Wednesday, April 13, 2011

नई महामारी एमडीआर टीबी


हम सभी जानते हैं कि टीबी सदियों से मानव जाति के लिए अभिशाप की तरह रही है। जहां तक चिकित्सा इतिहास पर नजर जाती है, वहां तक टीबी के प्रमाण मौजूद हैं और शायद टीबी आज तक पता चली बीमारियों में सबसे पुरानी है। वेदों में भी टीबी के प्रमाण मौजूद हैं जिनमें इसे 'राजयक्ष्मा' अर्थात शरीर को गलाने वाला कहा गया है। चरक संहिता में भी इसे 'यक्ष्मा' कहा गया है। इसे 'कैप्टन ऑफ मैन ऑफ डेथ' कहा जाता है। पहले टीबी का कोई कारगर इलाज नहीं था। उस समय अच्छे खानपान और शुद्ध वातावरण के द्वारा इसका इलाज करने का प्रयास किया जाता था। परंतु जैसे-जैसे आधुनिक दवाइयों का आविष्कार हुआ, इसका इलाज संभव माना जाने लगा। सबसे पहले 1944 में 'स्ट्रेप्टोमाइसिन' व उसके उपरांत 'आइसोनिया जाइड' (1952) के ईजाद के उपरांत धीरे-धीरे और अच्छी दवाइयां उपलब्ध होती गई और एक समय ऐसा आया जब यह समझा जाने लगा कि टीबी का इलाज पूर्णतया किया जा सकता है परंतु टीबी के कीटाणु में दवाइयों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने की क्षमता होती है। इसके कारण, ड्रग रेजिस्टेंट टीबी का फैलाव शुरू हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दो अरब अर्थात विश्व की जनसंख्या के एक-तिहाई लोग टीबी के बैक्टीरिया से ग्रसित हैं व दस में से एक व्यक्ति जो टीबी बैक्टीरिया से ग्रसित है, अपने जीवन काल में टीबी की बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। 2008 में 94 लाख नए टीबी के रोगी उत्पन्न हुए और 18 लाख की मौत टीबी से हुई। ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के आने से स्थिति और भी विकट हो गई। 100 में से पांच प्रतिशत टीबी के रोगी एमडीआर टीबी से ग्रस्त हैं। 100 देशों में किए गए सव्रेक्षण के मुताबिक, 2007 में पांच लाख नए एमडीआर टीबी के मरीज पैदा हुए, उनमें से 27 देश 85 प्रतिशत एमडीआर टीबी अपने में समेटे हुए हैं। विश्व के पांच देश, जिनमें सर्वाधिक एमडीआर टीबी के मरीज हैं, उनमें भारत, चीन, रूस, साउथ अफ्रीका एवं बांग्लादेश हैं। सालाना 1.31 लाख नए एमडीआर टीबी के मरीज देश में होते हैं। भारत में सर्वाधिक एमडीआर टीबी के मरीज हैं। ड्रग रेजिस्टेंट टीबी मानव द्वारा स्वत: बनाई हुई परेशानी है। यदि टीबी का सही इलाज व सही समय तक संपूर्ण इलाज किया जाए तो ड्रग रेजिस्टेंस से कारगर ढंग से बचा जा सकता है। ड्रग रेजिस्टेंट टीबी होने के मुख्य कारण हैं- सही दवाइयों का इस्तेमाल न होना व गलत दवाइयों का लम्बे समय तक उपयोग। दवाइयों का प्रयोग यदि अनियमित तरीके से किया जाए। दवाइयां मरीज के शारीरिक वजन के मुताबिक न होकर कम मात्रा में चलाई गई हों। सही समय तक पूरा कोर्स न किया गया हो। खराब गुणवत्ता वाली टीबी की दवाइयों का उपयोग करना।
हम ड्रग रेजिस्टेंट से निम्न प्रकार से बच सकते हैं-
लोगों में जागरूकता और ज्ञान पैदा करके। सही प्रकार की टीबी का इलाज व सही दवाइयां देकर। मरीजों को दवा सही प्रकार से खाने की हिदायत देकर। पूरा कोर्स सही तरीके से करके। सही दवाइयों का प्रयोग उचित रूप से प्रशिक्षित चिकित्सक से कराकर। साधारण टीबी व ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के इलाज में काफी फर्क होता है। टीबी की सबसे अच्छी दवाइयां 'फस्र्ट लाइन ड्रग्स' अर्थात प्रारंभिक दवाइयां होती हैं। साधारण टीबी के इलाज में मुख्य 4 मुख्य दवाओं का प्रयोग सामान्यतया छह महीने के लिए किया जाता है। जिन मरीजों ने पहले इलाज लिया है और उन्हें उनसे ज्यादा फायदा नहीं हुआ या दोबारा टीबी हो गई है, उन्हें एक इंजेक्शन व 4 दवाइयों के प्रयोग से आठ से नौ महीने के इलाज द्वारा ठीक किया जा सकता है। यदि टीबी ड्रग रेजिस्टेंट प्रकार की है तो इलाज में दवाइयों की संख्या बढ़ानी पड़ती है। दवाइयां ज्यादा साइड इफेक्ट वाली होती हैं व इलाज की सीमा भी बढ़ानी पड़ती है। इस समय एमडीआर टीबी का इलाज करीब 2 साल का होता है, जिसमें करीब छह से नौ महीने तक इंजेक्शन रोजाना लगवाना पड़ता है। इन दवाइयों से मरीज को और भी ज्यादा साइड इफेक्ट का सामना करना पड़ता है। इलाज भी काफी महंगा पड़ता है। अत: बचाव ही बेहतर है।
ड्रग रेजिस्टेंट टीबी कई तरह की होती हैं-
मोनो ड्रग रेजिस्टेंट - टीबी की उपलब्ध सभी दवाइयों में से किसी एक दवा से प्रतिरोधक क्षमता का होना। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट - टीबी की 2 मुख्य दवाइयां जिन्हें क्रमश: 'रिफेम्पसिन' 'आइसोनियाइज्ड' कहते हैं। इन दोनों से एक साथ रेजिस्टेंट होना। पॉली ड्रग रेजिस्टेंट - 'रिफेम्पसिन' 'आइसोनियाजाइड' से एक साथ रेजिस्टेंट न होकर टीबी की किन्हीं 2 या 2 से अधिक दवाइयों से रेजिस्टेंट होना। एक्सडीआर टीबी - 'एमडीआर टीबी के साथ-साथ टीबी की अन्य दवाओं- जै से इंजेक्शन (केनामाइसिन, एमिकासिन या केपरियोमाइसिन) और क्वीनो लोन दवाइयों (जैसे सिप्रोफ्लाकसेसिन, ओफ्लाकसेसिन या लिवोफ्लाकसेसिन) से भी रेजिस्टेंट होना। टीडीआर टीबी - जिसमें टीबी सभी उपलब्ध दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है।


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