Monday, February 28, 2011

इलाज कराना हुआ और महंगा


 महंगे इलाज से कराह रहे लोगों का बीमारियों पर खर्च और बढ़ जाएगा। किसी भी तरह की पैथोलॉजिकल जांच करवाने पर अब मरीज को पांच फीसदी का सेवा कर देना होगा। इसी तरह 25 से ज्यादा बिस्तर वाले प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवाने पर भी सरकार इतना ही कर वसूलेगी। हालांकि स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी सुविधाओं को मजबूती देने के प्रयास भी बजट में किए गए हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वास्थ्य क्षेत्र पर केंद्र के खर्च को 20 फीसदी बढ़ाकर इसे 26,700 करोड़ रुपये करने का एलान किया है। इसका फायदा खास तौर पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) को हो सकेगा, लेकिन सभी तरह की पैथोलॉजिकल जांच को सेवा कर के दायरे में लाए जाने से आम लोगों की जेब पर पड़ने वाला बोझ बढ़ जाएगा। डॉ. लाल पैथ लैब के सीएमडी अरविंद लाल कहते हैं कि आधुनिक चिकित्सा में 70 फीसदी फैसले इन जांच के आधार पर ही लिए जाते हैं। ऐसे में यह कदम बिल्कुल निराशाजनक है। इसी तरह सरकारी अस्पतालों में जगह की कमी को देखते हुए गंभीर बीमारियों के मरीजों को भी प्राइवेट अस्पतालों में ही जाना होता है। ऐसे में यहां लगाए गए पांच फीसदी सेवा कर का बोझ भी आम लोगों पर पड़ेगा। जीएम मोदी अस्पताल के निदेशक डॉ. विनय लजारुज कहते हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र को तो आइटी की तरह ढांचागत क्षेत्र घोषित कर इसे बढ़ावा देना चाहिए था। खास कर कैंसर जैसी बीमारियों के मरीजों के लिए तो यह और जानलेवा साबित होगा|

सिगरेट-गुटखा के खिलाफ डॉक्टर लामबंद


 देश भर के 16 प्रमुख कैंसर अस्पतालों के डॉक्टरों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर गुटखा, खैनी और सिगरेट आदि तंबाकू उत्पादों की बिक्री तुरंत रोकने की अपील की है। इनका कहना है कि अगर तत्काल यह कदम नहीं उठाया गया तो देश में कैंसर के मरीजों का इलाज कर पाना मुमकिन नहीं रह जाएगा। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, पटना के निदेशक डॉ. अरुण कुमार कहते हैं, रोजाना लोगों को अपाहिज और उनके परिवार वालों को निराश्रित होता देखता हूं। ऐसे में चुप कैसे रहा जाए। ..मैंने पूरी उम्मीद के साथ यह चिट्ठी लिखी है कि सरकार इस पर कदम उठाएगी। कुमार कहते हैं कि भारत एक प्रजातंत्र है और आज यह जनभावना बहुत मजबूत हुई है। इसलिए सरकार यह कदम उठाने से बच नहीं सकती। क्षेत्रीय कैंसर अस्पताल,अगरतला के चिकित्साधीक्षक डॉ. गौतम मजूमदार इसे उत्तर-पूर्व के राज्यों की सेहत के साथ ही लोक संस्कृति के लिए भी बेहद खतरनाक बताते हैं। उनके मुताबिक, तंबाकू उत्पादों की खुली बिक्री की कतई इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। शराब की तरह कम से कम खुले बाजार में तो इसकी बिक्री रोकी ही जा सकती है। गुजरात कैंसर और शोध संस्थान के निदेशक पंकज शाह अपने अस्पताल के रिकार्ड के हवाले से बताते हैं कि दो दशक पहले तक गले का कैंसर सबसे अधिक होता था लेकिन अब गुटखे की वजह से मुंह का कैंसर सबसे ज्यादा हो रहा है। बी बरुआ कैंसर संस्थान, गुवाहाटी के निदेशक डॉ. ए.सी. कटकी कहते हैं कि सिर्फ इस छोटे से प्रदेश में 6.5 लाख पुडि़या गुटखा और 3.2 लाख पैकेट सिगरेट बिक रही है, जो बताता है कि यह लत कितनी खतरनाक हो चुकी है। डॉ. पंकज चतुर्वेदी कहते हैं यह अच्छा है कि हम डॉक्टर, जिनकी पहचान सिगरेट के जुड़ गई थी वो आज तंबाकू के खिलाफ इकट्ठा हो रहे हैं। पीएम और स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखने वालों में कैंसर के सबसे बड़े अस्पताल टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुंबई के निदेशक राजन बडवे के अलावा बीकानेर, अहमदाबाद, रोहतक, नागपुर, कोलकाता, चेन्नई, ग्वालियर, बेंगलूरू, हैदराबाद, रायपुर, कटक और त्रिवेंद्रम के कैंसर अस्पतालों के निदेशक भी शामिल हैं|

