भारत में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर लेखिका की टिप्पणी
हाल ही में विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया में सेहत के संकट पर जो रिपोर्ट जारी की है वह भारत और दक्षिण एशियाई देशों में कैंसर हृदयरोग, डायबिटीज जैसे रोगों की काफी चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि सन 2030 तक भारत में हृदय रोग मौत का सबसे बड़ा कारण होगा। उच्च रक्तचाप के मरीज अगले पंद्रह साल में लगभग दोगुने हो जाएंगे। ये आंकडे भारत के अस्वस्थ होने की आशंका जता रहे हैं परंतु सत्य तो यह है कि भारतीय अस्वस्थ हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि हर सात मिनट में एक भारतीय महिला की मृत्यु प्रसव के दौरान अथवा गर्भावस्थाकाल में हो जाती है। बाल व मातृ मृत्यु दर के मामले में भारत संपूर्ण विश्र्व में सबसे आगे हैं। विश्र्व जनसंख्या में 16.3 प्रतिशत भागीदारी निभाने वाला भारत विश्र्व की बीमारियों में 20 प्रतिशत का योगदान देता है। श्र्वास संबंधी रोग, तपेदिक, अतिसार, बैक्टीरिया जनित बीमारियों के साथ-साथ प्रसव संबंधी समस्याओं से त्रस्त लोगों की संख्या भारत में एक-तिहाई है। देश में लगभग 32 करोड़ महिलाएं प्रजनन संबंधी रोगों से ग्रस्त हैं। एक अनुमान के मुताबिक 27 करोड़ महिलाएं प्रीमेंस्टुअल सिंड्रोम से पीडि़त हैं। गांवों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाली 40 प्रतिशत महिलाओं को ल्युकोरिया अल्सर और गर्भाशय कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों ने घेर रखा है। एनएफएचएस के आंकडे़ बताते हैं कि 56.1 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है, जिसका नतीजा गर्भकाल में 20 प्रतिशत से ज्यादा मृत्यु, समय पूर्व शिशुओं के जन्म में तीन गुना वृद्धि तथा नौ गुना अधिक प्रसव पूर्व मृत्यु के मामलों के रूप में सामने आता है। इसके अलावा शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित तथा लाइलाज जन्मजात बीमारियों से पीडि़त बच्चों का जन्म भी इसी समस्या की देन है। यूनिसेफ की रिपोर्ट द स्टेट ऑफ एशिया पेसिफिक्स चिल्ड्रेन, के अनुसार भारत में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की मृत्यु विश्व में सबसे अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों में अमीरों और गरीबों के मध्य गहरी खाई चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। आर्थिक स्तर पर बढ़ता यह अंतर माताओं एवं बच्चों के लिए घातक हो गया है। यही कारण है कि बीमारियों की चपेट में अधिकतर वे लोग आते हैं जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं। यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट न्यूमोनिया द फारगोटन किलर ऑफ चिल्ड्रेन से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में प्रति वर्ष लगभग 4.4 करोड़ न्यूमोनिया के मामले सामने आते हैं। भारत दुनिया के उन चार मुख्य देशों में शामिल है जहां पोलियों के मरीज पाए जाते है। अस्वस्थ भारत के पीछे मूलभूत कारण स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कमी है। अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद देश के सरकारी अस्पतालों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। भारत अभी भी बाल मृत्यु दर कम करने के लिए निर्धारित किए गए विभिन्न सहस्राब्दि स्वास्थ्य लक्ष्यों, एमडीजी-1 (पोषण व आहार के स्तर को सुधारने के लिए तय किया गया लक्ष्य), एमडीजी-5 (माताओं के स्वास्थ्य स्तर को उठाने के लिए निर्धारित लक्ष्य) हासिल करने में कई विकासशील देशों, यहां तक कि श्रीलंका जैसे देश से भी पीछे है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को लागू हुए पांच वर्ष बीत गए, लेकिन अभी तक एक लाख आबादी के लिए स्थापित सामुदयिक स्वास्थ्य केंद्रों में 50 से 60 प्रतिशत विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। चिकित्सा सेवा में कमी ही नहीं बल्कि देश में आर्थिक, जातीय, क्षेत्रीय और शैक्षिणक असमानता व लैंगिक विभेद संकीर्ण विचाधारा भी है। देश की अवस्था का कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की हालत में सुधार के लिए केंद्र द्वारा पूर्व में किए गए प्रयासों का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला है। (लेखिक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
No comments:
Post a Comment