Sunday, April 3, 2011

दिमाग बना एचआइवी का सुरक्षित घर


अक्सर युद्ध में दुश्मन अपने लिए कोई सुरक्षित स्थान खोज लेता है, जहां उस पर वार नहीं किया जा सकता। फिर मौका देख कर वह बाहर निकलता है और हमला कर देता है। एड्स पीडि़त शरीर में भी दवा और एचआइवी के बीच कुछ ऐसी ही जंग होती है। अनुसंधान कहता है कि जब एड्स ग्रसित मरीज का उपचार होता है, तो दवा के असर से एचआइवी खत्म होने के बजाए दिमाग में जाकर छिप जाते हैं और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करते रहते हैं। यही वजह है कि अब तक एड्स जानलेवा बनी हुई है। विज्ञानियों ने ऐसी दवा जरूर बना ली है जिससे एचआइवी के बढ़ने के क्रम को रोका जा सका है, लेकिन दिमाग में छिपे एचआइवी का शिकार करने वाली दवा अभी तक विकसित नहीं हो सकी है। इस दिशा में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक अब ऐसी ही दवा बनाने में जुटे हैं, जो दिमाग में जाकर एचआइवी को खत्म कर सके। ऐसे एक प्रोजेक्ट में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ.आरके सिंह भी काम कर रहे हैं। डॉ.सिंह कहते हैं कि हमने लीड कंपाउंड विकसित किया है, जो एड्स की असरदार दवा बनाने में सक्षम प्रतीत हो रहा है। प्रयोगशाला स्तर पर मानव शरीर की एक कोशिका पर अनुसंधान किया गया, जिसमें सकारात्मक परिणाम मिले हैं। उन्होंने बताया कि दिमाग और शरीर के बीच एक मेंबरेन होती है, जो हर दवा को दिमाग में नहीं जाने देती। यह हार्ड दवा को जाने से तो रोक देती है, लेकिन एचआइवी को शरीर में वापस आने से नहीं रोक पाती। डॉ.सिंह ने बताया कि जो लीड कंपाउंड विकसित किया गया उससे उम्मीद की किरण जगी है। अब इस कंपाउंड का प्रयोग जल्द ही चूहों और बंदरों पर किया जाएगा और अंत में मानवीय शरीर पर इसका प्रयोग होगा, जिसके बाद यह दवा रूप में एड्स पीडि़त रोगियों को दी जाएगी।


No comments:

Post a Comment