Friday, February 25, 2011

हेपेटाइटिस सी से अब काहे का दर, आ गया नया टीका


सेहत की चिंताजनक तस्वीर


भारत में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर लेखिका की टिप्पणी
हाल ही में विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया में सेहत के संकट पर जो रिपोर्ट जारी की है वह भारत और दक्षिण एशियाई देशों में कैंसर हृदयरोग, डायबिटीज जैसे रोगों की काफी चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि सन 2030 तक भारत में हृदय रोग मौत का सबसे बड़ा कारण होगा। उच्च रक्तचाप के मरीज अगले पंद्रह साल में लगभग दोगुने हो जाएंगे। ये आंकडे भारत के अस्वस्थ होने की आशंका जता रहे हैं परंतु सत्य तो यह है कि भारतीय अस्वस्थ हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि हर सात मिनट में एक भारतीय महिला की मृत्यु प्रसव के दौरान अथवा गर्भावस्थाकाल में हो जाती है। बाल व मातृ मृत्यु दर के मामले में भारत संपूर्ण विश्र्व में सबसे आगे हैं। विश्र्व जनसंख्या में 16.3 प्रतिशत भागीदारी निभाने वाला भारत विश्र्व की बीमारियों में 20 प्रतिशत का योगदान देता है। श्र्वास संबंधी रोग, तपेदिक, अतिसार, बैक्टीरिया जनित बीमारियों के साथ-साथ प्रसव संबंधी समस्याओं से त्रस्त लोगों की संख्या भारत में एक-तिहाई है। देश में लगभग 32 करोड़ महिलाएं प्रजनन संबंधी रोगों से ग्रस्त हैं। एक अनुमान के मुताबिक 27 करोड़ महिलाएं प्रीमेंस्टुअल सिंड्रोम से पीडि़त हैं। गांवों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाली 40 प्रतिशत महिलाओं को ल्युकोरिया अल्सर और गर्भाशय कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों ने घेर रखा है। एनएफएचएस के आंकडे़ बताते हैं कि 56.1 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है, जिसका नतीजा गर्भकाल में 20 प्रतिशत से ज्यादा मृत्यु, समय पूर्व शिशुओं के जन्म में तीन गुना वृद्धि तथा नौ गुना अधिक प्रसव पूर्व मृत्यु के मामलों के रूप में सामने आता है। इसके अलावा शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित तथा लाइलाज जन्मजात बीमारियों से पीडि़त बच्चों का जन्म भी इसी समस्या की देन है। यूनिसेफ की रिपोर्ट द स्टेट ऑफ एशिया पेसिफिक्स चिल्ड्रेन, के अनुसार भारत में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की मृत्यु विश्व में सबसे अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों में अमीरों और गरीबों के मध्य गहरी खाई चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। आर्थिक स्तर पर बढ़ता यह अंतर माताओं एवं बच्चों के लिए घातक हो गया है। यही कारण है कि बीमारियों की चपेट में अधिकतर वे लोग आते हैं जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं। यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट न्यूमोनिया द फारगोटन किलर ऑफ चिल्ड्रेन से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में प्रति वर्ष लगभग 4.4 करोड़ न्यूमोनिया के मामले सामने आते हैं। भारत दुनिया के उन चार मुख्य देशों में शामिल है जहां पोलियों के मरीज पाए जाते है। अस्वस्थ भारत के पीछे मूलभूत कारण स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कमी है। अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद देश के सरकारी अस्पतालों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। भारत अभी भी बाल मृत्यु दर कम करने के लिए निर्धारित किए गए विभिन्न सहस्राब्दि स्वास्थ्य लक्ष्यों, एमडीजी-1 (पोषण व आहार के स्तर को सुधारने के लिए तय किया गया लक्ष्य), एमडीजी-5 (माताओं के स्वास्थ्य स्तर को उठाने के लिए निर्धारित लक्ष्य) हासिल करने में कई विकासशील देशों, यहां तक कि श्रीलंका जैसे देश से भी पीछे है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को लागू हुए पांच वर्ष बीत गए, लेकिन अभी तक एक लाख आबादी के लिए स्थापित सामुदयिक स्वास्थ्य केंद्रों में 50 से 60 प्रतिशत विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। चिकित्सा सेवा में कमी ही नहीं बल्कि देश में आर्थिक, जातीय, क्षेत्रीय और शैक्षिणक असमानता व लैंगिक विभेद संकीर्ण विचाधारा भी है। देश की अवस्था का कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की हालत में सुधार के लिए केंद्र द्वारा पूर्व में किए गए प्रयासों का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला है। (लेखिक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

