उत्तराखंड में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की योजनाएं समय से शुरू नहीं हो रहीं और यदि शुरू भी हो गईं तो समय से लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। कारण है केंद्र सरकार का ढुलमुल रवैया, पिछले तीन वर्षो से राज्य में खर्च होने वाले बजट की स्वीकृति मार्च के बजाय मई या जून में मिल रही है। उस पर स्वास्थ्य विभाग व एनआरएचएम में समन्वय की कमी। ऐसे में वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर बजट खर्च नहीं हो पा रहा। जिसका खामियाजा सूबे की जनता को भुगतना पड़ रहा है। अब राज्य ने केंद्र से वर्ष 2011-12 के बजट को मार्च में स्वीकृत करने का आग्रह किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने को एनआरएचएम के तहत हर साल बजट स्वीकृत करता है लेकिन गड़बड़ी यह है कि जनवरी में भेजे गए बजट के प्रस्ताव को मार्च में स्वीकृति मिलनी चाहिए, जो मई या जून में मिल रही है। नतीजतन योजनाएं समय से शुरू नहीं हो पाती। वर्ष 2010 की चिरायु योजना को ही ले लिया जाए, मई में बजट स्वीकृत होने के बाद राज्य ने इसकी तैयारी शुरू की इसमें दो माह लग गए और यह अगस्त में शुरू हो सकी। यह तो एक उदाहरण है। मातृ शिशु कल्याण, अस्पतालों के जीर्णोद्धार, मैनपावर की नियुक्ति से संबंधित एक दर्जन योजनाएं हैं जो वर्ष 2009 में शुरू ही नहीं हो पाई। वर्ष 2009-10 में स्वीकृत 175 करोड़ का करीब 50 फीसदी ही खर्च हो पाया, 2010-11 में स्वीकृत 211 करोड़ में से 25 फीसदी अब भी बचा है। एनआरएचएम उत्तराखंड के निदेशक पीयूष सिंह के मुताबिक अगस्त में योजनाएं शुरू होंगी तो समय से इसे पूरा नहीं किया जा सकता। वर्ष 2011-12 के लिए 276 करोड़ का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया है, साथ में आग्रह किया गया है कि इसे मार्च में स्वीकृति दे दी जाए।
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