं।


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