कोका कोला से मुआवजे के लिए बिल पारित


केरल विधानसभा ने शीतल पेय बनाने वाली कंपनी कोका कोला के प्लाचीमाडा संयंत्र से प्रभावित लोगों को मुआवजा दिलाने के लिए कमर कस ली है। मुआवजे के लिए एक विशेष न्यायाधिकरण गठित करने को लेकर गुरुवार को एक विधेयक पारित किया गया। विशेष न्यायाधिकरण संयंत्र के चलते पैदा हुई सभी समस्याओं और मुआवजे के मसले को निपटाएगा। राज्य सरकार के इस कदम पर कोका कोला ने कहा है कि यह बिल तथ्यों और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित नहीं है। शीतल पेय बनाने वाली कंपनी ने कहा है कि वह इस मुद्दे पर अभी भी इससे जुड़े सभी पक्षों के साथ चर्चा करने को तैयार है। इससे पहले, माकपा की अगुवाई वाली एलडीएफ सरकार ने विधानसभा सत्र के अंतिम दिन यह विधेयक पेश किया। विधेयक पेश करने के दौरान सदन में हंगामे का माहौल था क्योंकि कांगे्रस नीत विपक्षी यूडीएफ गठबंधन किसी अन्य मुद्दे पर सदन की कार्यवाही स्थागित करने की मांग पर अड़ा हुआ था। विधेयक एकउच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए पेश किया गया था। समिति ने पाया था कि पलक्कड जिले में हिंदुस्तान कोका कोला बीवरेजेज प्राइवेट (एचसीसीबी) लिमिटेड संयंत्र के चलते 216.16 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा। समिति ने एक विशेष न्यायाधिकरण गठित किए जाने का सुझाव दिया था, ताकि कंपनी से प्रदूषणकर्ता भरपाई सिद्धांत के आधार पर क्षतिपूर्ति कराई जा सके। विधेयक में कहा गया है कि संयंत्र ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया और इसकी वजह से मिट्टी की उपजाऊपन में कमी आई तथा पानी भी प्रदूषित हुआ। सरकार के मुताबिक संयंत्र के चलते अत्यधिक मात्रा में भू जल के दोहन से पेयजल की किल्लत हो गई। कारखाने से निकली कैडमियम, सीसा और क्रोमियम जैसी धातुओं के चलते फसल की पैदावार कम हो गई। संयंत्र की गाद से लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। त्वचा रोग तथा सांस लेने में जैसी शिकायतें सामने आईं। कई गैर सरकारी संस्थाओं और संगठनों ने कंपनी के खिलाफ आवाज उठाई और तब कहीं जाकर सरकार का ध्यान इस ओर गया और जांच आदिवासियों के विरोध और भूजल के अत्यधिक दोहन को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई के चलते प्लाचीमाडा संयंत्र पिछले कई साल से बंद है। केरल सरकार ने राज्य में कोका कोला के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बाद यह प्रतिबंध हटा लिया गया।

