Friday, February 11, 2011

अप्रशिक्षित डॉक्टर कर रहे पोस्टमार्टम

पर्याप्त पुलिस बल के अभाव में नहीं गठित हो पाई अलग विवेचना

राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष स्वीकार किया है कि प्रदेश में मुरदाघरों (मारचुअरी) की हालत अत्यंत दयनीय है और कोई फोरेंसिक विशेषज्ञ पोस्टमार्टम नहीं कर रहा है बल्कि वे डॉक्टर पोस्टमार्टम कर रहे हैं जो अस्पतालों में उपलब्ध हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग पोस्टमार्टम करने के लिए सिद्धहस्त हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा एवं न्यायमूर्ति श्रीकांत त्रिपाठी खंडपीठ के समक्ष मो. कासिम बनाम उ.प्र. एवं अन्य, जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान उपस्थित फोरेंसिक लेबोरेट्री के निदेशक डॉ. श्याम बिहारी उपाध्याय ने कहा कि पोस्टमार्टम करने के लिए सिद्धहस्त डॉक्टरों की आवश्यकता है कि डॉक्टरों को प्रशिक्षित किये जाने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम शुरू किया गया है तथा इस संबंध में जल्द ही एक कार्यशाला आयोजित की जायेगी। खंडपीठ के समक्ष उ.प्र. शासन के विशेष सचिव एसके रघुवंशी ने बताया कि राज्य सरकार ने वर्ष 2007 के शासनादेश का हवाला भी दिया जिसमें स्थानीय पुलिस एवं इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी को अलग करने के लिए प्रस्तावित कदमों का उल्लेख है परंतु उन्होंने पूरा विवरण तथा सरकार ने अब तक क्या कदम उठाये की जानकारी देने के लिए कुछ और समय मांगा। खंडपीठ ने हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस बल की कमी के कारण अभी तक कानून व्यवस्था पुलिस व विवेचना पुलिस को अलग-अलग नहीं किया जा सका। खंडपीठ के समक्ष फोरेंसिक लेब के निदेशक डॉ. उपाध्याय ने बताया कि इस समय डीएनए व विसरा टेस्ट केलिए उ.प्र. में दो प्रयोगशालायें चल रही हैं। जिनमें से एक आगरा में और दूसरी लखनऊ में है। तीसरी प्रयोगशाला वाराणसी में बनायी जा रही है जो बहुत जल्दी कार्य करने लगेगी। चौथी प्रयोगशाला मुरादाबाद में बननी है, जिसके लिए कार्रवाई चल रही है। खंडपीठ ने उनसे जब यह पूछा कि 70 जिलों के इतने बड़े प्रदेश की आवश्यकताओं के अनुरूप क्या ये चार प्रयोगशालायें काफी होंगी, उपाध्याय ने कहा कि नहीं। डॉ. उपाध्याय ने बताया कि एक प्रयोगशाला लगाने की कीमत उनमें कार्यरत कर्मचारियों के अलावा दो करोड़ रुपये से अधिक की आती है। इस संबंध में उन्होंने अपने सुझाव देने के लिए कुछ समय की मांग की। डॉ. उपाध्याय ने खंडपीठ को बताया कि विसरा टेस्ट में लगभग 20 दिन लगते हैं जबकि  डीएनए प्रयोगशाला में 8 से 10 टेस्ट प्रतिदिन हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस बल को फोरेंसिक आंकड़े एकत्र करने के लिए चरणबद्ध ढंग से प्रशिक्षित करने के कदम उठाये गये हैं। खंडपीठ ने इस याचिका को सुनवायी के लिए 7 मार्च 2011 को सूचीबद्ध करने का आदेश देते हुए अगली तिथि पर भारत सरकार के अपर महान्यायवादी को उपस्थित रहने का निर्देश दिया।
   

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