आधुनिक जीवन शैली में तेज रफ्तार जिंदगी आहिस्ता-आहिस्ता इंसान के जी का जंजाल बनती जा रही है। उसके ऐशो आराम में इजाफा तो हुआ पर उसे जुटाने में उसका सुकून भी छिनता चला गया। जिंदगी की आपाधापी ज्यों-ज्यों बढ़ी, त्यों-त्यों तनाव और अवसाद बढ़ता चला गया। इस तनाव और अवसाद ने कई रोगों को जन्म दिया। इनमें से एक है मनोरोग, जिससे फिलवक्त देश की करीब 15 करोड़ आबादी जूझ रही है और यह तादाद दिनोंदिन बढ़ रही है। वि स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक 2020 तक दुनिया भर में मनोरोगियों की तादाद 50 करोड़ हो जाएगी और इनमें ज्यादातर एशियाई देशों के होंगे। हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र कितना उपेक्षित है, यह कुछ आंकड़ों से पता चल जाता है। हमारे यहां फिलवक्त महज चार हजार मनोचिकित्सक मौजूद हैं और तीन लाख रोगियों के लिए एक मनोचिकित्सक है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो दस लाख पर एक मनोचिकित्सक है। विडम्बना यह है कि आधे मनोरोगी तो कभी मनोचिकित्सक तक पहुंच ही नहीं पाते हैं और गंभीर रोगियों के लिए भी अस्पताल तक पहुंचना आसान नहीं होता क्योंकि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में केवल 26 मानसिक अस्पताल हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हमारी सरकार कितनी संजीदा है, इसका खुलासा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की विवेचना से भी होता है। 1982 में शुरू इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के तहत सरकार ने जिला स्तर पर कम से कम एक मनोचिकित्सक की उपलब्धता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा था लेकिन देश के 604 जिलों में से अब तक आधे भी कवर नहीं हो पाए हैं। कार्यक्रम को अमली जामा पहनाने का काम बेहद धीमा चल रहा है। और इसके लिए सरकार और प्रशासकीय मशीनरी दोनों जिम्मेदार हैं। 2007-08 में इस मद में कोई 70 करोड़ रुपए रखे गए थे लेकिन इस रकम का सिर्फ 15 करोड़ ही खर्च हो पाया। यानी, काम पूरा न हो पाने की वजह से पैसा बचा रह गया। यदि काम गंभीरता से होता, तो इसका फायदा मनोरोगियों को जरूी मिलता। खैर! सरकार ने राष्ट्रीय कार्यक्रम तो शुरू तो कर दिया मगर न तो इसकी मॉनीटरिंग की और न ही यह देखना गवारा समझा कि इस कार्यक्रम के लिए जो बजट दिया जा रहा है, वह पर्याप्त भी है या नहीं। मिसाल के तौर पर 11वीं पंचवर्षीय योजना में 350 नए जिलों को इस कार्यक्रम के तहत लाने की योजना बनी। योजना के तहत लक्ष्य हासिल करने के लिए साल 2008-09 में 205 करोड़ रुपए की जरूरत थी लेकिन बजट में केवल 70 करोड़ ही रखे गए। ऐसे में किस तरह बाकी छूटे जिले कवर हो पाएंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकार का नजरिया अब भी ठीक नहीं दिखता है। यही कारण है कि देश में मनोरोगियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। अगर मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सरकार का गैर-जिम्मेदाराना रवैया आगे भी यूं ही जारी रहा तो यह समस्या आगे चलकर और ज्यादा खतरनाक हो जाएगी। जीवन शैली में तेजी से आए बदलावों को देखते हुए इसके लिए जन-जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है। और तो और, अब स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले विधार्थी भी मानसिक रोगों के दायरे में आने लगे हैं। विधार्थियों के मानसिक स्वास्थ की बेहतरी के लिए जहां स्कूल, कॉलेजों में बड़े पैमाने पर काउंसलिंग की जरूरत है, वहीं ज्यादा से ज्यादा अस्पतालों में मानसिक चिकित्सा विंग के तहत पर्याप्त अनुदान देने की भी जरूरत है। पर्याप्त बजट के अभाव में, मनोरोगियों के अस्पतालों में न तो डॉक्टर हैं और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं। एक बात और, स्वास्थ्य बीमे की मानसिक रोगियों को सबसे ज्यादा जरूरत है, लेकिन यह बड़ी विडंबना है कि वही स्वास्थ्य बीमा दायरे से बाहर है। बहरहाल, समाज में मनोरोगियों के प्रति एक स्वस्थ नजरिए के निर्माण से ही हालात में बदलाव आ सकता है। मानसिक रूप से अक्षम लोगों को हिकारत से नहीं, सहानुभूति से देखना चाहिए। क्योकि, ज्यादातर रोगी जन्म से नहीं बल्कि परिस्थितियों के कारण इस गति को प्राप्त होते हैं और इन परिस्थितियों के लिए कहीं न कहीं हमारा समाज भी जिम्मेदार है.