गांवों तक डॉक्टरों को पहुंचाने की तैयारी में लगा अड़ंगा


भारत के गांवों तक डॉक्टरों को पहुंचाने की तैयारी में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) ने अड़ंगा लगा दिया है। देश के सभी राज्यों के सहमत होने के बाद केंद्र सरकार ने इसके लिए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। गांवों से डॉक्टरों की कमी को दूर करने वाले इस कोर्स को शुरू करने के लिए आर्थिक मदद से ले कर दूसरी सभी तैयारियां भी कर ली गई थीं, लेकिन अब एमसीआइ ने बैचलर ऑफ रूरल हेल्थकेयर (बीआरएचसी) के लिए अधिसूचना जारी करने से ही इंकार कर दिया है। जबकि मूल रूप से यह प्रस्ताव खुद एमसीआइ ने ही तैयार किया था। एमसीआइ संचालक मंडल के प्रमुख एसके. सरीन ने दैनिक जागरण से बातचीत में माना कि स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से इस संबंध में भेजी गई फाइल लौटा दी गई है। हालांकि उनका कहना था कि हमने इसे अधिसूचित करने से इंकार नहीं किया, बल्कि सिर्फ एक सुझाव दिया है। हमारा कहना है कि इसकी निगरानी और संचालन के लिए अलग से कोई परिषद बनाई जानी चाहिए। क्योंकि हम सिर्फ डॉक्टरी के पाठ्यक्रमों और मेडिकल कालेजों को ही देखते हैं। सरीन ने कहा कि वे या एमसीआइ इस कोर्स के विरोध में नहीं। वे भी चाहते हैं कि यह शुरू हो और गांवों में प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी को दूर किया जा सके, लेकिन सरकार को इसके लिए अलग से व्यवस्था करनी चाहिए

उत्तर प्रदेश में धड़ल्ले से बिक रहीं प्रतिबंधित दवाएं


केंद्र सरकार ने सेहत पर विपरीत असर डालने तथा बीमारियों की सौगात देने वाली कई दवाओं को बाकायदा कानून बनाकर प्रतिबंधित कर दिया है। इनका निर्माण और बिक्री करना गंभीर जुर्म है,लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाजारों में यह खुलेआम बिक रही हैं। रोज करोड़ों रुपये की बिलिंग हो रही है। इन दवाओं का प्रयोग गंभीर रोग देता है। आम लोगों की सेहत से बेखबर अफसरों ने अभी तक इनको बाजार से हटाने की कोई कोशिश नहीं की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत कई संस्थाओं ने कुछ सॉल्ट से बनने वाली दवाओं के गंभीर दुष्परिणामों से जुड़ी रिपोर्ट केंद्र को भेजी थी। दोबारा जांच में दवाओं के साइड इफेक्ट की पुष्टि होने पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने बीती 10 फरवरी को भारत के राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित कर 12 वर्ष की आयु से नीचे के बच्चों में निमेसुलाइड फार्मुलेशन के अलावा फेनाइलप्रोपेनोलेमाइन, सीसाप्राइड, सिबुट्रामाइन, आर-सिबुट्रामाइन और ह्यूमन प्लेसेंटल एक्स्ट्रेक्ट और इनके फार्मुलेशन के बनने वाली दवाओं के निर्माण, बिक्त्री और वितरण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। इसके बाद से इन दवाओं का व्यापार गैर कानूनी हो गया लेकिन बाजार में यह धड़ल्ले से बिक रही हैं। लखनऊ केमिस्ट एसोसिएशन के वाइस प्रेसीडेंट हरीश शाह बताते हैं, उक्त दवाएं प्रचलन में हैं। खासकर निमेसुलाइड फार्मुलेशन वाले बच्चों के सिरप। राज्य में केवल इसी दवा का कुल कारोबार सौ करोड़ रुपये सालाना से अधिक है। इस बारे में खाद्य एवं औषधि प्रशासन एफडीए विभाग ने दुकानदारों व कंपनियों को कोई नोटिस जारी नहीं किया है। नतीजा रोज करोड़ों की दवाओं की बिलिंग हो रही है जो अवैध है।

Thursday, February 24, 2011

सिरदर्द व सूजन को न समझें सामान्य


एचआइवी का टीका भी अब दूर नहीं


वह दिन दूर नहीं, जब एचआइवी का टीका भी हमारे पास होगा। जल्द ही हमारी उम्मीदों को पंख लगने वाला हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) द्वारा एचआइवी (हयूमन इम्यूनो डिफिशिएंसी वायरस) के टीके (वैक्सीन) पर किए जा रहे परीक्षण का पहला चरण पूरा हो चुका है और इसके दूसरे चरण का ट्रायल अपने अंतिम दौर में है। देश में विकसित किए जा रहे इस टीके के पहले चरण में किसी भी प्रकार का अतिरिक्त प्रभाव (साइड इफेक्ट) का संकेत नहीं मिलने से हमारी उम्मीदें और बढ़ गई हैं। आइसीएमआर के महानिदेशक डॉ. वी. एम. कटोच का कहना है कि खुशी की बात यह है कि हमारी तीन साल की मेहनत रंग लाई है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद से दिसंबर 2010 में पहला चरण पूरा करने में सफल रहे हैं। डॉक्टर कटोच ने बताया कि परीक्षण के पहले चरण में सुरक्षा का काफी ध्यान रखा गया, जिसमें हम पूरी तरह से सफल भी रहे हैं। परीक्षण के दूसरे चरण में हम यह जांच कर रहे हैं कि इसका इम्यून पर कितना प्रभाव पड़ता है और यह टीका कितने प्रतिशत एंटीबॉडी बनाने में सक्षम हो पाती है। एक सवाल के जबाव में डॉक्टर का कहना था कि थाईलैंड में भी ऐसे ही एक टीके का परीक्षण किया गया था, जो केवल 30 प्रतिशत ही प्रभावित रही थी। लेकिन यहां हम इससे ज्यादा की उम्मीद कर रहे हैं ताकि हमारा टीका ज्यादा से ज्यादा प्रभावी हो। उन्होंने कहा कि अगले दो तीन महीने में हमें यह पता चल जाएगा कि इस टीके का प्रभाव किस स्तर पर होगा। अगर प्रतिशत का स्तर ज्यादा मिला तो उम्मीद है कि भारत में जितने भी प्रकार के एचआइवी विषाणु मिलते हैं, यह टीका उन सभी पर प्रभावी साबित होगा। इसके बाद इन टीकों का सबसे पहले प्रयोगशाला में परीक्षण करने के बाद पशुओं पर परीक्षण किया जाएगा। अगर परिणाम बेहतर मिला तो टीके का कई चरणों में मनुष्यों पर परीक्षण भी जाएगा। इसकी सफलता के बाद ही इसे लाइसेंस देकर बाजार में उतारने की अनुमति मिलेगी। डॉ. कटोच के अनुसार इस समय देश भर में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या लगभग तीस लाख हैं|