Sunday, February 20, 2011
मनोरोगियों के प्रति लापरवाह व्यवस्था
आधुनिक जीवन शैली में तेज रफ्तार जिंदगी आहिस्ता-आहिस्ता इंसान के जी का जंजाल बनती जा रही है। उसके ऐशो आराम में इजाफा तो हुआ पर उसे जुटाने में उसका सुकून भी छिनता चला गया। जिंदगी की आपाधापी ज्यों-ज्यों बढ़ी, त्यों-त्यों तनाव और अवसाद बढ़ता चला गया। इस तनाव और अवसाद ने कई रोगों को जन्म दिया। इनमें से एक है मनोरोग, जिससे फिलवक्त देश की करीब 15 करोड़ आबादी जूझ रही है और यह तादाद दिनोंदिन बढ़ रही है। वि स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक 2020 तक दुनिया भर में मनोरोगियों की तादाद 50 करोड़ हो जाएगी और इनमें ज्यादातर एशियाई देशों के होंगे। हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र कितना उपेक्षित है, यह कुछ आंकड़ों से पता चल जाता है। हमारे यहां फिलवक्त महज चार हजार मनोचिकित्सक मौजूद हैं और तीन लाख रोगियों के लिए एक मनोचिकित्सक है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो दस लाख पर एक मनोचिकित्सक है। विडम्बना यह है कि आधे मनोरोगी तो कभी मनोचिकित्सक तक पहुंच ही नहीं पाते हैं और गंभीर रोगियों के लिए भी अस्पताल तक पहुंचना आसान नहीं होता क्योंकि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में केवल 26 मानसिक अस्पताल हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हमारी सरकार कितनी संजीदा है, इसका खुलासा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की विवेचना से भी होता है। 1982 में शुरू इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के तहत सरकार ने जिला स्तर पर कम से कम एक मनोचिकित्सक की उपलब्धता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा था लेकिन देश के 604 जिलों में से अब तक आधे भी कवर नहीं हो पाए हैं। कार्यक्रम को अमली जामा पहनाने का काम बेहद धीमा चल रहा है। और इसके लिए सरकार और प्रशासकीय मशीनरी दोनों जिम्मेदार हैं। 2007-08 में इस मद में कोई 70 करोड़ रुपए रखे गए थे लेकिन इस रकम का सिर्फ 15 करोड़ ही खर्च हो पाया। यानी, काम पूरा न हो पाने की वजह से पैसा बचा रह गया। यदि काम गंभीरता से होता, तो इसका फायदा मनोरोगियों को जरूी मिलता। खैर! सरकार ने राष्ट्रीय कार्यक्रम तो शुरू तो कर दिया मगर न तो इसकी मॉनीटरिंग की और न ही यह देखना गवारा समझा कि इस कार्यक्रम के लिए जो बजट दिया जा रहा है, वह पर्याप्त भी है या नहीं। मिसाल के तौर पर 11वीं पंचवर्षीय योजना में 350 नए जिलों को इस कार्यक्रम के तहत लाने की योजना बनी। योजना के तहत लक्ष्य हासिल करने के लिए साल 2008-09 में 205 करोड़ रुपए की जरूरत थी लेकिन बजट में केवल 70 करोड़ ही रखे गए। ऐसे में किस तरह बाकी छूटे जिले कवर हो पाएंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकार का नजरिया अब भी ठीक नहीं दिखता है। यही कारण है कि देश में मनोरोगियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। अगर मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सरकार का गैर-जिम्मेदाराना रवैया आगे भी यूं ही जारी रहा तो यह समस्या आगे चलकर और ज्यादा खतरनाक हो जाएगी। जीवन शैली में तेजी से आए बदलावों को देखते हुए इसके लिए जन-जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है। और तो और, अब स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले विधार्थी भी मानसिक रोगों के दायरे में आने लगे हैं। विधार्थियों के मानसिक स्वास्थ की बेहतरी के लिए जहां स्कूल, कॉलेजों में बड़े पैमाने पर काउंसलिंग की जरूरत है, वहीं ज्यादा से ज्यादा अस्पतालों में मानसिक चिकित्सा विंग के तहत पर्याप्त अनुदान देने की भी जरूरत है। पर्याप्त बजट के अभाव में, मनोरोगियों के अस्पतालों में न तो डॉक्टर हैं और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं। एक बात और, स्वास्थ्य बीमे की मानसिक रोगियों को सबसे ज्यादा जरूरत है, लेकिन यह बड़ी विडंबना है कि वही स्वास्थ्य बीमा दायरे से बाहर है। बहरहाल, समाज में मनोरोगियों के प्रति एक स्वस्थ नजरिए के निर्माण से ही हालात में बदलाव आ सकता है। मानसिक रूप से अक्षम लोगों को हिकारत से नहीं, सहानुभूति से देखना चाहिए। क्योकि, ज्यादातर रोगी जन्म से नहीं बल्कि परिस्थितियों के कारण इस गति को प्राप्त होते हैं और इन परिस्थितियों के लिए कहीं न कहीं हमारा समाज भी जिम्मेदार है.
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