सिगरेट-बीड़ी में तय होगा नशा


 हिंदुस्तान में धूम्रपान करने वालों को पता ही नहीं कि जो धुआं वे पी रहे हैं उसमें जहरीले तत्वों की मात्रा कितनी है। लेकिन अब दूसरे मुल्कों की तरह हमारे देश में भी बीड़ी-सिगरेट में निकोटीन व टार की अधिकतम मात्रा तय होने वाली है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस संबंध में जल्दी ही नियम बनाने जा रहा है। साथ ही इनकी जांच के लिए देश भर में छह प्रयोगशालाएं भी बन रही हैं। निर्धारित मात्रा का उल्लंघन करने वाले निर्माता पर सख्त जुर्माने का भी प्रावधान किया जा रहा है। इस समय मदिरा पीने वालों को तो पता होता है कि उनकी शराब या बीयर में अल्कोहल कितने फीसदी है। इन बोतलों पर इस बारे में साफ जानकारी भी छपी होती है। अब स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बनाए जा रहे नए नियमों के तहत बीड़ी-सिगरेट में भी निकोटीन और टार की मात्रा तय होगी। साथ ही इसकी जानकारी पैकिंग पर भी देनी होगी। स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक नए नियमों को लागू करने से पहले देश के विभिन्न हिस्सों में छह तंबाकू जांच प्रयोगशालाएं तैयार की जा रही हैं। इनका काम अगले सात -आठ महीने में पूरा हो जाने की उम्मीद है। इनमें से पांच प्रयोगशालाएं चंडीगढ़, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और गाजियाबाद में होंगी, जबकि इस क्षेत्र की सर्वोच्च लैब राष्ट्रीय जीव विज्ञान प्रयोगशाला (एनआईबी), नोएडा के तहत काम करेगी। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक अगले चरण में चबाने वाले तंबाकू उत्पादों के लिए भी ऐसा ही पैमाना तय किया जाएगा। इस समय जहां दुनिया के अधिकांश मुल्कों में टार और निकोटीन की अधिकतम मात्रा प्रति सिगरेट दस एमजी और एक एमजी निर्धारित है। लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा कोई मानक तय नहीं होने की वजह से अधिकांश उत्पादों में यह मात्रा इससे काफी अधिक पाई जा रही है। इस समय कृषि मंत्रालय के तहत चलने वाले केंद्रीय तंबाकू शोध संस्थान (सीटीआरआई), राजमुंदरी में इस जांच की व्यवस्था है। लेकिन यह सुविधा बहुत सीमित है और बड़े पैमाने पर ऐसे नमूनों की जांच के लिए सक्षम नहीं|

Wednesday, February 23, 2011

झारखंड: फिर जगा पोलियो वायरस


झारखंड ने शिशु मृत्यु दर कम करने में सफलता भले ही प्राप्त कर ली हो, पोलियो के सात नए मामलों ने राज्य, केंद्र सरकार के साथ ही डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ को आश्चर्य में डाल दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर पोलियो मरीजों में 94 फीसदी की कमी के बीच नए रोगियों का मिलना चौंकाने वाला है। झारखंड के काफी समय तक पोलियोमुक्त रहने के बाद 2009 के अक्टूबर-दिसंबर में दो तथा 2010 में सात केस मिले। सभी केस पाकुड़ में मिले। इनमें पी-1 के तीन तथा पी-3 के चार रोगी मिले। 7 मई 2006 के बाद से झारखंड में पोलियो का एक भी मरीज नहीं मिला था। तीन वर्ष पांच महीना व तीन दिन के लंबे गैप के बाद दो केस मिले। 2009 में पहला मरीज 10 अक्टूबर को साहिबगंज में मिला, जबकि दूसरा मरीज 7 दिसंबर को चंदनक्यारी (बोकारो) में। अनुमान है कि साहिबगंज के बिहार तथा पाकुड़ के बंगाल से सटे होने के कारण वायरस का संक्रमण हुआ। इन दोनों राज्यों में पोलियो मरीजों की संख्या अब भी अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है। प्रदेश में पोलियो के अचानक मिले इन मामलों के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय सजग हो गया है। पाकुड़ में पल्स पोलियो के मॉप राउंड चलाए चलाए जा रहे हैं, वहीं पूरे प्रदेश में पोलियो अभियान फिर से शुरू कर दिया गया है। पहला पल्स पोलियो अभियान 23 जनवरी को पूरे प्रदेश में चलाया गया। अगला अभियान इसी माह 27 तारीख को चलाया जाना है। 28 फरवरी व 1 मार्च को डोर-टू-डोर अभियान चलाए जायेगा। राज्य सरकार की कोशिश होगी कि एक भी बच्चा पल्स पोलियो ड्राप से अछूता नहीं रहे। उल्लेखनीय है कि देश में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा गुजरात पोलियो के हाई रिस्क जोन में हैं। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयासों से पोलियो की चपेट में आने वाले मरीजों की संख्या में दिनों दिन कमी हो रही है।


Tuesday, February 22, 2011

रक्तचाप मापने का नया उपकरण


दवा के अनावश्यक इस्तेमाल से कैंसर


यदि आप नशा नहीं करते है तो भी कैंसर के शिकार हो सकते हैं। इसकी वजह है शरीर में पाए जाने वाले पी- 53 प्रोटीन की कमी। यह प्रोटीन शरीर में मिलने वाले दूसरे प्रोटीन से अभिक्रिया कर उसकी गुणवत्ता सुधारता है। पी- 53 सबसे अधिक पैक्स- 6 नामक प्रोटीन से अभिक्रिया करता है। इससे आंख, नाक और मस्तिष्क को मजबूती मिलती है। यह जानकारी बीएचयू के वैज्ञानिकों को शोध के दौरान मिली है। शोध के अगले चरण में यह पता लगाया जा रहा है कि कैंसर से बचाव के लिए शरीर में इसकी न्यूनतम मात्रा कितनी होनी चाहिए। पी- 53 प्रोटीन शरीर के हर अंग में पाया जाता है। इसकी खास विशेषता यह भी है कि यह कोशिकाओं के विभाजन को रोकता है तथा कोशिका निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य करता है। ज्यादा एक्सरे कराने तथा दवाओं के सेवन से इस प्रोटीन की क्षति होती है। रेडिएशन से बचाव तथा अनावश्यक दवाओं से परहेज कर इसकी क्षति को रोका जा सकता है।
नशा नहीं करने वालों में भी कैंसर के मामले मिलने के बाद बीएचयू के जंतु विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डा. रत्नाकर मिश्र के नेतृत्व में शोध छात्र रत्नाकर त्रिपाठी, कुमार शुभम, ब्रिज भारती की टीम ने एक साल पूर्व शोध प्रारंभ किया था। इस दौरान पाया गया कि कोशिकाओं को मजबूत करने के लिए सबसे प्रभावी पी- 53 प्रोटीन है। यह अन्य प्रोटीनों से अभिक्रिया कर उनकी गुणवत्ता में सुधार करता है।

एम्स डाक्टर नहीं कर सकते हड़ताल


दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि एम्स के डाक्टर हड़ताल पर नहीं जा सकते है। साथ ही एम्स को निर्देश दिया है कि पिछले सालों में हड़ताल को विरोध का तरीका बनाने वाले डाक्टरों की पहचान करके उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की खंडपीठ ने कहा कि हड़ताल या प्रदर्शन में शामिल होने डाक्टर अदालत की अवमानना के जिम्मेदार होंगे। एम्स से जुड़े डाक्टर, रेजीडेंट, इंटर्न, मेडिकल स्टाफ व अन्य हड़ताल पर नहीं जा सकते हैं। उनका यह कदम अवैध होगा। खंडपीठ ने एम्स के प्रबंधन को कहा है कि वर्ष 2006 में ओबीसी के आरक्षण के विरोध में 17 दिन हड़ताल पर गए डाक्टरों की पहचान की जाए। इसके साथ ही वर्ष 2007 में एम्स के निदेशक पी वेणुगोपाल के हटाए जाने को लेकर किए गए दो दिन के प्रदर्शन में शामिल डाक्टरों का भी पता लगाया जाए। खंडपीठ ने कहा कि एम्स का प्रेसीडेंट उच्च स्तरीय कमेटी गठित करे, जो यह पता करेगी कि किन-किन लोगों ने पिछले सालों में हुई इन हड़ताल में भाग लिया है। इसके बाद इन सभी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। इतना ही नहीं इन डाक्टरों की पहचान होने के बाद एम्स मेडिकल काउंसिल एक्ट व दिल्ली मेडिकल काउंसिल एक्ट के अधिकारियों को भी सूचित कर दे ताकि वह इनके खिलाफ उचित कार्रवाई कर सके। यह आदेश अदालत ने एक जनहित याचिका पर दिया है जिसमें मांग की गई थी कि हड़ताल में शामिल होने व मरीजों का इलाज करने से मना करने वाले डाक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। खंडपीठ ने कहा कि एम्स से जुड़े लोगों को अपने काम के प्रति समर्पित होना चाहिए। उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि देश के नागरिकों का स्वास्थ्य राष्ट्र की संपदा है। इसे जोखिम में नहीं डाला जा सकता है। यह एम्स के अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि उनके संस्थान से जुड़ा कोई भी व्यक्ति इस तरह के धरने या प्रदर्शन में शामिल न हो। अन्यथा वह अनुशासनात्मक कार्रवाई और अदालत की अवमानना का जिम्मेदार होगा। खंडपीठ ने उस बात पर भी एम्स की खिंचाई की है जिसमें उसकी तरफ से दलील दी गई थी कि उन्होंने हड़ताल में शामिल डाक्टरों का कोई रिकार्ड तैयार नहीं किया है। वैसे भी अधिकतर डाक्टर संस्थान को छोड़ चुके हैं। अदालत ने कहा कि एम्स इस तरह की दलीलें देकर नहीं बच सकता है कि उन्हें नहीं पता कि असल में कौन-कौन हड़ताल में शामिल था। एससी एंव एसटी मेडिकल एसोसिएशन की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि डाक्टरों की हड़ताल गलत है। इस तरह हड़ताल पर जाने वाले डाक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

Sunday, February 20, 2011

अब ब्लड कैंसर पर लगाई जा सकेगी लगाम


वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने इस बात का पता लगा लिया है कि मानव शरीर ल्यूकेमिया (एक प्रकार का रक्त कैंसर) से कैसे लड़ता है। इस खोज के बाद अब इस जानलेवा बीमारी के ज्यादा बेहतर और प्रभावशाली इलाज का रास्ता खुल सकता है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के दल ने दरअसल सीडी19-लिगेंड (सीडी19-एल) नामक ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जो सफेद रक्त कोशिकाओं की सतह पर पाया जाता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ हिमेटोलॉजी के अनुसार यह प्रोटीन ल्यूकेमिया से प्रभावित कोशिकाओं को नष्ट करने में शरीर की प्रतिरोधी क्षमता की सहायता करता है। लॉस एंजिल्स स्थित बच्चों के कैंसर और रक्त संबंधी बीमारियों के केंद्र और सबन शोध संस्थान के वैज्ञानिकों की ल्यूकेमिया से प्रभावित सीडी19 कोशिकाओं पर पहली रिपोर्ट है। बी-लाइनेज एक्यूट लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) बच्चों और किशोरों में होने वाला सबसे आम कैंसर है। काफी तीव्र कीमोथेरेपी के बावजूद कुछ मरीजों में इस बीमारी की पुनरावत्ति होती रहती है। ऐसे लोगों में लंबे जीवन के अवसर काफी कम होते हैं। इस दल के प्रमुख फतीह उकून ने बताया कि इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना ल्यूकेमिया से प्रभावित कोशिकाओं को नष्ट करने की है। इसके लिए हमें नए तरीके इजाद करने होंगे क्योंकि यह कोशिकाएं कीमोथेरेपी से भी नष्ट नहीं होती हैं।